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कमजोर हुई है लोकतंत्र की बुनियाद

Saturday, January 25, 2020 10:00 AM
फाइल फोटो

महात्मा गांधी ने कतार में खड़े अंतिम आदमी की चिंता की है। उनने कहा है कि कोई भी फैसला लेने से पहले इस बात पर गौर करना बेहद जरूरी है कि उसकी कतार में खड़े अंतिम आदमी पर क्या असर पड़ेगा। किसी भी लोकतांत्रिक मुल्क के लिए गांधी की यह जंत्री लोकतंत्र की पहला बुनियादी मूल्य है। कतार में खड़े अंतिम और सबसे कमजोर आदमी की हालत किस कदर गिरी है। इसका ताजा उदाहरण सामने हैं। खबर है कि डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत 10 अंक नीचे खिसक गया है। कुल 165 मुल्कों की इस सूची में वह 51वें स्थान पर है। इससे पिछले साल भारत 41वें पायदान पर था। इस इंडेक्स को जानी-मानी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकॉनॉमिस्ट हर साल जारी करती है। खबरों के मुताबिक शून्य से 10 तक के पैमाने पर भारत का स्कोर 7.23 से गिरकर इस बार 6.90 हो गया है। पत्रिका 2006 में इस रैंकिंग के वजूद में आने के बाद से यह भारत का सबसे कम स्कोर है। इसकी मुख्य वजह नागरिक स्वतंत्रता में कटौती बताई जा रही है। इससे जुड़ी रिपोर्ट में कहा गया है कि कश्मीर से अनुच्छेद-370 निष्प्रभावी किए जाने, असम में एनआरसी पर काम शुरू होने और फिर संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) की वजह से नागरिकों में असंतोष बढ़ा है और इसीलिए भारत के स्कोर में कमी आई है, जहां तक नागरिक स्वतंत्रता के मामले में शीर्ष पर रहने वाले देशों की बात है, तो नॉर्वे इसमें पहले नंबर है। अमेरिका का स्थान 25वां है। उधर, भारत के पड़ोसी देशों की बात की जाए तो चीन 153, पाकिस्तान 108, नेपाल 92, बांग्लादेश 80 नंबर पर है। डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत की गिरावट कहीं अधिक उल्लेखनीय है, क्योंकि पड़ोसी मुल्कों की तुलना में हमेशा से हमारे मुल्क में लोकतंत्र की बुनियाद कहीं अधिक मजबूत रही है। और इसकी वजह हमारा संविधान है। हमारा संविधान जिन संस्थाओं के माध्यम से बोलता है, संसद उन्हीं में से एक है। जब संसद कानून कानून निर्माण में अपनी सर्वोच्चता के दावे के बल पर जरूरी कानून बनाने से इनकार कर देती है, तब यह संविधान से द्रोह करती है। लोकतंत्र को बचाने के लिए बनाई गई संस्था ही लोकतंत्र की दुश्मन बन जाती है।

अगर याद करें तो पिछले दिनों मुल्क से जुड़ी एक और परेशान करने वाली खबर आई थी। आॅक्सफेम ने विश्व आर्थिक मंच की 50वीं सालाना बैठक से पहले टाइम टू केयर अध्ययन जारी किया है। आॅक्सफेम की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय अरबपतियों के पास मुल्क के कुल बजट से भी अधिक संपत्ति है। एक फीसद सबसे अमीर लोगों के पास मुल्क की कम आय वाली 70 फीसद आबादी की तुलना में चार गुने से भी अधिक संपत्ति है। आॅक्सफेम ने विश्व आर्थिक मंच की 50वीं सालाना बैठक से पहले ‘टाइम टू केयर’ अध्ययन जारी किया है, जिसमें यह जानकारी सामने आई है। अध्ययन में भारत के संदर्भ में कहा गया कि मुल्क के 63 अरबपतियों के पास 24,42,200 करोड़ रुपए के आम बजट की तुलना में अधिक संपत्ति है। रिपोर्ट के अनुसार, एक घरेलू महिला कामगार को किसी प्रौद्योगिकी कंपनी के शीर्ष सीईओ की एक साल की कमाई के बराबर कमाने में 22,277 साल लगेंगे। प्रौद्योगिकी कंपनी के सीईओ प्रति सेकंड 106 रुपए की औसत कमाई करते हैं। ऐसे में एक घरेलू कामगार जितना एक साल में कमा पाती है, प्रौद्योगिकी कंपनी के सीईओ 10 मिनट में ही उससे अधिक कमाई कर लेते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि अमीर वर्ग अपनी संपत्ति पर महज 0.5 फीसद की दर से अगले 10 साल के लिए अतिरिक्त कर का भुगतान करे तो यह बुजुर्गों व बच्चों के लालन-पालन, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में रोजगार सृजित करने के लिए होने वाले निवेश के बराबर होगा।

आर्थिक विषमता के इन चौंकाने वालों आंकड़ों की रोशनी में अगर अपन उद्योग जगत से जुड़े सरकार के कानून पहलकदमियों पर गौर करें, तो साफ हो जाता है कि भारत लोकतांत्रिक मूल्यों में आई इस गिरावट की वजह क्या है? मोदी सरकार ने लेबर कोड के नाम पर श्रम कानूनों में बदलाव करके मजदूरों के लोकतांत्रिक अधिकारों को तकरीबन खत्म कर दिया है। नए कोड के तमाम प्रावधानों के मुताबिक औद्योगिक संस्थाओं में हड़ताल करने को बेहद कठिन बना दिया गया है, जबकि मजदूरों की बर्खास्तगी को काफी आसान कर दिया गया है। इसी के विरोध में पिछले तमाम मजदूर संगठनों ने मुल्क भर में औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कामबंदी की थी। इन श्रम कानून में यह बदलाव का मकसद क्या है। इन बदलावों का सीधा फायदा मुल्क में कॉरपोरेट जगत को होगा। मजदूरों के अधिकारों के हनन से कॉरपोरेट का मुनाफा बढ़ेगा और मुल्क में आर्थिक असमानता की खाई पहले से और चौड़ी हो जाएगी। ताजा उदाहरण सीएए कानून का है। इस कानून के माध्यम से एक अल्पसंख्यक जमात को ही मुल्क में दोयम दर्जे का नागरिक साबित करने की कवायद की गई है। मुल्क भर में इसका विरोध हो रहा है, लेकिन सरकार के नुमाइंदों की जिद है कि वे फैसले को नहीं बदलेंगे। तारीख गवाह है कि हमेशा से सत्ताधीशों की जिद ही लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करती है। ताजा रिपोर्ट बताती है कि इस मुल्क में वह बुनियाद कमजोर हो रही है। 

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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