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इंडिया गेट

जक्का जाम, एक आईना

Tuesday, February 09, 2021 10:55 AM
फाइल फोटो।

तो हर एक गुजरते दिन के साथ मुल्क भर में चल रहा किसान आंदोलन सरकार पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। यह आंदोलन दुनिया भर में सरकार के लिए फजीहत का सबब बन चुका है। लिहाजा, मोदी सरकार और उसके नुमाइंदों की हेंकड़ी भी ढिली पड़ती नजर आ रही है। खासतौर से कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के रवैये में इसकी बानगी देखी जा सकती है। किसान आंदोलन की शुरुआत से ही कृषि मंत्री सरकार की ओर से वार्ता के पाखंड में एक अहम किरदार रहे हैं। गणतंत्र दिवस से पहले जब किसानों और सरकार के बीच बातचीत बेहद तल्ख मोड़ पर पहुंची थी, तब भी उन्होंने रिश्तों को तल्ख करने में अहम किरदार निभाया था। सरकार के साथ किसान नेताओं की आखिरी बैठक में वे यह कहते हुए तमक के उठ गए थे कि आप भी 26 तारीख की तैयारी कीजिए और हम भी 26 तारीख की तैयारी करते हैं।

किसान आंदोलन को बदनाम करने के मकसद से सरकार ने 26 तारीख की जो तैयारी की थी, वह तो मुल्क ने देख लिया है। मगर किसान आंदोलन को बदनाम करने का सरकार का दांव उल्टा पड़ गया और 26 तारीख के बाद किसानों का आंदोलन और मजबूत होकर उभरा। मोदी सरकार और उसके नुमाइंदे शुरू से ही यह साबित करने की कोशिश करते रहे हैं कि किसान आंदोलन में महज पंजाब और हरियाणा के ही किसान शामिल हैं। यहां तक कि शनिवार के चक्का जाम से पहले 5 फरवरी को राज्यसभा में कृषि मंत्र नरेन्द्र सिह तोमर ने कहा था कि केवल एक राज्य के किसान गलतफहमी के शिकार हैं और इसलिए तीन-कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन केवल एक ही राज्य का मसला है।

मगर मुल्क भर के किसानों ने चक्का जाम कर सरकरा को आइना दिखा दिया है। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल, बिहार, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु के लगभग सभी जिलों में और राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा और अन्य सूबों के कई जिलों में तकरीबन 3 घंटे तक चक्का जाम चला और कमाल की बात यह थी कि मुल्क भर में कहीं भी हिंसा नहीं हुई। गणतंत्र दिवस के अनुभव के बाद किसानों ने सावधानी बरती। कुछ प्रमुख किसान यूनियनों ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चक्का जाम नहीं करने का फैसला लिया था, क्योंकि उन्हें संदेह था कि 26 जनवरी के तर्ज पर भाजपा और संघ के लोग चक्का जाम का नाजायज लाभ उठा सकते हैं और कुछ अप्रिय घटना को अंजाम देने का प्रयास कर सकते हैं।

किसान नेताओं के मुताबिक उन्हें जानकारी मिली थी कि किसानों के वेश में चक्का जाम आंदोलन में घुसकर हिंसा फैलाने की कोशिश की जा सकती है। हालांकि, इन सूबों में भी, दूसरी किसान यूनियनों ने कई जिलों में विरोध प्रदर्शन किए हैं। बहरहाल, पूरे मुल्क में चक्का जाम आंदोलन की सफलता इस बात की गवाही देती है कि यह देश किस कदर किसानों के साथ खड़ा है और अब तो किसानों का यह आंदोलन मुल्क की सरहद के भी पार जा चुका है। दुनिया भर की तमाम हस्तियों ने किसान आंदोलन का समर्थन किया है। दुनिया भर में किसान आंदोलन जेरेबहस है। भारत के किसान आंदोलन के बाद दुनिया के तमाम मुल्कों में भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था लागू करने की मांग उठने लगी है। मगर मुल्क की गोदी मीडिया अमेरिका के उस बयान का जश्न मना रही है जिसमें कहा है कि नए कृषि कानून भारत में बाजारों की दक्षता बढ़ाने में मदद करेंगे। दावा किया जा रहा है कि अमेरिका ने भी नए कृषि कानूनों का समर्थन किया है।

सवाल है कि अमेरिका आखिर इन काले कृषि कानूनों का समर्थन क्यों न करे। वह तो शुरू से ही भारत की खाद्य सब्सिडी के खिलाफ एक लंबी मुहिम की अगुवाई करता रहा है। खाद्य सब्सिडी के सवाल को वह विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में और दोहा दौर की बातचीत सहित अन्य व्यापार समझौतों में लगातार उठाता रहा है। उसकी इस मुहिम का मकसद भी साफ है। चूंकि भारत किसानों को सब्सिडी देता है, इसलिए उसे भारत को अनाज निर्यात करने का अवसर नहीं मिलता हैं। कमाल देखिए कि खुद अमेरिकी सरकार और यूरोपियन यूनियन के तमाम मुल्क अपने किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं। मगर वे भारत पर किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी खत्म करने का लगातार दबाव बनाते हैं। लिहाजा, मोदी सरकार की ओर से लाए गए तीनों कृषि कानूनों को अमेरिका का मिला समर्थन इस बात की गवाही भी है कि आखिर सरकार के इस फैसले का असली मकसद क्या है।

अगर पिछली सरकारों ने तमाम दबाव के बावजूद सब्सिडी की व्यवस्था को कायम रखी तो यह उनकी बहादुरी थी। नए कृषि कानून अंतत: सार्वजनिक खरीद और वितरण प्रणाली को समाप्त कर देगा, जो कॉरपोरेट और अमेरिका के हित में होगा। कृषि मंत्री किसानों से जानना चाहते हैं कि कानून में क्या काला है? जबकि असलियत में सारा कानून ही काला है। बहरहाल, किसान आंदोलन को मुल्क भर में मिले समर्थन ने सरकार की होश उड़ा दिए हैं। लिहाजा, कृषि मंत्री को फिर से वार्ता की पेशकश का पाखंड करना पड़ रहा है।
-शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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