Dainik Navajyoti Logo
Sunday 15th of December 2019
 
इंडिया गेट

आर्थिक मंदी और मनमोहन की नसीहत

Wednesday, September 04, 2019 10:00 AM
मनमोहन सिंह (फाइल फोटो)

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मुल्क की बिगड़ती अर्थव्यवस्था पर चिंता जताना तो बनता है। आखिर उनसे बेहतर अर्थव्यवस्था और उससे जुड़े तंत्र को कौन समझ सकता है। वह मनमोहन सिंह ही थे जिनने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी जैसे घातक फैसले के बाद सरकार को संसद में आइना दिखाया था। तब उनने अनुमान लगाया था कि बिना सोचे समझे उठाए गए इस फैसले से जीडीपी की दर में दो से तीन फीसद की गिरावट आ सकती है। और अब उनका अनुमान सौ फीसद सच होता नजर आ रहा है। अर्थव्यवस्था की स्थिति आज बेहत चिंताजनक है। जीडीपी का पांच फीसदी पर पहुंच जाना इस बात का संकेत है कि मुल्क एक लंबी मंदी के भंवर में फंस चुका है। यह पिछले छह साल में सबसे कम है। इसके साथ ही आठ बुनियादी क्षेत्र के उद्योगों की वृद्धि दर जुलाई में घटकर 2.1 फीसद रह गई है। जीडीपी के पांच फीसदी रहने पर मनमोहन सिंह ने नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना तो जरूर साधा है पर साथ में कुछ बेहद अहम नसीहतें भी दी हैं। उनने कहा, ‘भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी से आगे बढ़ने की क्षमता है, लेकिन मोदी सरकार के कुप्रबंधन ने देश की अर्थव्यवस्था को मंदी में ढकेल दिया है।

पूर्व प्रधानमंत्री का मानना है कि अर्थव्यवस्था की इस स्थिति के लिए नोटबंदी और जीएसटी जैसे सरकार के फैसले जिम्मेदार हैं। उनने कहा कि भारत इसी दिशा में चलना जारी नहीं रख सकता। इसलिए मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि वह प्रतिशोध की राजनीति को छोड़ दे और अर्थव्यवस्था को इस संकट से बाहर निकालने के लिए सभी काबिल लोगों की आवाजें सुने।’ दूसरी ओर, मोदी सरकार पूर्व प्रधानमंत्री की इस नसीहत को गंभीरता से लेती नजर नहीं आती। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उनसे इस बयान पर किसी तरह भी प्रतिक्रिया देना भी जरूरी नहीं समझा है। मुमकिन है वित्त मंत्री का मनमोहन सिंह की दलीलों का कोई तर्कपूर्ण जवाब नहीं सूझा हो। क्योंकि उनकी तमाम घोषणाओं के बाद भी अर्थव्यवस्थ की मानकों में किसी तरह का सुधार नजर नहीं आ रहा। बाजार लगातार धाराशायी होता जा रहा है। मंगलवार को ही निवेशकों की जमकर बिकवाली के चलते बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स 770 अंक नीचे आ गया। वहीं, निफ्टी भी 225 अंक टूटकर बंद हुआ। बंबई शेयर बाजार का 30 शेयरों पर आधारित सेंसेक्स 769.88 अंक यानी 2.06 फीसद के नुकसान से 36,562.91 अंक पर बंद हुआ। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 225.35 अंक यानी 2.04 फीसद के नुकसान से 10,797.90 अंक पर आ गया। सुपर रिच टैक्स जैसे प्रावधानों के कारण बाजार के लगातार गिरने के कारण सरकार ने बजट की कई घोषणायें वापस ले ली थीं, लेकिन इसके बाद भी निवेशकों में सकारात्मक माहौल नहीं दिख रहा है। जानकारों के मुताबिक, पिछले दिनों सकल घरेलू उत्पाद, बुनियादी उद्योगों और वाहन बिक्री के आंकड़े आए हैं। ये सभी आंकड़े इस ओर इशारा कर रहे हैं कि देश में आर्थिक सुस्ती गहरा रही है। इस वजह से निवेशक लगातार शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं।

सरकार के सार्वजनिक बैंकों के विलय के फैसले के बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयर टूट रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस कदम से निवेशकों में यह संदेश तो गया है कि सरकार न केवल बैंकों में नई पूंजी डाल रही है बल्कि वह उनके संचालन में भी सुधार चाहती है। लेकिन फिर भी बैंकों का यह विलय बैंकों की भौगोलिक उपस्थिति और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुये परेशान करने वाला लगता है। ऐसे में इस फैसले को लेकर भी बाजार में कई तरह की आशंकायें हैं। चारो तरफ अविश्वास का आलम है। कोई किसी पर भरोसा नहीं कर पा रहा। निजी क्षेत्र में फैसे इस अविश्वास के माहौल ने नकदी के संकट को और गहरा कर दिया है। बाजार के कई जानकारों का यह भी मानना है कि बड़े व्यवसायियों पर आयकर प्रवर्तन विभाग की ओर से अनावश्यक की जा रही छापामारी भी नकदी के संकट और आर्थिक सुस्ती के लिए जिम्मेदार है। बीते दिनों नीति आयोग के अध्यक्ष राजीव कुमार ने भी नकदी के इस संकट की ओर इशारा करते हुए कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछले 70 साल में इतना बड़ा नकदी का संकट नहीं देखा गया। उनने कहा था कि पहले अर्थव्यवस्था में 35 फीसद नकदी होती थी अब इससे कम हो जाने से हालात और जटिल हो गए हैं। यह बात और है कि उनके इस बयान के बाद उन्हें चुप करा दिया गया। मगर अर्थव्यवस्था का संकट अब छुपाने और ढकने के दौर से उपर जा चुका है। और मंदी के लक्षण साफ दिखने लगे हैं। वस्तुओं और सेवाओं की मांग में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। मंदी का सबसे अधिक असर रोजगार पर पड़ता है जो निजी क्षेत्र में साफ दिख रहा है। यहां तक कि अब निजी क्षेत्र के साथ-साथ सरकारी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों मसलन, डाक विभाग, टेलीकॉम सेक्टर, रक्षा और उड्यन क्षेत्र की हालत भी खराब होती जा रही है। लिहाजा, दरकार इस बात की है कि मोदी सरकार मनमोहन सिंह जैसे जानकारों की नसीहत पर बगैर किसी पूर्वाग्रह के गौर करे।

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

यह भी पढ़ें:

दो संस्थाओं की साख पर सवाल

मुल्क की चुनाव प्रक्रिया में दो संस्थाओं की भूमिका बेहद अहम हो गई है। और आज के समय का संकट यह है कि दोनों ही संस्थाओं की भूमिका सवालों के घेरे में है।

21/05/2019

कांग्रेस का फैसला बेसबब नहीं

जब से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने रायबरेली में कार्यकर्ताओं से पूछा था कि क्या मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ जाऊं

27/04/2019

कांग्रेस का संकट

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने वायनाड से ऐतिहासिक जीत हासिल की। पर उनकी यह जीत फीकी पड़ गई। क्योंकि उनकी पार्टी को 2019 के आम चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा।

25/05/2019

संकट चौतरफा है...

राजद सुप्रीमो लालू यादव जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अध्यक्ष पद न छोड़ने की नसीहत दे रहे थे, तो मुमकिन था कि उन्हें खुद अपने बेटे तेजस्वी यादव की चिंता होगी।

30/05/2019

अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का मानना है कि मुल्क की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में नहीं है, यह जरूर है कि इसकी रफ्तार धीमी हुई है।

03/12/2019

नौकरशाही में भी परिवारवाद

अब इसे पेड न्यूज का मामला माना जाए या खुल्लम खुल्ला चुनावी धांधली, पर जो अबतक चुनावी किस्से कहानियों में सुने और सुनाए जाते थे, वह सरेआम दिख रहा है।

09/05/2019

इमरान खान का मोदी प्रेम

पिछले दो आम चुनाव से मुल्क की सियासत में पाकिस्तान का भूत आ खड़ा हो रहा है। याद करें 2014 के आम चुनाव से पहले भाजपा के तमाम नेता अपने सियासी विरोधियों को पाकिस्तान भेज दिए जाने की धमकी दिया करते थे।

13/04/2019