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इंडिया गेट

बेखुदी में फडणवीस

Tuesday, November 05, 2019 14:25 PM
देवन्द्र फड़नवीस (फाइल फोटो)

हर गुजरे हुए दिन के साथ सरकार गठन को लेकर भाजपा पर सियासी दवाब बढ़ता जा रहा है। क्योंकि नतीजे आने के दस दिनों के बाद भी महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर तस्वीर साफ नहीं हो पा रही है और सहयोगी शिवसेना ने इस हालात का लाभ उठाते हुए दवाब की सियासत तेज कर दी है। शिवसेना की ओर से बयान आया है कि उसे 169 विधायकों का समर्थन प्राप्त है और सीएम उसका ही होगा। शिवसेना के प्रवक्ता ने तो यहां तक कह दिया है कि उनकी पार्टी एनसीपी-कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना सकती है। साथ ही शिवसेना ने अपने सहयोगी भाजपा पर इल्जाम लगाया है कि शिवसेना के विधायकों का समर्थन हासिल करने के लिए सरकारी एजेंसियों और अपराधियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। देखा जाए तो यह आरोप संगीन मगर रोचक है। संगीन इसलिए क्योंकि किसी भी पार्टी पर लगा इस तरह का आरोप लोकतंत्र के खिलाफ है और रोचक इसलिए क्योंकि तकरीबन तीन दशक तक सियासी साझेदारी के बाद शिवसेना के रिश्ते आज इस मकाम पर हंै जहां एक दूसरे पर इस तरह के आरोप प्रत्यारोप की नौबत है। जहां तक दोनों सहयोगियों के रिश्तों में आए ताजा पेंच का सवाल है तो जीत के बाद मुख्यमंत्री देवन्द्र फड़नवीस का आत्मविश्वास ही अब उन पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। नतीजों के बाद  यों ही शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने भाजपा के सामने 50-50 फार्मूले का प्रस्ताव रखा, उस पर जल्दबाजी दिखलाते हुए फड़नवीस ने पटलवार किया कि मुख्यमंत्री तो वही बनेंगे, बाकी सब मनोरंजन है।

मुमकिन है जब उनने यह बयान दिया था तब शायद ही उन्हें इस बात का इल्म हो कि शिवसेना की ओर से मनोरंजन की मियाद इतनी लंबी हो जाएगी और नौबत ऐसे पैदा हो जाएंगे कि उनका सियासी भविष्य भी संकट में दिखने लगेगा। नतीजे आने के दस दिनों के बाद देवेन्द्र फड़नवीस यह भरोसे से कह पाने की हालत में नहीं नजर आ रहे कि मुख्यमंत्री वही बनने वाले हैं। सोमवार को जब वे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात के बाद मीडिया से रुबरु हुए तो चेहरे पर जो कैफियत तारी थी वह तो कुछ और ही गवाही दी रही थी। जीत के बाद पैदा हुआ वह प्रचंड आत्मविश्वास गायब था। चेहरे पर विवशता और खीज साफ पढ़ी जा सकती थी। सूबे में सरकार गठन के सवाल पर उनने कहा कि सूबे में नई सरकार की जरूरत है। अब यह किसे पता नहीं है कि चुनाव नतीजों के बाद सूबे में एक नहीं सरकार की जरूरत है। अहम सवाल तो यह है कि नई सरकार कब, कैसे और किसकी बनेगी। क्या मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके पास ही रहेगी कि उस पर कोई और ही काबिज होगा। इन चुभने वाले सवालों पर उनका जवाब था कि नई सरकार के गठन को लेकर कौन क्या कहता है इस पर मैं कुछ नहीं सह सकता। मैं यही कहूंगा कि महाराष्ट्र में जल्दी ही नई सरकार बनेगी, मुझे पूरा भरोसा है। बेशक, नई सरकार बन पाने का तो उन्हें भरोसा है, पर बेखुदी से भरा यह बयान बदलते सियासी परिदृश्य की कहानी भी कह रही है।

असल में, सूबे के दिग्गज मराठा नेता शरद पवार की सक्रियता भी निजी तौर पर देवेन्द्र फड़नवीस और पार्टी के तौर पर भाजपा को परेशान करने लगी है। शरद पवार ने आज कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की है। माना जा रहा है कि यह मुलाकात महाराष्ट्र की ताजा सियासत के बरक्स है। मुमकिन है कि शरद पवार की ओर से पुख्ता संकेत मिलने के बाद ही शिवसेना की ओर से 170 विधायकों के समर्थन का दावा किया जा रहा है। बहरहाल, पता तो यह भी चला है कि शरद पवार और देवेन्द्र फड़नवीस के बीच अब मुकाबला केवल सियासी नहीं रह गया है, अदावत कुछ निजी भी हो चली है। अव्वल तो देवेन्द्र फड़नवीस की ओर से उनके परिवार में फूट डालने की कोशिश इस मराठा क्षत्रप को रास नहीं आयी है। और दूसरे कि चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह के देवेन्द्र फड़नवीस ने उन पर निजी हमले किए वह भी उन्हें नागवार गुजरा है। देवेन्द्र फड़नवीस ने एक जगह नहीं अलबत्ता अपनी तमाम चुनावी रैलियों में शरद पवार की तुलना शोले फिल्म के असरानी के किरदार से की है, जो खुद को अंग्रेजों के जमाने का जेलर बताते थे और अक्सर अपने आधे सिपाहियों के दांए, आधे को बांए और बाकियों के अपने पीछे-पीछे आने का आदेश देते थे। जानकारों के मुताबिक शोले फिल्म के मसखरे के साथ दिग्गज मराठा क्षत्रप की इस तुलना का मकसद शरद पवार के कुनबे में फूट की ओर जनता का ध्यान दिलाना था। चुनाव से पहले शरद पवार और भतीजे अजित पवार की अनबन सुर्खियां बनी थीं। जानकार बताते हैं कि शरद पवार के तकरीबन पांच दशक के सियासी कॅरिअर में किसी ने उनपर इस कदर निजी हमले नहीं किए थे। मुमकिन है चुनाव से पहले 230 पार के आत्मविश्वास में दिया गया यह बयान अब देवेन्द्र फड़नवीस पर भारी पड़ सकता है। नतीजों के देखने के बाद भी वे अपने आत्मविश्वास पर नियंत्रण नहीं रख सके और उनने खुद के दोबारा मुख्यमंत्री होने का दावा कर सहयोगी शिवसेना को भी नाराज कर दिया। मुमकिन है एक साथ सूबे के दो-दो क्षत्रपों की नाराजगी ने देवेन्द्र फड़नवीस के सियासी मंजिल को मुश्किल में डाल रखा हो।

शिवेश गर्ग

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

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