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इंडिया गेट

अर्नब के बरक्स प्रेस की आजादी पर बहस-1

Friday, November 06, 2020 12:55 PM
अर्नब गोस्वामी (फाइल फोटो)

जब से रिपब्लिक टीवी के मालिक और संपादक अर्नब गोस्वामी को एक बेहद संगीन आपराधिक मामले में गिरफ्तारी हुई है। तब से चाय की प्याली में तूफान खड़ा हो गया है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर बहस चल निकली है। पनसारे, दाभोलकर, कलबुर्गी, गौरी लंकेश, देवजी महेश्वरी जैसे तमाम नामों को भूलकर मोदी सरकार का तकरीबन समूचा मंत्रिमंडल और भाजपा नेता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई दे रहे हैं। गृहमंत्री, वित्तमंत्री, रक्षा मंत्री, सूचना एवं प्रसारण मंत्री समेत तमाम मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी को प्रेस की आजादी पर हमला बता रहे हैं और इस संकट के समय में उनके साथ खड़े होने की कसमें खा रहे हैं। केंद्र सरकार और सत्ताधारी दल की ऐसी एकजुट आवाज कभी किसी पत्रकार के लिए नहीं देखी गई थी।

एडिटर्स गिल्ड, इंडिया टीवी, आजतक और कई स्वतंत्र पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने भी अर्णब की गिरफ्तारी की निन्दा की है। अर्णब गोस्वामी के साथ धक्का-मुक्की को भी गलत बताया है। दलील है कि अर्नब गोस्वामी जैसे वरिष्ठ पत्रकार के साथ ऐसा सलूक नहीं किया जाना चाहिए। 'द वायर' के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन जैसे कथित उदारवादी पत्रकार भी अर्नब के लिए इस दलील के साथ खड़े हैं कि महाराष्ट्र सरकार ने अर्नब के खिलाफ इसलिए कार्रवाई की है क्योंकि वे मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ खबरें दिखाते रहे हैं। उनकी दलील है कि अगर वे महाराष्ट्र सरकार के पक्ष में खबर दिखाते तो उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। यहां तक कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी प्रेस की आजादी और लोकतंत्र की हत्या का मर्सिया पढ़ रहे हैं। पर कमाल देखिए कि वे अर्नब की गिरफ्तारी के बरक्स लोकतंत्र की हत्या पर मर्सिया पढ़ते समय यह भूल गए कि यूपी में उनकी सरकार ने पिछले एक साल में 15 पत्रकारों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दायर किया है।

बानगी के तौर पर चंद मामले पेशेनजर है। जनसंदेश टाइम्स के सुरेश बहादुर सिंह और धनंजय सिंह पर ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के उल्लंघन के आरोप में केस दर्ज किए गए। क्वारेंटाइन सेंटर पर बदइंतजामी की खबर छापने के बाद सीतापुर में रवींद्र सक्सेना पर केस दर्ज हुआ। वाराणसी की सुप्रिया शर्मा को इसलिए मुकदमों में फंसाया गया क्योंकि उन्होंने पीएम के गोद लिए गांव डोमरी में भूखे रहने को मजबूर लोगों की खबर दिखाई थी। सरकारी स्कूल में मिड डे मील में बच्चों को नमक-रोटी खिलाने की खबर छापने पर मिर्जापुर के पत्रकार पंकज जायसवाल पर केस दर्ज करा दिया गया। बिजनौर में पांच पत्रकारों के खिलाफ केस दर्ज हुए जब दबंगों के डर से वाल्मीकि परिवार के पलायन की खबर छापी गई, इनमें आशीष तोमर, शकील अहमद, लाखन सिंह, आमिर खान और मोइन अहमद शामिल हैं। लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार असद रिजवी पर सितंबर में मुहर्रम के दौरान शांति भंग करने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया। 'द वायर' के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ अयोध्या में 2 एफआईआर दर्ज की गई। लॉकडाउन के बावजूद एक समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शामिल होने संबंधी खबर छापने और अफवाह फैलाने का दोष उन पर मढ़ा गया।

लॉकडाउन के दौरान एक नेत्रहीन दंपती को कम्युनिटी किचन से खाना लेने में हो रही दिक्कत संबंधी खबर छापने पर फतेहपुर के पत्रकार अजय भदौरिया पर एफआईआर दर्ज की गई। प्रशांत कनौजिया को मुख्यमंत्री के खिलाफ ट्वीट करने पर अलग-अलग मामलों में 2 बार गिरफ्तार किया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप पर रिहाई के बाद दूसरी बार यूपी पुलिस ने उन्हें दिल्ली से गिरफ्तार किया। ताजा मामले में हाथरस सामूहिक दुष्कर्म घटना की रिपोर्टिंग करने गए केरल के पत्रकार कप्पन को गिरफ्तार किया गया, वे अब भी जेल में हैं। ये सारे उदारहण अकेल यूपी सरकार के हैं, जहां पत्रकारों को गिरफ्तार कर प्रेस की आजादी और लोकतंत्र को मजबूती दी गई। पिछले 6 सालों में केन्द्र सरकार ने भी तमाम ऐसी बानगियां पेश की हैं। कश्मीर टाइम्स का दफ्तर बीते महीने ही सील किया गया है। अखबार की संपादक अनुराधा भसीन लंबे समय से कश्मीर में ज्यादती के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रही हैं। यहां पत्रकारों पर जुल्म के उदाहरण एक से बढ़कर एक हैं। अनलॉफुल प्रिवेन्शन एक्ट यानी यूएपीए के तहत पत्रकारों को जेलों में ठूंस दिया गया। मशरत जाहरा, गौहर गिलानी, द हिन्दू के श्रीनगर संवाददाता पीरजादा आशिक को 5 अगस्त 2020 के बाद जेलों में डाला गया। इससे पहले भी कश्मीर नैरेटर की आसिफ सुल्तान पर 27 अगस्त, 2018 को यूएपीए के तहत केस दर्ज किया गया। तो काजी शिबली पर 25 जुलाई 2019 को।

कर्नाटक में पत्रकार डी. नरसिम्हमूर्ति को माओवादी बताकर गिरफ्तार कर लिया गया। कर्नाटक में ही सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शन में मारे गए व्यक्ति के परिजनों से बात करने पर केरल के 5 पत्रकारों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। केरल के सीएम ने जब कर्नाटक के सीएम को चिट्ठी लिखी तब उन्हें छोड़ा गया था। कहने की दरकार नहीं कि पिछले 6 सालों में पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को केन्द्र सरकार और भाजपा सरकारों के खिलाफ खबरें छापने पर जितनी कीमत चुकानी पड़ी है, उतनी इमरजेंसी में भी नहीं चुकानी पड़ी थी। उन पर राजद्रोह के मुकदमे लगाना तो अब आम दस्तूर बन चुका है। पर जहां तक अर्नब का मामला है तो मामला अलहदा है। उन्हें महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ जहर उगलने और खबरें दिखलाने के लिए गिरफ्तार नहीं किया गया है। अलबत्ता, उनपर दो लोगों को आत्महत्या के लिए मजबूर किए जाने का मामला है, जो बेहद शर्मनाक और संगीन जुर्म है। (जारी...)
शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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