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गतिरोध बरकरार

Wednesday, January 13, 2021 10:40 AM
फाइल फोटो।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तीनों विवादित कृषि कानूनों पर अगले आदेश तक के लिए रोक लगा दी। साथ ही न्यायालय ने इन कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले किसानों और सरकार के बीच व्याप्त गतिरोध दूर करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित की है। अदालत की ओर से गठित की जाने वाली समिति इन कानूनों को लेकर किसानों की शंकाओं और शिकायतों पर विचार करेगी। कोर्ट के मुताबिक इस समिति में भारतीय किसान यूनियन के भूपेंद्र सिंह मान और शेतकारी संगठन के अनिल घानवत शामिल होंगे। इसके साथ ही प्रमोद कुमार जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी समिति के अन्य दो सदस्य होंगे। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने समस्या के समाधान के लिए एक समिति का गठन तो कर दिया है। पर क्या यह समिति किसानों की समस्या को हल कर पाने में सक्षम होगी? क्योंकि इसमें शामिल सभी सदस्य ऐसे हैं जो पहले से ही सरकार की ओर से लाए गए तीनों कृषि कानूनों के समर्थक हैं। अशोक गुलाटी तो शुरुआत से ही तीन कृषि कानूनों के बड़े पैरोकार रहे हैं। वे बाजप्ता अखबारों मे लेख लिखकर और खबरिया चैनलों पर कानून के पक्ष में माहौल बना रहे हैं।

जानकारों के मुताबिक बाकी तीन सदस्यों भी नए कानून के समर्थक बताए जाते हैं। ऐस में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर यह समिति किस हद तक समस्या का समाधान कर पाएगी? क्योंकि किसानों की मांग तीनों विवादित कृषि कानूनों को रद्द करने की है। लिहाजा, सोमवार को जब सुप्रीम कोर्ट ने समिति गठित करने के सवाल पर किसानों की राय जाननी चाही थी तो किसानों ने ऐसी किसी समिति से बाहर रहने का फैसला किया था। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख सरकार के लिए कठोर माना जा रहा है। क्योंकि सोमवार को थोड़े तल्ख लहजे में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सरकार से कहा कि आप कानून को होल्ड कर रहे हैं या नहीं? अगर नहीं, तो हम कर देंगे। वार्ताओं की विफलता, सरकार की ओर से आंदोलन खत्म न करने की पहल, धरना स्थलों पर हो रही आत्महत्याएं, आंदोलन में बुजुर्गों, महिलाओं की भागीदारी, इन सब पर अदालत ने केंद्र सरकार के लिए नाराजगी दिखलाई और मामले के समाधान के लिए एक समिति बनाने का फैसला किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान किया जिनमें दिल्ली की सीमाओं पर हजारों की संख्या में इकट्ठे किसानों को वहां से हटाने की मांग की गई थी। गौर करने की बात है कि मामले के समाधान के लिए समिति गठित करने का प्रस्ताव सरकार पहले भी किसानों को दे चुकी है। जिसे किसानों ने खारिज कर दिया था। असल में, सरकार समिति गठित कर बीच का रास्ता निकालना चाहती है। जो किसानों का मंजूर नहीं है। संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा जारी बयान में साफ कहा है कि उसे कृषि कानूनों को वापस लेने से कम की कोई शर्त मंजूर नहीं है और इसलिए कानूनों की वापसी से पहले उसे किसी से कोई बातचीत में दिलचस्पी नहीं है। संयुक्त किसान मोर्चा ने सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित की जाने वाली समिति से खुद को दूर रखने का फैसला किया है। मोर्चा ने सोमवार देर शाम एक बयान जारी कर कहा कि किसी भी आंदोलन में शामिल एक भी किसान संगठन इस समिति से बात नहीं करेगा। संयुक्त किसान मोर्चा के डॉ. दर्शन पाल की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया है कि किसान कानूनों के खिलाफ लड़ाई की अगुवाई करने वाले सभी किसान संगठन अपने इस फैसले पर एकमत हैं कि कानूनों को तत्काल रद्द किया जाना चाहिए। यही वजह रही कि मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने विरोध कर रहे किसानों से भी सहयोग करने का अनुरोध किया और कहा कि कोई भी ताकत उसे गतिरोध दूर करने के लिए इस तरह की समिति गठित करने से नहीं रोक सकती है।

लिहाजा, सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की ओर से किसानों के लिए कही गई तमाम खुशगवार बातों और कानून को अगले आदेश तक टालने के फैसले के बाद यह साफ हो चुका है कि सुप्रीम कोर्ट वही कर रहा है जो सरकार चाह रही है। असल में, किसानों को भी इस बात की आशंका है लिहाजा उनने समिति गठित कर समस्या से समाधान के सुप्रीम कोर्ट के सुझाव को खारिज कर दिया है और समिति से दूर रहने का फैसला किया है। गाजीपुर बॉर्डर पर बैठे यूपी के पीलीभीत के किसान पलबिंदर सिंह कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट और सरकार का मकसद केवल किसानों के आंदोलन को टालना है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को किसान संगठनों से कहा कि यह राजनीति नहीं है। राजनीति और न्यायतंत्र में फर्क है और आपको सहयोग करना ही होगा। मगर दूसरी ओर तो किसानों को सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के पीछे ही सरकार की सियासत नजर आ रही है। गंभीर सवाल है कि आखिर किसान सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं? तो क्या मुल्क में लोकतंत्र गंभीर संकट के दौर में प्रवेश कर चुका है?
-शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)   

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