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सियासत में अपराध और लाचार सुप्रीम कोर्ट

Saturday, February 15, 2020 10:25 AM
फाइल फोटो

लंबे अरसे के बाद एक बार फिर से सियासत में अपराधिकरण की बात जेरेबहस है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में कहा है कि कोई सियासी पार्टी अगर किसी अपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बनाती है, तो उस उम्मीदवार के सभी अपराधिक मामलों की जानकारी पार्टी को अपनी वेबसाइट पर अपलोड करनी होगी। पार्टी को ये भी बतलाना होगा कि पार्टी ने आखिर किन कारणों से ऐसे व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा पार्टी की ये भी जिम्मेदारी होगी कि ऐसे दागदार छवि वाले उम्मीदवार की जानकारी पार्टी के आधिकारिक फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल पर भी दी जाए। एक स्थानीय और कम से कम एक राष्ट्रीय अखबार में भी पार्टी को ऐसे उम्मीदवार की जानकारी देनी होगी। अपराधिक छवि वाले व्यक्ति को पार्टी का उम्मीदवार बनाए जाने के 72 घंटों के अंदर पार्टी को उम्मीदवार से जुड़ी सारी जानकारियां चुनाव आयोग को देनी होगी। जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस एस रवींद्र भट्ट की बेंच ने उक्त फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर कोई पार्टी ऐसा नहीं करती है तो चुनाव आयोग कार्रवाई करेगा। यह पहला मौका नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने अपराधिकरण को लेकर किसी तरह की टिप्पणी की है। इससे पहले पहले सितंबर 2018 में भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि चुनाव लड़ने से पहले प्रत्येक उम्मीदवार अपना अपराधिक रिकॉर्ड निर्वाचन आयोग के समक्ष घोषित करे। साथ ही उसने सभी राजनीतिक दलों से कहा था कि वे अपने उम्मीदवारों के संबंध में सभी सूचनाएं अपनी वेबसाइट पर अपलोड करें। तब के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा था कि नागरिकों को अपने उम्मीदवारों का रिकॉर्ड जानने का अधिकार है। पीठ ने अपने फैसले में विधायिका को निर्देश दिया था कि वह राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त कराने के लिए कानून बनाने पर विचार करे।

अदालत ने तब कहा था कि किसी मामले में जानकारी प्राप्त होने के बाद उस पर फैसला लेना लोकतंत्र की नींव है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का अपराधीकरण चिंतित करने वाला है। वैसे सियासत में अपराधिकरण की बात आगे बढ़ाने से पहले शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की एक और टिप्पणी पर गौर कर लेना जरूरी है, जिससे यह अंदाजा लग सके कि सत्ताधारी सरकार और मुल्क की अहम सियासी पार्टियां सुप्रीम कोर्ट की ऐसी टिप्पणियों को लेकर कितनी गंभीर हैं। टेलीकॉम कंपनियों के बकाए से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरुण मिश्रा को शुक्रवार को यहां तक कहना पड़ा है कि क्या सरकार की नजर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई अर्थ नहीं रह गया है? अपना रोष प्रकट करते हुए उनने यहां तक कहा कि क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट को ही बंद कर दिया जाए। सवाल है कि कारपोरेट पर कार्रवाई को लेकर सरकार जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अनदेखा कर सकती है तब भला वे सियासत के अपराधिकरण जैसे मुद्दों को आखिर क्यों गंभीरता से लेने लगे? आज मुल्क में ऐसी कोई भी सियासी दल नहीं है जिसने चुनाव में अपराध के आरोपी या दागी कहे जाने वाले उम्मीदवार न उतारें हों। अधिक पीछे जाने की दरकार नहीं है। अगर लोकसभा के सूरतेहाल पर ही गौर करें तो तस्वीर साफ हो जाती है। इस बार कुल 543 सांसदो में 159 सांसदों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर अपराधिक मामले लंबित हैं। यह आंकड़ा तकरीबन 30 फीसद का है। इनमें साध्वी प्रज्ञा सिंह जैसे आतंकवाद की आरोपी भी हैं। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, अपराधिक मामलों में फंसे सांसदों की संख्या दस साल में 44 प्रतिशत बढ़ गई है। भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां तो दशकों से सियासत कर रही हैं लिहाजा वे इस अपराधिकरण के दलदल में दूसरे दलों की तुलना में अधिक धंसी नजर आती हैं। मगर, खुद को दूसरों से अलग होने का दावा करने वाली और तुलनात्मक रुप से नई नवेली पार्टी भी बहुत कम समय में इस दलदल में जा धंसी है। दिल्ली के बीते विधानसभा का आंकड़ा भी चौंकाने वाला था। दिल्ली विधानसभा चुनाव में 70 में से 42 उम्मीदवार दागी थे। यह आंकड़ा 60 फीसद का है। कहने की दरकार नहीं कि इसमें अधिकांश आम आदमी पार्टी के ही विधायक थे। यानी सुप्रीम कोर्ट की ओर से सियासत के अपराधिकरण को लेकर चिंता प्रकट करना अपनी जगह और सियासत की जमीनी सच्चाई अपनी जगह।

यह हकीकत है कि सियासत में अपराधिकरण को रोकना थोड़ा कठिन है क्योंकि हमारे संविधान ने जब तक कोई किसी अपराध में  दोषी सिद्ध नहीं हो जाता, वह चुनाव की प्रक्रिया में हिस्सा ले सकता है। पर जनता अपने विवेक से इस समस्या पर नियंत्रण लगा सकती है। पर संकट यह है कि आज कि चुनावी सियासत दो हिस्सों में बंटी है। एक वे जिनके पास पैसा है यानी जो सत्ता से पत्ता और पत्ता से सत्ता के खेल के खिलाड़ी हैं, दूसरे वह जनता जो जीवन भर मतदाता बने रहने के लिए अभिशप्त है। जरा सोचिए मसला टेलीकॉम कंपनियों से एक लाख 47 हजार करोड़ रुपये के सरकारी धन की उगाही का है। मगर, सुप्रीम कोर्ट भी वह उगाही नहीं करवा पा रहा। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को भी अपनी बेबसी पर सरकारी वकील के सामने रोष जाहिर करना पड़ रहा है। यह यों ही नहीं है। असल में, इस मुल्क में पैसा और अपराध सत्ता पाने का जरिया बन चुका है।

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

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