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Tuesday 29th of September 2020
 
इंडिया गेट

सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और गांधी

Saturday, August 29, 2020 10:10 AM
सुप्रीम कोर्ट।

वकील प्रशांत भूषण के दो ट्वीट के बरक्स अदालत की अवमानना मामले में आखिर सुप्रीम कोर्ट क्यों चाहता है कि वे माफी मांग लें? अगर कोर्ट ने पाया है कि उनके ट्वीट से अदालत की अवमानना हुई है तो उन्हें उसकी वाजिब सजा क्यों नहीं देना चाहता? मामले का दिलचस्प पहलू यह है कि 15 अगस्त की पूर्व संध्या को प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना दोषी ठहराया गया और सजा के लिए 20 अगस्त की तारीख मुकर्रर की गई। मगर, 20 अगस्त को सजा की सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने माफी मांगने से इनकार करते हुए अपने लिए सजा की मांग की। उनने अपना बयान पेश करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ से कहा कि वे माफी नहीं मांगेंगे और न ही उनके प्रति किसी भी तरह की उदारता बरतने की अपील करते हैं। उनने कहा कि कोर्ट जो भी सजा उन्हें देगा, उसे वे स्वीकार करेंगे। पर कोर्ट उनपर लगातार माफी मांगने का दबाव बनाता रहा। जब दबाव के आगे प्रशांत भूषण झुकते नजर नहीं आए तो सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को उनके बयान पर पुनर्विचार करने के लिए 2-3 दिन का समय दिया। हालांकि प्रशांत भूषण ने दो टूक लहजे में कोर्ट से कहा कि उनने बहुत सोच-समझकर अपना बयान पेश किया है और इस तरह बेवजह समय देना कोर्ट के समय को बर्बाद करना होगा।

बीते सोमवार को मामले की जब दोबारा सुनवाई हुई, तो कोर्ट की दोबारा कोशिश थी कि प्रशांत भूषण माफी मांगें। जस्टिस अरुण मिश्रा ने पूछा, हमें बताएं कि माफी शब्द का उपयोग करने में क्या गलत है? माफी मांगने में क्या गलत है? क्या दोषी का प्रतिबिंब होगा? माफी एक जादुई शब्द है, जो कई चीजों को ठीक कर सकता है। मैं प्रशांत के बारे में नहीं बल्कि सामान्य तौर पर बात कर रहा हूं। यदि आप माफी मांगते हैं तो आप महात्मा गांधी की श्रेणी में आ जाएंगे। गांधी जी ऐसा करते थे। यदि आपने किसी को चोट पहुंचाई है, तो आपको मरहम लगाना चाहिए। मगर प्रशांत भूषण अपनी बात पर अड़े रहे और अपने विचारों को व्यक्त करने पर सशर्त अथवा बिना किसी शर्त माफी मांगना ठीक नहीं होगा। उन्होंने कहा कि निष्ठाहीन माफी मांगना मेरे अन्त:करण की और एक संस्था की अवमानना के समान होगा। अब जस्टिस अरुण मिश्रा ने अगर जिक्र गांधी की छेड़ी है तो मामले के बरक्स गांधी की ओर लौटना जरूरी हो जाता है। तब मामला बॉम्बे हाईकोर्ट से बावस्ता था। रौलट एक्ट और ब्रिटिश सरकार की दूसरी दमनकारी नीतियों के खिलाफ दो वकीलों ने सत्याग्रह के शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किया था। जिसके बाद कोर्ट की ओर से उन दो वकीलों के खिलाफ नोटिस जारी किया गया। इस मुद्दे पर गांधी ने यंग इंडिया में लिखा कि बॉम्बे के आस पास ओडायर की आत्मा की गूंज सुनाई दे रही है।

उन्होंने लिखा कि न्यायमूर्ति कैनेडी ने न्यायिक मानदंडों का उल्लंघन करते हुए दो वकीलों पर अभियोग लगाकर खुद को किसी ऐसे शख्स के रूप में छला है, जो पूर्वाग्रह के साथ इस मुद्दे को हल करने का दोषी है। गांधी के इस लेख के बरक्स बॉम्बे हाईकोर्ट ने गांधी से कोर्ट की ओर से जारी नोटिस के प्रकाशन और उस पर की गई टिप्पणी पर अपनी सफाई पेश करने को कहा। हाईकोर्ट ने गांधी से पूछा कि न्यायमूर्ति के खिलाफ की गई टिप्पणी के लिए उन्हें अदालत की अवमानना का दोषी क्यों नहीं करार दिया जाए। हाईकोर्ट की ओर से गांधी को निर्देश दिया गया कि वे एक निश्चित तारीख तक मुख्य न्यायाधीश के सामने उनके चैम्बर में आकर अपनी सफाई पेश करें। नोटिस के जवाब में गांधी ने कहा कि वह पंजाब के रास्ते में हैं और उक्त तारीख पर मुख्य न्यायाधीश के सामने पेश होने की हालत में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने कहा कि लिखित में वे अपनी सफाई भेजना पसंद करेंगे। गांधी के उस प्रस्ताव को मुख्य न्यायाधीश ने स्वीकार कर लिया। गांधी ने अपनी सफाई में लिखा कि मेरे विचार में एक पत्रकार के रूप में (जस्टिस केनेडी) के पत्र को प्रकाशित करना और उस पर टिप्पणी करना मेरे पत्रकार होने के जद के भीतर का अधिकार है। मेरा मानना है कि यह पत्र सार्वजनिक महत्व का है और इस पर सार्वजनिक टिप्पणी की जरूरत है।

बॉम्बे हाईकोर्ट गांधी की यह सफाई नागवार गुजरी और उन्हें कोर्ट की ओर से आदेश दिया गया कि वे यंग इंडिया में अपना माफीनामा प्रकाशित करें। इस आदेश के साथ माफीनामे का एक ड्राफ्ट भी नत्थी कर दिया गया था। मगर, गांधी ने यंग इंडिया में माफीनामे को प्रकाशित करने से इनकार कर दिया। उन्होंने पत्र के जरिए कोर्ट से कहा कि वह किसी भी माफीनामे को प्रकाशित नहीं करेंगे और दो टूक लहजे में कहा कि जिस समय चारों तरफ व्यापक तनाव है और जब न्यायपालिका भी लोकप्रिय पूर्वाग्रह से प्रभावित हो रही है, जस्टिस कैनेडी की ओर से दो वकीलों को जारी नोटिस को प्रकाशित करके उनने एक उपयोगी सार्वजनिक कर्तव्य निभाया है। कहने की दरकार नहीं कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के ताजा मामले में गांधी के करीब कौन खड़ा है और किसे गांधी को फिर से पढ़ने की जरूरत है?
शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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