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विरोध का संवैधानिक दायरा

Friday, January 03, 2020 13:45 PM
पिनरई विजयन (फाइल फोटो)

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शनों के बीच केरल विधानसभा ने इसे वापस लेने की मांग करते हुए मंगलवार को एक प्रस्ताव पारित किया। केरल विधानसभा के एक दिन के विशेष सत्र में सत्तारूढ़ माकपा नीत एलडीएफ और विपक्षी कांग्रेस नीत यूडीएफ ने प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि भाजपा के एकमात्र विधायक ओ. राजगोपाल ने असहमति जताई। इस मौके पर सीएम पी. विजयन ने कहा कि संविधान विरोधी कानून के लिए कोई जगह नहीं है। केरल विधानसभा द्वारा उठाया गया यह कदम इसलिए अहम है, क्योंकि सीएए के खिलाफ किसी राज्य सरकार द्वारा उठाया गया यह पहला ऐसा कदम है। इससे पहले अब तक राज्य सरकारों ने या विपक्षी सूबे के मुख्यमंत्रियों ने या तो कानून के खिलाफ रैलियां निकालकर या फिर मौखिक रूप से ही इस कानून का विरोध किया है।

इस विवादित कानून का सबसे सक्रिय विरोध करने वालों में सबसे अहम नाम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का है, जिनने एनआरसी के साथ-साथ सीएए के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। बीते 2 हफ्तों में वे तकरीबन दर्जनभर से अधिक रैलियां कर चुकी हैं। स्वामी विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पैतृक निवास सहित कई महत्वपूर्ण इलाकों में पदयात्रा निकाल कर ममता लगातार यही संदेश दे रही हैं कि यह कानून मुल्क की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद को नष्ट करने वाला है। एनसीपी के सुप्रीमो शरद पवार ने भी ममता बनर्जी को पत्र लिखकर समर्थन दिया है। शरद पवार ने पत्र में लिखा है कि वे इस मुद्दे पर ममता बनर्जी से पूरी तरह सहमत हैं और नागरिकता कानून तथा राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लागू करने का विरोध करने वाले सभी नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने की शपथ लेते हैं।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार संविधान के साथ खिलवाड़ कर रही है। साथ ही बीजद शासित ओडिशा और भाजपा के सहयोगी जेडीयू के नेतृत्व वाले बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब सहित तमाम सूबों ने ऐलान कर दिया है कि वे अपने-अपने सूबों में इस कानून को लागू नहीं होने देंगे। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ कानून के विरोध में रैलियां निकाल चुके हैं। पर यह पहला मौका है जब संसद की ओर से पारित इस कानून का किसी संवैधानिक संस्था ने औपचारिक विरोध किया हो। केरल सरकार के इस फैसले से केन्द्र से टकराव भी लाजमी है। केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पिनरई विजयन के इस फैसले पर कहा कि यह केवल संसद है, जिसे नागरिकता के संबंध में किसी भी कानून को पारित करने का अधिकार मिला है, केरल विधानसभा सहित किसी भी सूबे की विधानसभा को यह अधिकार नहीं है। तो सूबे के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भी केरल सरकार के इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने कहा है कि चूंकि नागरिकता का सवाल केन्द्र का विषय है, लिहाजा केरल सरकार को कानून के विरोध में प्रस्ताव पारित करने का अधिकार नहीं है।

अगर कायदे से देखें तो रविशंकर प्रसाद और आरिफ मोहम्मद खान की यह दलील सही है कि संविधान के प्रावधानों के मुताबिक नागरिकता केन्द्र सरकार का विषय है, लिहाजा राज्यों को इस बारे में किसी तरह का कानून पारित करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है। हमारे संविधान ने संघीय ढांचे का ख्याल रखते हुए केन्द्र और राज्यों के बीच काम बांट रखे हैं। और उस आधार पर नागरिकता का सवाल केन्द्र के जिम्मे है। लिहाजा, केरल सरकार की ओर से कानून के विरोध में पारित इस प्रस्ताव का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। रविशंकर प्रसाद ने विजयन को संविधान के किसी जानकार से सलाह लेने की नसीहत दी है। बतौर मुख्यमंत्री और एक मजे हुए सियासतदां के तौर पर विजयन संविधान के इस प्रावधान से अवगत होंगे। फिर भी उन्होंने नागरिकता कानून के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने का जो तरीका अपनाया है तो मुमकिन है उसकी अपनी सियासी वजह हो सकती है। क्योंकि उनके इस सियासी कदम के बाद केन्द्र सरकार के नुमाइंदे संविधान की दुहाई देने लगे हैं, जो एक हद तक सही भी है।

इसके साथ ही बहस कानून की संवैधानिकता पर भी शुरू हो जाती है, क्योंकि हमारा संविधान धर्म के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव की इजाजत नहीं देता। जबकि यह कानून पहली नजर में संविधान की इस भावना के खिलाफ नजर आता है। साथ ही अब केरल सरकार के इस कदम के खिलाफ तमाम विपक्षी दलों की सरकारों पर भी इस तरह का प्रस्ताव पारित करने का सियासी दवाब बनने लगा है। यह सवाल उठने लगा है कि बाकी विपक्षी दलों की सरकारें कब इस तरह का प्रस्ताव पारित करने वाली हैं? मगर विरोध का यह गैर-संवैधानिक तरीका बहुत मुफीद नहीं। बेहतर तो यही होगा कि विपक्ष केन्द्र की ओर से पारित एक विवादित कानून के विरोध का वही सियासी तरीका अपनाए जो वे अब तक अपनाती रही है। क्योंकि संविधान के दायर से बाहर जाकर विरोध करने से इसकी धार ही कुंद होगी और सरकार को विपक्ष के तौर तरीकों पर अंगुली उठाने के बेवजह मौका मिलेगा। 
शिवेश गर्ग  (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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