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कांग्रेस का फैसला बेसबब नहीं

Saturday, April 27, 2019 09:15 AM

जब से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने रायबरेली में कार्यकर्ताओं से पूछा था कि क्या मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ जाऊं, तभी से अटकलों का बाजार गर्म था कि वे वाराणसी से चुनाव लड़ सकती हैं। इस बीच, उनने इन अटकलों को यों कहकर भी हवा दी कि अगर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कहेंगे तो वे वाराणसी से चुनाव लड़ सकती हैं। तो राहुल गांधी ने भी प्रियंका के वाराणसी से चुनाव लड़ने पर सस्पेंस बरकरार रखा। इस दौरान दिए गए अपने साक्षात्कारों में भी वे कहते रहे कि कुछ बातों में अगर सस्पेंस बना रहे तो बुरा नहीं होता। पर कई दिनों के गहरे सस्पेंस के बाद जब राज खुला तो कई लोगों को निराश कर गया।

पर खासतौर से उन लोगों को, जो वाराणसी से नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार उतारने के पैरोकार थे। दिलचस्प है कि इन पैरोकारों में भाजपा नेता और मुल्क के वित्तमंत्री अरुण जेटली भी हैं। प्रियंका के वाराणसी से चुनाव न लड़ने से उन्हें निराशा हुई है। उनने फरमाया है कि प्रियंका का वारणसी से चुनाव न लड़ना निराशाजनक है। मुमकिन है अरुण जेटली के इस तंजिया लहजे का अपना सियासी मायना हो। पर वक्ती हकीकत यह है कि कांग्रेस ने तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए अजय राय को एक बार फिर वाराणसी लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। अजय राय इससे पहले 2014 में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस सीट से टक्कर दे चुके हैं और तब वे यहां तीसरे नंबर पर रहे थे।

यानी तमाम सस्पेंस के बाद कांग्रेस ने तुलनात्मक रुप से नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एक कमजोर उम्मीदवार उतारा है। कांग्रेस के इस कदम की खिल्ली भी उड़ाई जा रही है। किन्हीं आशीष प्रदीप ने लिखा है, ‘कांग्रेस मस्त पार्टी है, बाकी सब उम्मीदवार घोषित करते हैं, वो बलि का बकरा।’ बात लाजमी है, लिहाजा वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त का संदेह भी जायज है कि कि अगर कांग्रेस का वारणसी से प्रियंका को लड़ाने का कभी कोई इरादा नहीं था तो उन्हें दो-दो बार यह इच्छा नहीं जतानी चाहिए थी कि वे नरेंद्र मोदी के सामने उम्मीदवार बन सकती हैं।

इससे ऐसा लगता है कि मोदी के बनारस में (आज के) मेगा शो के आगे कांग्रेस गायब है।’ इस सवाल पर तो खुद कांग्रेस पार्टी में भी अलग-अलग सुर हैं। कांग्रेस से जुड़े तमाम मामलों पर मुखर रहे सैम प्रित्रोदा का कहना है कि वाराणसी से चुनाव न लड़ने का फैसला खुद प्रियंका का था, तो आधिकारिक प्रवक्ता राजीव शुक्ला का कहना है कि यह फैसला राहुल का है। अब फैसला जिसका भी हो, जो लोग बनारस के चुनावी दंगल को दिलचस्प देखना चाहते थे, उनकी मंशा पूरी न हो सकी। पर सवाल है कि सियासत के फैसले क्या दिलचस्पी के आधार पर लिए जाते हैं?

कांग्रेस की सियासत के लिहाज से यह सवाल अहम है कि आखिर प्रियंका के नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने भर से उसे हासिल क्या होने वाला था? मुमकिन है वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव हार जातीं। तो सवाल उठता कि सियासत में उनकी एंट्री असर पैदा न कर पायी। मुमकिन था कि वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव जीत जातीं। तो एक ’यांट किलर के तौर पर उनका कद काफी बढ़ जाता। और फिर चुनौती राहुल गांधी के नेतृत्व के लिए पैदा हो जाती। कांग्रेस का ही एक खेमा उन्हें राहुल गांधी के मुकाबले खड़ा करने में जुट जाता।

पर अहम सवाल है कि इस दोनों ही विकल्पों का आम चुनाव 2019 पर क्या असर पड़ता? अगर यूपी की ताजा सियासत पर अपन इस असर को आंके, तो प्रियंका को कांग्रेस से न लड़ाने के फैसले की वजह थोड़ी साफ जरूर होती नजर आती है। प्रियंका के मोदी से चुनाव लड़ने का असर यह होता कि यूपी में कांग्रेस थोड़ी मजबूती से लड़ती। पर इस मजबूती का नकारात्मक असर भाजपा विरोधी वोटों पर पड़ता। मतदाताओं की दुविधा बढ़ती और इस दुविधा का फायदा भाजपा को मिलता। यानी प्रियंका के एक सीट पर लड़ने का खामियाजा गठबंधन को कई सीटों पर उठाना पड़ता। और यही वजह थी कि सपा ने कांग्रेस के सस्पेंस के बीच शालीनी यादव को बतौर प्रत्याशी उतार डाला।

यानी इशारा साफ था कि अगर प्रियंका वाराणसी से चुनाव लड़ती हैं तो उन्हें मुकाबला न केवल नरेन्द्र मोदी से करना है अलबत्ता उन्हें सपा की ओर से भी चुनौती मिलेगी। सनद रहे कि सपा-बसपा के गठबंधन में जो सीटों का बंटवारा हुआ है इसमें वाराणसी सपा के हिस्से आई। सो, कहने की दरकार नहीं कि वाराणसी से प्रियंका के चुनाव लड़ने का फैसला अखिलेश यादव और मायावती को रास नहीं आया है। बेशक, सपा और बसपा ने अपने गठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं किया हो, पर 23 मई को बाद यह नौबत आ सकती है

कि दोनों यूपीए का हिस्सा हो जाएं। दोनों ही दलों ने मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को पूरे दस साल बाहर से समर्थन देते रहे हैं। लिहाजा, कांग्रेस के लिए प्रिंयका को वाराणसी से लड़ाकर दो संभावित साथियों को फिलहाल नाखुश करने का फैसला कोई समझदारी भरा नहीं माना जा सकता। बेशक, सियासी पैंतरे दिलचस्प होते हों, पर सियासत केवल दिलचस्पी पैदा करने भर का खेल नहीं होता।       

- शिवेश गर्ग

 

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