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इंडिया गेट

कांग्रेस का संकट

Saturday, May 25, 2019 09:30 AM

- शिवेश गर्ग
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने वायनाड से ऐतिहासिक जीत हासिल की। पर उनकी यह जीत फीकी पड़ गई। क्योंकि उनकी पार्टी को 2019 के आम चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा। पर इससे भी अधिक चर्चा उनके खुद के उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट से हारने की है। यह हार कांग्रेस और खुद राहुल गांधी के लिए भी बड़ा झटका है। केंद्रीय मंत्री व भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने उन्हें 50,000 से  ज्यादा मतों के अंतर से मात दी। हार के बाद राहुल गांधी ने स्मृति ईरानी को बधाई दी और अमेठी की जनता का ख्याल आगे प्यार से रखने की नसीहत भी दी।

पर अमेठी की जनता का खुद राहुल गांधी पर आरोप है कि उनसे उन्हें वह आत्मीयता नहीं मिल सकी, जो उनके दिवंगत पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलती थी। अमेठी के लोगों का कहना है कि राजीव गांधी के समय शुरू की गई कई परियोजनाएं और कार्यक्रम राहुल के सांसद रहते एक-एक कर बंद हो गए। मसलन, राजीव गांधी के समय जीवन रेखा एक्सप्रेस साल में एक बार महीने भर के लिए अमेठी आती थी। इस ट्रेन पर डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम होती थी, जो उपचार के साथ-साथ सर्जरी भी करती थी। इस सेवा से लाखों लोगों को फायदा हुआ।

लेकिन यह सेवा राहुल के सांसद रहते बंद हो गई और इस महत्वपूर्ण चिकित्सा सेवा को बहाल करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। मसला एक ट्रस्ट का भी है। असल में, राजीव गांधी ने ‘सम्राट बाइसिकिल्स’ नामक कंपनी स्थापित करने में मदद की थी। फैक्ट्री घाटे में चली गई और उसे बंद कर दिया गया। उसके बाद कंपनी की जमीन नीलामी पर लग गई, क्योंकि कंपनी पर कर्ज था। जमीन को राजीव गांधी चैरिटेबिल ट्रस्ट ने खरीद लिया।

बताया जाता है कि इस ट्रस्ट में राहुल गांधी ट्रस्टी हैं। स्मृति के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्थानीय लोगों से किसानों की जमीन वापस लौटाने का वादा किया है। बहरहाल, यह तो हार के चंद बहाने हैं। पर हकीकत तो यही है कि राहुल गांधी अमेठी की जनता से वह संवाद रख पाने में विफल रहे, जैसा उनके पिता ने बनाया था। अमेठी और रायबरेली ऐसी दो सीटें हैं जो गांधी परिवार के नाम से जानी जाती थी। इससे पहले एक सीट फूलपुर भी थी। जो नेहरू-गांधी परिवार से बावस्ता रही।

वहां से मुल्क के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू निर्वाचित हुआ करते थे। नेहरू के बाद फूलपुर और नेहरू-गांधी परिवार का रिश्ता टूट गया। लेकिन रायबरेली और अमेठी से परिवार का रिश्ता कायम रहा। पर अब राहुल गांधी से खुद अमेठी ने ही वह रिश्ता तोड़ लिया है। हालांकि पहली बार ऐसा नहीं हुआ है जब नेहरू-गांधी परिवार को ऐसा झटका पहली बार लगा हो। 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी भी समाजवादी नेता राजनारायण से चुनाव हार गई थीं। हालांकि अगले ही चुनाव में उनने फिर से अपनी सीट हासिल कर ली थी।

सियासी हलकों में उस हार से जुड़ी एक कहानी बेहद चर्चा में रही। जब सूबे में राजनारायण के खिलाफ लोगों का असंतोष बढ़ने लगा, तो भरे मंच से उनने कह डाला कि जब तुम लोग इंदिरा गांधी के नहीं हो सके, तो हमारे क्या होगे। बेशक, राजनारायण ने यह बात किसी खुंदक में कही हो, पर लोकतंत्र की यह बुनियादी हकीकत है कि जनता ही मालिक है, वह बंधुआ मजदूर नहीं है। वह जिस पर भरोसा जताती है वह उससे उम्मीद भी करती है, पर जब वह भरोसा पूरा नहीं होता, तो पटलकर वार भी करती है। मुमकिन है

आज केवल अमेठी में ही नहीं अलबत्ता पूरे मुल्क में कांग्रेस पार्टी को किसी वैसे ही पटलवार का शिकार होना पड़ा है। कांग्रेस की सियासी सेहत पर 2014 के मुकाबले 2019 में भी उसकी हालत में कोई खास फर्क नहीं आया है। मजह 8 सीटों के इजाफे के साथ 52 सीटों के आंकड़े को देखें तो कहा जा सकता है कि वह मजबूत विपक्ष भी नहीं बन पाई है। सवाल उठना लाजमी है कि आखिर मुल्क की सबसे पुराने पार्टी का यह हाल कैसे हो गया। जानकार मानते हैं कि जमीनी स्तर पर संगठन की लचर हालत कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल है।

यह बात और है कि अपन इस दलील से सहमत पूरी तरह सहमत नहीं है, क्योंकि कांग्रेस कभी कैडर बेस पार्टी नहीं रही। वह मॉस की पार्टी है। मुद्दों के आधार पर सत्ता में आती है और मुद्दों से जब चूकती है तो सत्ता से बाहर होती है। मुमकिन है राहुल गांधी जो मुद्दे उठा रहे थे, वह मध्यम वर्ग और युवाओं को प्रभावित नहीं कर सके हों। असल में, यह संवादहीनता का संकट है। मुमकिन है यह ग्रैंड ओल्ड पार्टी युवाओं के जेहन को समझने और उन्हें अपनी बात नहीं समझा पा रही।

वैसे, फिलहाल तो कांग्रेस के साथ यह संकट तो दिखता ही है कि उसके पास उत्तर भारत में अच्छी हिन्दी बोलने वाला ढंग का एक प्रवक्ता तक नहीं हैं। जनता से ‘कनेक्ट’ कर पाने के मामले में भाजपा से मीलों पीछे है। फिलहाल तो कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट सही दिखता है। मुमकिन है अमेठी की हार की वजह भी इस कनेक्ट का कमजोर होना ही है।                       

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