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इंडिया गेट

दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बजट और आम जनता

Wednesday, February 05, 2020 10:20 AM
नरेन्द्र मोदी (फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा संसदीय दल की बैठक में अपने सांसदों को बताया है कि दुनिया की आर्थिक हालत के मद्देनजर इस साल का बजट सर्वश्रेष्ठ बजट है। मुमकिन है बजट के बाद जो नाउम्मीदी पैदा हुई है। प्रधानमंत्री उसके बरक्स अपने सांसदों का उत्साह बढ़ा रहे हों। पर यह सर्वश्रेष्ठ बजट तब माना जाता जब मुल्क में तारी आर्थिक संकट तो दूर करने के लिए बजट में चंद कदम उठाए गए होते। हकीकत यह है कि इस बार का बजट उन तमाम मुद्दों और सवालों से नजरें चुराता नजर आ रहा है, जिनसे मुल्क की अर्थव्यवस्था रुबरु है। बेरोजगारी, महंगाई व गरीबी कम करने, राजकोषीय घाटा और पटरी से उतर चुकी अर्थव्यवस्था के लिहाज से बजट में कुछ भी साफ नहीं है। न तो साफ उद्देश्य दिखता है और ना ही वे कदम ही नजर आए, जो सरकार की ओर से किए गए वादों को पूरा करने के लिए जरूरी है। मुल्क में आज बेरोजगारी की दर ऐतिहासिक ऊंचाई पर है। पर सरकार अपने बजट में यह बतलाने में पूरी तरह से विफल रही है कि हर साल शिक्षा पाकर निकलने वाली पीढ़ी को रोजगार मुहैय्या कराने के लिए उसके पास कौन से उपाए हैं। नोटबंदी और जीएसटी जैसी योजनाओं ने मुल्क के असंगठित क्षेत्र को बर्बाद कर दिया है। यह क्षेत्र तकरीबन 93 फीसद रोजगार मुहैय्या करता है, लेकिन इस क्षेत्र को संकट से उबारने के लिए बजट में किसी तरह का प्रावधान नजर नहीं आता। वजह साफ है कि सरकार यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि नोटबंदी-जीएसटी ने असंगठित क्षेत्र को तबाह कर डाला है और यही तबाही मुल्क की आर्थिक संकट की असली वजह है। बजट यह कहीं नहीं बताता कि जिनके धंधे चौपट हो गए हैं, उन्हें कैसे उबारा जाए और सवाल केवल असंगठित क्षेत्र की बेरोजगारी का ही नहीं है।

इस बार के बजट में ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों के लिए मनरेगा जैसी योजना के बजट में भी 9 हजार करोड़ की कटौती कर दी गई है। भारत आज दुनिया के 116 मुल्कों की भूख सूचकांक की सूची में 102 वें पायदान पर है। जाहिर है भारत को भुखमरी की हालत में सुधार के लिए युद्ध स्तर पर कोशिश करने की दरकार है। मगर अबके बजट में खाद्य सब्सिडी का बजट 70 हजार करोड़ रुपए घटा दिया गया है। पिछले साल सब्सिडी का बजट 1.85 लाख करोड़ रुपए था। पर इस बार की बजट में इसे घटाकर 1.15 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। खबर है कि फूड कार्पोरेशन दिवालिया होने की कगार पर है। वह पहले से दो लाख करोड़ रुपए के कर्जे में डूबी है। कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस का भविष्य गहरे संकट में है। जब मुल्क में भूख से मरने की खबरें आ रहीं हो ऐसे में बजट की सूरत डराने वाली है। सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के बजट में भी भारी गिरावट है। कहने की दरकार नहीं का अर्थव्यवस्था पर तारी संकट बजट पर साफ नजर आता है। यानी सरकार के पास खर्च करने के लिए पैसे का बेहद अभाव है। यही वजह है कि सरकार को खर्च चलाने के लिए एकमात्र उपाय निजीकरण में नजर आया है। बड़ी तेल कंपनियों, बीएसएनएल और एयर इंडिया के बेचने या आंशिक निजीकरण की घोषणा के बाद कमाऊ एलआईसी के भी आईपीओ बेचने का संकल्प सामने आ गया है। इतना ही नहीं स्वास्थ्य सेवाओं को भी निजी हाथों में सौंपने की बजट में पूरी तैयारी दिखती है। बजट में ऐलान किया गया है कि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल के तहत जिला अस्पतालों के साथ मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे। इन मेडिकल कॉलेज के लिए शुरुआती पूंजी भी प्राइवेट कंपनियों को सरकार ही देगी। जिसका पैसा मेडिकल उपकरणों पर सेस लगाकर जुटाया जाएगा। यह सेस इस बार के बजट में लगा भी दिया गया है। कहने की दरकार नहीं कि मेडिकल उपकरणों पर लगने वाले इस सेस से फौरी तौर पर स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होंगी और इसका खामियाजा आखिरकार मुल्क की गरीब जनता को ही भुगतना होगा।

इस योजना के प्रावधानों के मुताबिक जिला अस्पतालों का पहले से मौजूद सरकारी संपदा निजी हाथों में दे दी जाएगी। यानी निजी कंपनियों को अस्पताल के संचालन के लिए संसाधन खुद नहीं जुटाने होंगे। यानी निजी कंपनियां मेडिकल कॉलेज खोलेंगी और महंगी फीस वसूलेंगी और मुनाफा कमाएंगी। जिला अस्पतालों पर मालिकाना हक भी निजी हाथों में ही होगा। संपत्ति जनता और सरकार की होगी और मुनाफा निजी कंपनियों को जाएगा। यही हाल शिक्षा जगत का है। बजट में ऐलान किया गया है कि विदेशी कर्ज और पूंजी निवेश से शिक्षा संस्थान उन्नत किए जाएंगे। इन संस्थानों में कौन पढ़ सकेगा, यह भी कोई छुपा रहस्य नहीं है। बजट में पूंजीपतियों को जहां रियायतें व प्रोत्साहन दिया गया है। आम जनता की सब्सिडियों में कटौतियां करने व कल्याणकारी योजनाओं को खत्म करने वाले कदमों की भरमार है। अगर दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बजट कहलाने के लिए यह अनिवार्य शर्त है, तो गालिबन यह दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बजट हो सकता है।

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

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