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गांधी को मिटाने की एक और कवायद

Tuesday, January 21, 2020 12:35 PM
फाइल फोटो

महात्मा गांधी इस मुल्क की भावना है। उनके साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ मुल्क को परेशान करता है। पिछले कुछ सालों से गांधी और उनके विचारों पर लगातार हमले जारी हैं। ताजा मामला दिल्ली से है। दिल्ली के गांधी स्मृति संग्रहालय में रखी गांधीजी की हत्या से जुड़ी तस्वीरों को हटा दिया गया है। गुलाब की पंखुड़ियों के बीच रखी महात्मा गांधी की पार्थिव देह। उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब। वह बंदूक, जिससे नाथूराम गोडसे ने बापू के शरीर पर गोलियां दागीं। ये तमाम तस्वीरें गांधी स्मृति संग्रहालय से नदारद हैं। फोटोग्राफर हेनरी कार्तियर ब्रेसन की गांधी की हत्या से जुड़ी तमाम तस्वीरें भी वहां से हटा दी गई हैं। बाकी तस्वीरें ज्यों की त्यों हैं। अपन कई दफे उन तस्वीरों को देख चुके हैं। गांधी स्मृति में गांधीजी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को डिस्प्ले बोर्ड पर लगी तस्वीरों के माध्यम से दिखाया जाता था, जिनमें उनकी मृत्यु और अंतिम यात्रा की तस्वीरें भी थीं। लेकिन, अब उनकी मृत्यु और अंतिम यात्रा की तस्वीरों को हटा दिया गया है और वहां पर एक डिजिटल स्क्रीन लगा दी है। इस स्क्रीन पर छह से आठ तस्वीरें दिखती हैं, जो एक के बाद एक चलती रहती हैं। दलील दी जा रही है कि डिजिटलीकरण की वजह से ऐसा किया गया है। हालांकि गांधी स्मृति के निदेशक दीपंकर का कहना है कि लोगों की डिमांड पर पुरानी तस्वीरों को हटाया गया है। उनने कहा कि बच्चे ज्यादा डिजिटल फॉर्म में देखना चाहते हैं, उसमें ज्यादा मैटेरियल आते हैं। इसलिए गांधी स्मृति ने यह निर्णय लिया है। सवाल है कि यह मांग कब और किसने की है। असल में, गांधी एक ऐसा विचार है जिसे मुल्क की सत्ताधारी पार्टी कभी आत्मसात नहीं कर सकी है। लिहाजा, सरकार एक के बाद एक वह तमाम फैसले ले रही है जिससे मुल्क में उनके मन का राज कायम हो सके। और उनकी इस कवायद में सबसे बड़ा रोड़ा गांधी का नाम है। सत्तर साल पहले भी गांधी उनकी इस कवायद में दीवार की तरह खड़े थे।

उनकी हत्या कर उन्हें रास्ते से हटाने की कोशिश भी की गई, लेकिन वह कवायद कामयाब नहीं हो सकी। गांधी नहीं है, लेकिन उनके विचार इस मुल्क की आत्मा में समाहित हो चुके हैं। यही वजह है कि केन्द्र में पूर्ण बहुमत पाने के बाद भी कट्टर हिंदुत्व का राज कायम कर पाने का मंसूबा पूरा नहीं हो पा रहा, तो गांधी और उनसे जुड़े चिन्हों के साथ खिलवाड़ जारी है। पहले स्वच्छता अभियान के बापू के चश्मे का इस्तेमाल कर उनकी विराट छवि को छोटा करने की कवायद हुई। फिर खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर में उनकी तस्वीर की जगह स्वयं की तस्वीर चस्पां की गई। और अब गांधी स्मृति से गांधी की अंतिम तस्वीरों को हटाकर खिलवाड़ किया जा रहा है। आखिर मुल्क में धार्मिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिकता का जहर फैलाने में 70 साल लग ही गए। जब सत्ता हाथ लगी है, तो बापू का हत्यारा नाथूराम गोसडे अचानक कुछ लोगों के लिए पोस्टर बॉय बनने लगा है। मुल्क के मानस पटल से गांधी की छवि धूमिल करने और गोडसे को स्थापित करने की धुन इस कदर तारी है कि भाजपा के नेता शर्म हया को भी ताक पर रखने से बाज नहीं आ रहे। पिछले दिनों एक खबरिया चैनले पर भाजपा का अमिताभ सिन्हा नाम का एक नेता कन्हैया कुमार के उकसावे पर बाकायदा गोडसे जिंदाबाद का नारा लगाने लगा। यह बेशर्मी यों ही नहीं है। इसका एक मकसद है। यह पहली बार नहीं है, जब भाजपा के किसी नेता ने गोडसे का महिमामंडन किया हो। भाजपा की सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने गोडसे को देशभक्त बताया था, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें दिल से माफ न कर पाने की बात कही थी। न माफ करना था, न किया गया। हुआ यह कि पहले तो प्रज्ञा ठाकुर ने गोडसे का महिमामंडन सड़कों पर किया था। इस बयान के बाद सांसद ने भरे संसद में दोबारा यह बेशर्मी दिखाई।

बहरहाल संकट यह है कि बगैर गांधी का नाम लिए सरकार का काम भी नहीं चल रहा है। हालांकि यह झूठ है मगर सीएए के समर्थन में दलील दी जा रही  है कि गांधी ने कहा था कि ऐसे लोग जो अपने मुल्कों में प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं उनके लिए भारत का रास्ता खुला है। हकीकत यह है कि गांधी जी ने यह बात केवल पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को लिए कही थी अलबत्ता वहां दूसरे धर्मों से जुड़े अल्पसंख्यकों मसलन, और शिया ऐसे लोगों जिन्हें शरिया के नाम पर देशद्रोही करार दिया गया था, उनके लिए कही थी। गांधी जी ने कहा था कि ऐसे लोगों के लिए भारत के दरवाजे हमेशा के लिए खुले हैं, क्योंकि भारत किसी एक धर्म का नहीं है। हम इसे सेकुलर मुल्क बनाने जा रहे हैं, जिसमें सभी धर्मों के लोगों का बराबर सम्मान है।

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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