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इंडिया गेट

सकार की है जीत

Thursday, February 13, 2020 12:15 PM
अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तीसरी बार सत्ता संभालेंगे। यों तो आम आदमी पार्टी को पिछली बार की तुलना में 5 सीटें कम मिली हैं, लेकिन सियासत की नजर से देखा जाए, तो इस बार की जीत पिछली बार की तुलना में बड़ी है। अव्वल तो दिल्ली के पास मुकम्मल तौर पर पूरे राज्य का दर्जा भी नहीं है, लेकिन जब से भाजपा की सरकार केन्द्र की सत्ता में है। दिल्ली का चुनाव हाई वोल्टेज होने लगा है, क्योंकि पिछले 22 साल से दिल्ली में सत्ता से बाहर रही भाजपा किसी भी कीमत पर मुल्क की राजधानी पर कब्जा करने पर आमादा नजर आती है, लेकिन लगातार दूसरी बार उसकी इस कवायद को करारा झटका लगा है और दोनों बार यह झटका तब लग है, जब भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना चेहरा बनाया है। इस इस बार की जीत और भी बड़ी हो जाती है, क्योंकि दिल्ली पर कब्जा करने के लिए भाजपा ने पिछली बार की तुलना में कई गुना अधिक ताकत झोंकी थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मोदी सरकार के तमाम मंत्री, भाजपा शासित सूबों के मुख्यमंत्री, भाजपा के तकरीब 200 से अधिक सांसद और मुल्क भर से आए तकरीबन 20 हजार से अधिक कार्यकर्ता दिल्ली के चुनाव प्रचार में जुटे थे। भाजपा के तमाम चुनाव प्रचारकों में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने ध्रुवीकरण की कोशिश न की हो। भाजपा के प्रचार में असली निशाना मुसलमानों पर साधा गया और जरिया शाहीन बाग को बनाया गया। शाहीन बाग के बहाने दिल्ली के चुनाव को हिन्दू बनाम मुसलमान बनाने की भरसक कोशिश की गई। झूठा डर दिखाकर लोगों के वोट लेने की कोशिश की गई, लेकिन आम आदमी पार्टी को दोबारा सत्ता में आने से नहीं रोक सके। भाजपा का ध्रुवीकरण का एजेंडा धरा का धरा रह गया।

आम आदमी पार्टी ने न केवल ओखला की सीट जहां शाहीन बाग है, बड़े अंतर से जीती, अलबत्ता शाहीन बाग की आसपास की सारी सीटें भी भाजपा हार गई। तो जाहिर है दिल्ली की जनता ने भाजपा की सांप्रदायिकता की सियासत को सिरे से नकार दिया। पर इसके लिए सराहना के काबिल दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी हैं जिनने भाजपा की नकारात्मक सियासत को कभी तरजीह देना जरूरी नहीं समझा। वे लगातार उनकी सरकार की ओर से किए गए काम के आधार पर ही लोगों से वोट मांगते रहे। सियासी समझदारी दिखलाते हुए केजरीवाल ने तो दिल्ली की जनता से यहां तक कह दिया कि अगर उन्हें लगता है कि उनने पिछले पांच साल काम नहीं किया है, तो कमल को वोट दे देना, लेकिन जब दिल्ली की जनता ने अपना जनादेश दिया तो कहने की दरकार नहीं कि उसने सांप्रदायिक और नकारात्मक सियासत के बजाए काम को तरजीह दी। अगर केजरीवाल के मिले वोटों का आकलन करें तो साफ है कि उन्हें मुसलमानों, दलितों, और निम्म मध्यमवर्ग का भरपूर वोट हासिल हुआ है।

दिल्ली की सड़कों पर लोग खुलकर केजरीवाल के काम की चर्चा करते सुने जा सकते हैं। मसलन, उनने 20 हजार लीटर प्रति महीने पानी का उपभोग करने वाले परिवारों को पानी फ्री कर रखा है। लाखों की संख्या में जलबोर्ड के साथ लोगों के मुकदमे थे, क्योंकि केजरीवाल के पहले घरों में ज्यादातर पानी नहीं आता था, लेकिन बिल आ जाते थे। लोग बिलों का भुगतान नहीं करते थे। केजरीवाल ने उस सारे मुकदमों को वापस ले लिया और दशकों पुराने पानी बिल को माफ कर दिया। दिल्ली के आधे इलाके में ही जल बोर्ड के पाइप बिछे हुए थे। अब करीब 93 फीसदी इलाकों में पाइप बिछ चुके हैं। केजरीवाल सरकार 400 यूनिट प्रति महीने बिजली खपत पर पिछले 5 सालों से 50 फीसदी की सब्सिडी दे रही थी और 8 महीने पहले 200 यूनिट बिजली फ्री करने का ऐलान कर दिया गया था। उससे भी बड़ी बात यह हुई कि 24 घंटे बिजली मिलने लगी और बिजली कंपनियों की मनमानी समाप्त हो गई। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में भी बदलाव नजर आए। पूरी दिल्ली में सुरक्षा के ख्याल से तकरीबन 3 लाख सीसीटीवी भी लगाए गए हैं। भाजपा चूंकि दो दशकों से दिल्ली की सत्ता से बाहर है लिहाजा उसके पास यहां काम गिनाने के लिए कुछ भी नहीं था, लेकिन भाजपा के तमाम नेता दिल्ली में जनता को यह भी बता पाने में नाकाम रहे कि केन्द्र में छह साल रहकर उनने जनता के हित का कौन सा काम किया है। हालांकि प्रधानमंत्री ने जरूर  केजरीवाल के मोहल्ला क्लीनिक के मुकाबले आयुष्मान भारत को श्रेष्ठ बताने की कोशिश की, अवैध कालोनियों के नियमितिकरण का मुद्दा और साफ पानी जैसे कुछ बातें कहीं मगर ये मुद्दे भाजपा के प्रचार के केन्द्र में कभी न आ सके। नतीजों के बाद भाजपा के समर्थक दिल्ली की जनता पर मुफ्तखोरी का इल्जाम लगा रहे हैं। अब उन्हें कौन याद दिलाए के लोकसभा चुनाव से पहले जो किसानों को 2 हजार रुपए बांटे गए थे उसे किस केटेगरी में रखा जाए। बहरहाल, दिल्ली के नतीजों को अगर भाजपा वालों की शब्दावली में ही कुछ कहा जाए, तो दिल्ली में भारत तो जीत गया और पाकिस्तान हारा या नहीं यह भरोसे से वह भी कहने की हालत में नहीं हैं।  

- शिवेश गर्ग

(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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