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इंडिया गेट

दम घोंटती मुल्क की हवा

Wednesday, November 11, 2020 13:30 PM
फाइल फोटो।

पिछले दिनों जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहा था कि भारत की हवा गंदी है, तो भारतीय होने के नाते उनकी यह बात पसंद नहीं आई थी। क्योंकि जिस लहजे में उनने यह बात कही थी, वह लहजा उनके मित्र मुल्क के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक को पसंद नहीं आया होगा और अब यह संयोग ही है कि जहां अमेरिकी चुनाव में उनकी सियासी हवा खराब हो चुकी है, वहीं भारत की हवा को लेकर की गई उनकी टिप्पणी सही साबित हो रही है। खबर है कि मुल्क की राजधानी दिल्ली की हवा का आलम यह है कि 'आपात' स्तर के बेहद करीब पहुंच गई। दिल्ली में मंगलवार को सुबह 9 बजे एक्यूआई 487 दर्ज किया गया, जो कि 'गंभीर' श्रेणी में आता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मुताबिक दिल्ली के अधिकांश इलाकों का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 500 के पास ही दर्ज किया गया। वायु गुणवत्ता सूचकांक दिल्ली के पड़ोसी शहरों फरीदाबाद में 474, गाजियाबाद में 476, नोएडा में 490, ग्रेटर नोएडा में 467, गुरुग्राम में 469 दर्ज किया गया। दिल्ली में लगातार छठे दिन वायु गुणवत्ता सूचकांक 'गंभीर' श्रेणी में दर्ज किया गया।

गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक 0 और 50 के बीच एक्यूआई को 'अच्छा', 51 और 100 के बीच 'संतोषजनक', 101 और 200 के बीच 'मध्यम', 201 और 300 के बीच 'खराब', 301 और 400 के बीच 'बेहद खराब' और 401 से 500 के बीच 'गंभीर' (आपात) श्रेणी में माना जाता है। वहीं, दिल्ली-एनसीआर में सुबह 8 बजे 'पीएम 2.5' का स्तर 605 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था, जो सुरक्षित सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से 10 गुना अधिक है। सीपीसीबी के आंकड़ों के अनुसार मंगलवार सबुह 8 बजे 'पीएम 10' का स्तर 777 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया। इससे पहले रविवार को मुल्क का सबसे प्रदूषित शहर उत्तर प्रदेश का आगरा रहा जबकि दूसरा नंबर गाजियाबाद का था। बढ़ते प्रदूषण के कारण लोगों को सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन, सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियां होने लगी हैं। अपन भी एक दो दिनों से सूखी खांसी के शिकार हैं।

यों तो इस मौसम में दमघोंटू हवा दिल्ली का दस्तूर बन चुका है। मगर इस बार फर्क यह है कि यह सूरतेहाल दीवाली से पहले ही हो गया है और इस बार का यह दस्तूर तो कोढ़ में खाज की तरह आया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का मानना है कि दिल्ली में पिछले कुछ दिन में रोजाना कोविड-19 के 6,000 से अधिक मामले सामने आए हैं। इसमें 13 फीसद की बढ़ोतरी वायु प्रदूषण के कारण होने का अनुमान है। जानकारों के मुताबिक पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में पराली जलाने के अलावा गाड़ियों से निकलने वाला काला धुआं, निर्माण कार्यों से उड़ने वाले पीएम कण, सड़कों पर फैली धूल, और उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। ऐसे में प्रशासन और सरकार की ओर से लोगों को घर पर रहने की हिदायत दी जा रही है। प्रदूषण की ताजा हालात के बरक्स एनजीटी ने सोमवार को दिल्ली-एनसीआर में 30 नवंबर तक पटाखों के चलाने पर रोक लगाने का आदेश दिया है।

न्याधिकरण ने अपने आदेश में कहा है कि बाकी सूबों में जहां एयर क्वालिटी खराब या खतरनाक स्तर पर है, वहां भी पटाखों को जलाने पर प्रतिबंध होगा। वैसे दिल्ली सरकार ने पहले ही पटाखों पर रोक लगा दी थी, मुंबई में भी बीएमसी ने अपील की है कि इस दिवाली सभी बिना पटाखों का त्योहार मनाएं, ताकि मुंबई को प्रदूषण और कोरोना की नई लहर से बचाया जा सके। लेकिन अब तो न्याधिकरण और प्रशासन की यह कवायद भी विवाद का सबब बन चुका है। टाटा समूह की गहनों की कंपनी तनिष्क को अपना एक और विज्ञापन वापस लेना पड़ा है। कंपनी के नए दिवाली विज्ञापन में नीना गुप्ता, निमरत कौर, सयानी गुप्ता और अलाया एफ. ने काम किया है। यह विज्ञापन पिछले हफ्ते जारी किया गया, जिसमें पटाखों के बिना दिवाली मनाए जाने की सलाह दी गई थी। इस विज्ञापन में सयानी गुप्ता कहते हुए दिखती हैं कि मैं लंबे समय बाद अपनी मां से मिलने की उम्मीद कर रही हूं। निश्चित तौर पर पटाखे नहीं जलाऊंगी, मुझे नहीं लगता कि किसी को पटाखे जलाने चाहिए, लेकिन ढेर सारे दिए, ढेर सारी खुशियां और ढेर सारी सकारात्मकता हो।

विज्ञापन के वीडियो में निमरत कौर ने दिवाली पर परिवार के साथ रहने को महत्व को बताती हैं। नीना गुप्ता और अलाया एफ. कहती हैं कि उनके लिए दिवाली मिठाई, खाना और परिवार के बारे में है। मगर मुल्क में सत्ताधारी भाजपा के इस विज्ञापन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि ने ट्वीट किया कि क्यों कोई यह सलाह देता है कि हिंदुओं को अपना त्योहार कैसे मनाना चाहिए? कंपनियों को अपने उत्पाद बेचने पर ध्यान देना चाहिए, पटाखे न जलाने पर लेक्चर नहीं देना चाहिए। सीटी रवि जैसे खाए, पीए, अघाए लोग वातानुकुलित बंद कमरों में रह कर यह सियासी चोंचलेबाजी कर सकते हैं, लेकिन वे लोग जिन्हें रोजी-रोटी के लिए हर हाल में बाहर निकलना पड़ रहा है और जहरीली हवा में सांस भी लेना पर रहा है, हवा खराब होने की तकलीफ वे ही समझते हैं।
शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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