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इंडिया गेट

एक बेहद खतरनाक स्वीकारोक्ति

Saturday, January 16, 2021 11:30 AM
फाइल फोटो।

यों तो मंगलवार को सबसे बड़ी खबर सुप्रीम कोर्ट की ओर से किसान आंदोलन के बरक्स 4 सदस्यों की समिति का गठन रही। मगर कोर्ट में इसी मामले की सुनवाई के दौरान सरकार ने आंदोलन की खिलाफ जो बात बात कही वह किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए शर्म का सबब होना चाहिए। मंगलवार को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि दिल्ली में जारी किसानों के मौजूदा आंदोलन में खालिस्तानी घुसपैठ हुई थी। इस तरह से सरकार ने पहली बार उस दावे को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी जो सोशल मीडिया से शुरू हुआ था और बाद में उसे कुछ भाजपा नेताओं ने दोहराया था। कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ वकील पीएस नरसिम्हा ने कहा कि उसके (सरकार) आवेदन में कहा गया है कि सिख्स फॉर जस्टिस जैसे समूह विरोध प्रदर्शनों के लिए धन एकत्र कर रहे थे। इस पर सीजेआई एसए बोबड़े ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से पूछा कि क्या इस आरोप की पुष्टि की जा सकती है या नकारा जा सकता है।

वेणुगोपाल ने कहा कि हमें सूचित किया गया है कि इस प्रक्रिया में खालिस्तानी घुसपैठ है। इस पर कोर्ट ने उनसे कहा कि वह जिस बात पर सहमत हुए हैं और कहा है, बुधवार तक उस पर एक हलफनामा दाखिल करें। किसान आंदोलन के बरक्स सरकार की यह स्वीकारोक्ति बेहद शर्मनाक और खतरनाक है क्योंकि किसान आंदोलन को लेकर जो घिनौने आरोप भाजपा के नेता और उनका कनफुकवा तंत्र अबतक लगा रहा था वही अब अधिकारिक तौर सरकार ने अदालत में लगाया है। कोर्ट में इस स्वीकारोक्ति से पहले पिछले दो महीनों में कई भाजपा नेता आंदोलन में खालिस्तानियों के शामिल होने का आरोप लगा चुके हैं। किसान विरोध प्रदर्शनों में खालिस्तानी घुसपैठ का आरोप नवंबर में शुरू हुआ, जो पहली बार सोशल मीडिया पर दिखाई दिया था। बीते 30 नवंबर को भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और पंजाब एवं उत्तराखंड में पार्टी के प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम ने कहा था कि आंदोलन के दौरान खालिस्तान और पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए गए और ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए।

एक अखबारी रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा नए कृषि कानूनों पर रुख साफ किए जाने के बाद ठीक उसी दिन भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट कर कहा था कि अरविंद केजरीवाल सरकार ने 23 नवंबर को पहले ही कृषि कानूनों को अधिसूचित कर उन्हें लागू करना शुरू कर दिया है। लेकिन अब जब खालिस्तानियों और माओवादियों ने विरोध करने के लिए कदम बढ़ाया है, तो वह दिल्ली को जलाने का एक अवसर देख रहे हैं। यह किसानों के बारे में कभी नहीं था। सिर्फ राजनीति हो रही है। हालांकि, मोदी सरकार के दो बड़े नुमाइंदे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने इनमें से कुछ टिप्पणियों से असहमति जताई थी। गृह मंत्री अमित शाह ने हैदराबाद में कहा था कि वह इस विचार को नहीं मानते हैं कि किसानों का आंदोलन राजनीतिक है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शाह ने कहा था कि लोकतंत्र में सभी को (विरोध करने का) अधिकार है, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि तीनों कृषि विधेयक किसानों के लाभ के लिए हैं। मैंने कभी किसानों द्वारा किए गए विरोध को राजनीतिक नहीं कहा। मैं यह अब भी नहीं कह रहा हूं।

सवाल है कि जब मुल्क के गृहमंत्री के पास किसान आंदोलन में खालिस्तानी समर्थकों की घुसपैठ की सूचना नहीं है। फिर कोर्ट में सरकार किस आधार पर किसान आंदोलन के खिलाफ यह घिनौना आरोप लगा सकती है? यह हकीकत है कि किसान आंदोलन की शुरुआत से ही भाजपा सहित मोदी सरकार के कई आला नेता इसे बदनाम करने की कवायद में जुटे हैं। पहले 12 दिसंबर को फिक्की के 93वें वार्षिक अधिवेशन में रेलवे और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने माओवादियों की भागीदारी का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि अब हम महसूस करते हैं कि तथाकथित किसान आंदोलन शायद ही किसान आंदोलन रह गया है। इसमें लगभग वामपंथी और माओवादी तत्वों द्वारा घुसपैठ की गई है, जिसका एहसास हमें पिछले दो दिनों में हुआ, जब देश विरोधी गतिविधियों के लिए सलाखों के पीछे डाल दिए गए लोगों को रिहा करने की विलक्षण मांगें की गई थीं।

बिहार में किसानों को संबोधित करते हुए कि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने टुकडे-टुकड़े गैंग का उल्लेख किया था। ठीक उसी दिन कृषि मंत्री तोमर ने कहा कि देश में कुछ ताकतें हैं जो अच्छे काम का विरोध करती हैं। आपको याद है जब कश्मीर से अनुच्छेद-370 को खत्म करने का विधेयक लाया गया था, तब ऐसे वामपंथी तत्व थे जो अनुच्छेद-370 को खत्म करने का विरोध कर रहे थे। विडंबना देखिए कि मोदी सरकार ने पीयूष गोयल और नरेन्द्र सिंह तोमर को ही किसानों के साथ बातचीत करने की जिम्मेदारी दी है। ऐसे में अब तक की तमाम वार्ताओं के विफल होने का सबब समझा जा सकता है। और अब तुर्रा यह कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से समस्या के समाधान के लिए जो चार सदस्यों की समिति का गठन किया गया है। इसमें सभी सदस्य विवादित कृषि कानूनों के समर्थक हैं। लिहाजा, फिलहाल तो किसानों की समस्या का समाधान नहीं दिखता। मगर सबसे खतरनाक और शर्मनाक सरकार की वह स्वीकारोक्ति है जो अदालत के सामने दी गई है।
-शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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