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इंडिया गेट

एक कूटनीतिक उपलब्धि

Saturday, May 04, 2019 09:30 AM

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने बुधवार को आखिरकार मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित कर ही दिया। वह अब तक चीन की आपत्ति की वजह से बचा हुआ था। चीन की ओर से बार-बार वीटो का इस्तेमाल कर मसूद अजहर को बचा लिया जाता था। मुमकिन है इसके पीछे चीन के साथ पाकिस्तन की कूटनीतिक और आर्थिक हित वजह हों, लेकिन अब चीन ने भी मसूद अजहर से अपनी सरपरस्ती हटा ली है। भारत में इसे बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया जा रहा है। अमेरिका भी इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहा है।

तमाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं के बीच बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि चार बार मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित होने से रोकने वाला चीन आखिर इस बार कैसे मान गया? इस संबंध में कई राय सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि पिछले महीने अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर बहस करने का प्रस्ताव चीन को दिया, जिससे चीन पसोपेश में पड़ गया, क्योंकि इस बहस में उसे अपना रुख सार्वजनिक रूप से रखना पड़ता। इसके अलावा कुछ और भी वजह बताई जा रही हैं। मसलन, फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम न उठाने के कारण ग्रे लिस्ट में डाल दिया है। चीन फिलहाल इस टास्क फोर्स का उपाध्यक्ष है और अक्टूबर में अध्यक्ष बनने वाला है।

जानकारों का मानना है कि आतंकवाद को लेकर अब विश्व समुदाय की सहनशक्ति और कम हो गई है। पुलवामा की घटना के बाद यूएनएससी सदस्य देशों ने मसूद अजहर को लेकर चीन पर जिस तरह का दबाव बनाया था, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। इस मामले में पहले फ्रांस और बाद में अमेरिका ने अपने प्रस्तावों को लेकर चीन पर लगातार दबाव बनाए रखा। इसमें ब्रिटेन ने उनका पूरा साथ दिया। यह बड़ी वजह रही कि मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करवाने की भारत की कोशिशों को चौथी बार नाकाम करने के बाद भी चीन इस मसले को टालने में विफल रहा।

गौर करने की बात है कि जब भारत ने पुलवामा हमले का बदला लेने के लिए पाकिस्तानी सीमा में घुसकर हवाई हमला किया तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से उसकी आलोचना नहीं की गई। अमेरिका ने साफ कहा था कि भारत को पुलवामा का जवाब देने का हक है। उस समय पूरा अंतरराष्ट्रीय समुदाय कमोबेश भारत के साथ ही था। ऐसे में चीन न तो सैन्य कार्रवाई का हवाला देकर भारत की आलोचना कर सका और न ही मसूद अजहर के मामले की अनदेखी कर पाया। इस बीच, भारत और अमेरिका ने यूएनएससी में मसूद पर खुली बहस करने की बात कह दी, जिससे चीन और घिर गया। भारत के इस कदम का परिषद के बाकी सदस्य देशों ने भरपूर समर्थन किया।

वहीं, चीन के सामने यह मुश्किल आ गई कि अब उसे आतंकवाद को लेकर अपना रुख सार्वजनिक रूप से दुनिया के सामने रखना पड़ता। उधर, अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने चेतावनी दी कि अगर वह मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करवाने में मदद नहीं करता तो उसे दुनिया से अलग-थलग किया जा सकता है। पर, अक्सर दुनिया की महाशक्ति अमेरिका को आंखें दिखाने वाले चीन का मसूद अजहर के मामले में नरम पड़ने की इतनी भर वजह रही होगी, कई जानकार इस बात से सहमत नजर नहीं आते। कई जानकारों का मानना है कि चीन को मसूद अजहर के खिलाफ कड़ाई बरतनी ही थी। बताया जाता है कि मसूद अजहर अब पाकिस्तान के साथ-साथ चीन के लिए भी बोझ बनता जा रहा है।

क्योंकि दोनों मुल्कों की वैश्विक स्तर पर इससे आलोचना हो रही है। अभी पिछले दिनों ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान चीन के बेल्ट एंड एंड रोड समिट में हिस्सा लेकर बिजिंग से लौटे और इसके एक दिन बाद ही चीन ने अपना रुख बदल दिया। बुरी तरह डांवाडोल अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए पाकिस्तान इस समय चीन समेत कई मित्र देशों व अंतरराष्ट्रीय संगठनों से आर्थिक मदद मांग रहा है। चीन इससे वाकिफ है और यह भी जानता है कि वह बार-बार आर्थिक मदद के रूप में पाकिस्तान को भारी रकम नहीं दे सकता। लेकिन, मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करवाकर वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपने ‘पक्के दोस्त’ की छवि सुधारने में मदद जरूर कर सकता था।

दूसरी ओर, अमेरिका ने गुरुवार के घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की इस प्रतिबद्धता की सराहना की है कि वे अपने मुल्क के बेहतर भविष्य की खातिर अपनी जमीन से आतंकवादियों और आतंकवादी समूहों को काम करने की अनुमति नहीं देंगे। यानी साफ है कि चीन के फैसले के तमाम आयाम है। यह अमेरिका फ्रांस जैसे मुल्कों की भी कूटनीतिक जीत है।

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा भी है कि यह कदम आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अमेरिकी कूटनीति की जीत है। हालांकि भारतीय कूटनीति की इस उपलब्धि को भाजपा अपनी उपलब्धि बनाकर चुनाव में भुनाने में जुट गई है। प्रधानमंत्री गद्गद् हैं और उन्होंने इस बरक्स कांग्रेस पर हमले भी शुरू कर दिए हैं। मुमकिन है इसका उन्हें कुछ सियासी फायदा भी मिल जाए। 
- शिवेश गर्ग

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