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भारत

नीतीश कुमार को बताना पड़ेगा कि गोडसे और गांधी की विचारधारा एक साथ कैसे चल सकती है: प्रशांत किशोर

Tuesday, February 18, 2020 18:15 PM
पटना में मीडिया को संबोधित करते प्रशांत किशोर।

पटना। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) से निष्कासित प्रशांत किशोर ने मंगलवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गाडसे की विचारधारा को मानने वाले लोगों के साथ खड़े होने का आरोप लगाते हुए भविष्य की अपनी योजनाओं का भी खुलासा किया और कहा कि बिहार के विकास के लिए एक सशक्त नेता चाहिए पिछलग्गू नहीं।

प्रशांत किशोर ने जदयू से निष्कासन के 20 दिनों के बाद मंगलवार को पहली बार प्रेस वार्ता में नीतीश कुमार के साथ वैचारिक मतभेदों के संबंध में खुलकर चर्चा की और कहा कि उनसे उनके (नीतीश कुमार) मतभेद के दो कारण हैं। पहला कि नीतीश कुमार कहते हैं कि वह गांधी, जेपी (जयप्रकाश नारायण) और लोहिया की विचारधारा को नहीं छोड़ सकते लेकिन दूसरी ओर वह गोडसे की विचारधारा से सहमति रखने वालों के साथ खड़े हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि नीतीश भाजपा के साथ रहना चाहते हैं तो इसमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन गांधी और गोडसे की विचारधारा एक साथ नहीं चल सकती।

जदयू के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने कहा कि पार्टी के नेता के तौर पर नीतीश कुमार को बताना पड़ेगा कि गोडसे और गांधी की विचारधारा एक साथ कैसे चल सकती है। उन्होंने कहा कि पिछले 15 साल से नीतीश और उनकी पार्टी भाजपा के साथ रही है यह उन्हें (किशोर) भी मालूम है लेकिन आज जो भाजपा है उसमें जमीन आसमान का फर्क है। उन्होंने कहा कि उनके लिए 2014 में चुनाव हारे हुए और दो सांसद वाली पार्टी के नेता नीतीश कुमार के प्रति ज्यादा सम्मान था, लेकिन आज गुजरात का कोई नेता गठबंधन में नीतीश कुमार की स्थिति बताता है तो यह अच्छी बात नहीं है ।

किशोर ने कहा कि कुमार से मतभेद का दूसरा कारण जदयू की बिहार में स्थिति को लेकर हुआ। आज जदयू के पास 16 सांसद हैं, लेकिन उसकी स्थिति पहले जैसी नहीं है। बिहार का मुख्यमंत्री 10 करोड़ लोगों का नेता है। वह मैनेजर नहीं है, जिसे दूसरी पार्टी के लोग नियुक्त कर सकें। उसका अपना मान-सम्मान है। उन्होंने कहा कि हम ऐसे नेता चाहते हैं जो किसी का पिछलग्गू ना बने और स्वतंत्र विचार रखे।

प्रशांत ने कहा कि कहा जाता है कि राजनीति में थोड़ा बहुत समझौता करना पड़ता है। यदि बिहार के विकास के लिए समझौता किया गया तो यह ठीक था, लेकिन यह एक बड़ा प्रश्न है कि क्या सही मायने में भाजपा-जदयू गठबंधन में बिहार का विकास हुआ है। यदि भाजपा के सामने झुकने से विकास हो रहा हो तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन क्या बिहार में इतनी तरक्की हो गई है और क्या बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल गया। उन्होंने कहा कि पटना विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने के लिए नीतीश ने सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने हाथ जोड़कर आग्रह किया था। बात मानना तो दूर इसपर विचार तक नहीं हुआ।

किशोर ने कहा कि उनका मानना है कि यदि नीतीश कुमार या कोई अन्य नेता बिहार के लिए खड़ा होगा तो बिहार की जनता उसके साथ खड़ी होगी। बिहार में मुख्यमंत्री बने रहने के लिए भाजपा के साथ रहना जरूरी है वह ऐसा नहीं मानते हैं। उन्होंने कहा कि बिहार में नीतीश राज में विकास हुआ है इसमें कहीं दोराय नहीं है। 15 साल में बिहार में खूब विकास हुआ है लेकिन बिहार में आमूलचूल बदलाव नहीं हुआ है।

जदयू के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने कहा कि विकास के पैमानों पर बिहार की स्थिति कमोवेश आज भी वैसी ही है, जैसी 2005 में थी। नीतीश राज में शिक्षा के क्षेत्र में काम किया गया। साइकिल और पोषाक बांटे गये, लेकिन अच्छी शिक्षा नहीं दी गयी। स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या तो बढ़ी, लेकिन शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं हुआ। झारखंड को छोड़ दें तो बिहार शिक्षा के मामले में सबसे निचले स्तर का राज्य है। इसी तरह बिहार में घर-घर बिजली आ गई लेकिन सच्चाई यह भी है कि बिजली की घरेलू खपत के मामने में बिहार सबसे पिछड़ा राज्य है। देश में प्रति घर बिजली खपत का औसत 900 किलोवॉट है, लेकिन बिहार में यह 202 किलोवॉट ही है। बिहार के लोगों के पास बल्ब और पंखा लगाने से अधिक पैसा नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी बिहार 2005 में 22 वें नंबर पर था और आज भी 22 वें स्थान पर है। 2005 में बिहार सबसे गरीब था और आज भी है।

किशोर ने कहा कि नीतीश कुमार लालू राज के 15 साल को गिनाते हुए कहते हैं कि बिहार में जो कुछ किया बहुत किया। यह नीतीश कुमार की सोच है लेकिन अब बिहार की जनता जानना चाहती है कि अगले 10 साल में वह क्या करेंगे। लालू राज में क्या हुआ यह कुमार जरूर बतायें लेकिन यह भी बतायें कि बिहार महाराष्ट्र और गुजरात के मुकाबले अभी कहां खड़ा है। उन्होंने कहा कि अब बिहार के लोग ऐसा दिन चाहते हैं जब गुजरात के सूरत के लोग बिहार में आकर काम करें। 

चुनावी रणनीतिकार ने कहा कि यह स्थिति तब बदलेगी जब बिहार में सशक्त नेतृत्व होगा । यह तब होगा जब गांव और पंचायत स्तर से बिहार को आगे ले जाने का सपना रखने वाला नेतृत्व उभरेगा । उन्होंने कहा कि वह यहां किसी राजनीतिक पार्टी का ऐलान करने नहीं जा रहे हैं और ना ही किसी गठबंधन के लिए काम करने में उनकी कोई दिलचस्पी है। वह बिहार से कहीं नहीं जायेंगे और राज्य के साढ़े आठ हजार पंचायत के करीब दस लाख युवाओं को बिहार बदलाव के कार्यक्रम में शामिल करेंगे।  

किशोर ने अगले दो दिनों के अंदर राज्य में एक नया अभियान 'बात बिहार की' शुरू करने की घोषणा करते हुए कहा कि इस अभियान का लक्ष्य सिर्फ बिहार की तस्वीर को बदलना है। वह पिछले डेढ़ साल से हर प्लेटफॉर्म पर कहते रहे हैं कि वह ऐसे युवा लोगों को जोड़ना चाहता है जो बिहार को आगे ले जाने का सपना देखते हैं । अभी ऐसे तीन लाख सदस्यों को उन्होंने अपने साथ जोड़ा है जिसमें 30 प्रतिशत भाजपा के सक्रिय सदस्य हैं। उन्होंने संवाददाता सम्मेलन की शुरूआत में ही  नीतीश कुमार को पिता तुल्य बताया और कहा कि उन्होंने भी उन्हें बेटे की तरह रखा। वह उनका अभी भी काफी सम्मान करते हैं। जदयू से निकालने समेत नीतीश कुमार के सारे फैसले उन्हें मंजूर हैं।

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