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#Happy Birthday : धर्मेन्द्र को शुरूआती दौर में करना पड़ा संघर्ष, 'फूल और पत्थर' से मिली पहचान

Sunday, December 08, 2019 12:40 PM
धर्मेन्द्र (फाइल फोटो)

मुंबई। बॉलीवुड में अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का अपना दीवाना बनाने वाले 'हीमैन' धर्मेन्द्र को अपने सिने करियर के शुरूआती दौर में संघर्ष करना पड़ा। धर्मेन्द्र को वह दिन भी देखना पड़ा था जब निर्माता-निर्देशक उनसे यह कहते आप बतौर अभिनेता फिल्म इंडस्ट्री के लिए उपयुक्त नहीं है और आपको अपने गांव वापस लौट जाना चाहिए। पंजाब के फगवाड़ा में 8 दिसंबर 1935 को जन्मे धर्मेन्द्र का रूझान बचपन के दिनों से ही फिल्मों की ओर था और वह अभिनेता बनना चाहते थे। फिल्मों की ओर उनकी दीवानगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फिल्म देखने के लिए वह मीलों पैदल चलकर शहर जाते थे। फिल्म अभिनेत्री सुरैया के वह इस कदर दीवाने थे कि उन्होंने वर्ष 1949 में प्रदर्शित फिल्म 'दिल्लगी' चालीस बार देखी।

साल 1958 में फिल्म इंडस्ट्री की मशहूर पत्रिका फिल्म फेयर का एक विज्ञापन निकला, जिसमें नए चेहरों को बतौर अभिनेता काम देने की पेशकश की गई थी। धर्मेन्द्र इस विज्ञापन को पढ़कर काफी खुश हुए और अमेरीकन टयूबबैल में अपनी नौकरी को छोड़कर अपने सपनों को साकार करने के लिए मायानगरी मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद धर्मेन्द्र को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। फिल्म इंडस्ट्री में बतौर अभिनेता काम पाने के लिए वह एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भटकते रहे। वह जहां भी जाते उन्हें खरी खोटी सुननी पड़ती, लेकिन धर्मेन्द्र ने उनकी बातों को अनसुना कर अपना संघर्ष जारी रखा। इसी दौरान धर्मेन्द्र की मुलाकात निर्माता-निर्देशक अर्जुन हिंगोरानी से हुई, जिन्होंने धर्मेन्द्र की प्रतिभा को पहचान अपनी फिल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' में बतौर अभिनेता काम करने का मौका दिया लेकिन फिल्म की असफलता ने धर्मेन्द्र को गहरा धक्का लगा। एक बार तो धर्मेन्द्र ने सोच लिया कि मुंबई में रहने से अच्छा है गांव लौट जाए, लेकिन बाद में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया।

फिल्म 'दिल भी तेरा, हम भी तेरे' की असफलता के बाद धर्मेन्द्र ने माला सिन्हा के साथ 'अनपढ़', 'पूजा के फूल', नूतन के साथ 'बंदिनी', मीना कुमारी के साथ 'काजल' जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों को दर्शकों ने पसंद तो किया लेकिन कामयाबी का श्रेय धर्मेन्द्र के बजाय फिल्म की अभिनेत्रियों को दिया गया। वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म 'फूल और पत्थर' की सफलता के बाद सही मायनों में बतौर अभिनेता धर्मेन्द्र अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। फिल्म में धर्मेन्द्र ने एक ऐसे मवाली गुंडे का अभिनय किया जो समाज की परवाह किए बिना अभिनेत्री मीना कुमारी से प्यार करने लगता है। दिलचस्प बात है आज के दौर के नायक अपने शरीर शैष्टव को दिखाने के लिये बेवजह कमीज उतार देते है पर इस फिल्म के जरिए धर्मेन्द्र ऐसे पहले नायक हुए, जिन्होंने इस परंपरा की नीव रखी। फिल्म में अपने दमदार अभिनय के कारण वह फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार के लिए नामांकित भी किए गए।

धर्मेन्द्र को प्रारंभिक सफलता दिलाने में निर्माता-निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों का अहम योगदान रहा है। इनमें 'अनुपमा', 'मंझली दीदी' और 'सत्यकाम' जैसी फिल्में शामिल है। 'फूल और पत्थर' की सफलता के बाद धर्मेन्द्र की छवि 'हीमैन' के रूप में बन गई। इस फिल्म के बाद निर्माता-निर्देशकों ने अधिकतर फिल्मों मे धर्मेन्द्र की हीमैन वाली छवि को भुनाया। 70 के दशक में धर्मेन्द्र पर यह आरोप लगने लगे कि वह केवल मारधाड़ और एक्शन से भरपूर फिल्में ही कर सकते हैं। धर्मेन्द्र को इस छवि से बाहर निकालने में एक बार फिर से निर्माता-निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने मदद की। धर्मेन्द्र को लेकर उन्होंने 'चुपके चुपके' जैसी हास्य से भरपूर फिल्म का निर्माण किया और धर्मेन्द्र से हास्य अभिनय कराकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया।

फिल्म इंडस्ट्री के रूपहले पर्दे पर धर्मेन्द्र की जोड़ी हेमा मालिनी के साथ खूब जमी। यह फिल्मी जोड़ी सबसे पहले फिल्म 'शराफत' से चर्चा में आई। वर्ष 1975 में प्रदर्शित फिल्म 'शोले' में धर्मेन्द्र ने वीरु और हेमामालिनी ने बसंती की भूमिका में दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। हेमा और धर्मेन्द्र की यह जोड़ी इतनी अधिक पसंद की गई कि फिल्म इंडस्ट्री में 'ड्रीम गर्ल' के नाम से मशहूर हेमामालिनी उनके रीयल लाइफ की ड्रीम गर्ल बन गईं। बाद में इस जोड़ी ने 'ड्रीम गर्ल', 'चरस', 'आसपास', 'प्रतिज्ञा', 'राजा जानी', 'रजिया सुल्तान', 'अली बाबा चालीस चोर', 'बगावत', 'आतंक', 'द बर्निंग ट्रेन', 'दोस्त' आदि फिल्मों में एक साथ काम किया।

वर्ष 1975 धर्मेन्द्र के सिने करियर का अहम पड़ाव साबित हुआ और उन्हें निर्देशक रमेश सिप्पी की फिल्म 'शोले' में काम करने का मौका मिला। इस फिल्म में अपने अल्हड़ अंदाज से धर्मेन्द्र ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। फिल्म में धमेन्द्र के संवाद उन दिनों दर्शकों की जुबान पर चढ़ गए। खास तौर पर नशे में धुत पानी की टंकी पर चढ़कर 'कूद जाउंगा फांद जाऊंगा' आज भी सिने प्रेमी इस संवाद की चर्चा करते हैं। 70 के दशक में हुए एक सर्वेक्षण के दौरान धर्मेन्द्र को विश्व के हैंडसम व्यक्तिव में शामिल किया गया। धर्मेन्द्र के प्रभावी व्यक्तिव के कायल अभिनय सम्राट दिलीप कुमार भी है। दिलीप कुमार ने धर्मेन्द्र की प्रशंसा करते हुए कहा था जब कभी मैं खुदा के दर पर जाऊंगा, तो मैं बस यही कहूंगा मुझे आपसे केवल एक शिकायत है आपने मुझे धर्मेन्द्र जैसा हैंडसम व्यक्ति क्यों नही बनाया।

धर्मेन्द्र को फिल्मों में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 1997 में फिल्मफेयर का लाइफटाइम एचीवमेंट अवॉर्ड पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो उनकी आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने कहा कि मैंने अपने करियर में सैंकड़ों हिट फिल्में दी है लेकिन मुझे कभी अवॉर्ड के लायक नहीं समझा गया आखिरकार मुझे अब अवॉर्ड दिया जा रहा है मैं खुश हूं।अपने बेटे सन्नी देओल को लॉन्च करने के लिए धर्मेन्द्र ने 1983 में फिल्म 'बेताब' जबकि दूसरे बेटे बॉबी देओल को लॉन्च करने के लिए वर्ष 1995 में 'बरसात' का निर्माण किया। फिल्मों में कई भूमिकाएं निभाने के बाद धर्मेन्द्र ने समाज सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश किया और वर्ष 2004 में राजस्थान के बीकानेर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर लोकसभा के सदस्य बने।

धर्मेन्द्र अपने पांच दशक लंबे सिने करियर में लगभग 250 फिल्मों में अभिनय कर चुके है लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें उनके कद के बराबर वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह हकदार हैं, लेकिन अमेरिका की प्रसिद्ध मैगेजीन टाइम पत्रिका ने विश्व के 10 सुंदर व्यक्तियों में प्रथम उनके चित्र को मुखपृष्ठ में प्रकाशित करना और राजस्थान में उनके प्रशंसकों द्वारा उनके वजन से दोगुना खून देकर ब्लड बैंक की स्थापना करना महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

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