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पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन ने कहा- देश में मंदी, सारी शक्तियां PMO के पास रखना ठीक नहीं

Sunday, December 08, 2019 19:55 PM
रघुराम राजन (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय सुस्ती के चंगुल में फंसी है और इसमें अस्वस्थता के गहरे संकेत मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस समय देश में सत्ता का बहुत ज्यादा केंद्रीकरण हो गया है, जहां प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के पास ही सारी शक्तियां हैं, उनके मंत्रियों के पास कोई अधिकार नहीं हैं। एक मैगजीन में प्रकाशित लेख में राजन ने भारत की कमजोर पड़ती अर्थव्यवस्था को सुस्ती से बाहर निकालने के लिए अपने सुझाव दिए हैं। उन्होंने लगातार सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए पूंजी क्षेत्र, भूमि और श्रम बाजारों में सुधारों को आगे बढ़ाने की अपील की है, इसके साथ ही उन्होंने निवेश और वृद्धि को बढ़ाने पर भी जोर दिया है।

राजन ने कहा कि यह समझने के लिए कि गलती कहां हुई है, हमें सबसे पहले मौजूदा सरकार में केंद्रीकृत व्यवस्था से शुरुआत करने की जरूरत है। निर्णय प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि इस सरकार में विचारों और योजनाओं को भी प्रधानमंत्री के आसपास मौजूद लोग या प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से जुड़े लोगों का एक समूह तय करता है। यह स्थिति पार्टी के राजनीतिक एजेंडे और सामाजिक एजेंडा के हिसाब से ठीक काम कर सकती है, लेकिन आर्थिक सुधारों के मामले में यह इतने बेहतर तरीके से काम नहीं कर सकती है। क्योंकि इस मामले में शीर्ष स्तर पर कोई सुसंगत स्पष्ट एजेंडा पहले से तय नहीं है, इसके साथ ही राज्य स्तर के मुकाबले राष्ट्रीय स्तर पर अर्थव्यवस्था किस तरह से काम करती है इसके बारे में भी जानकारी का अभाव है।

उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती सरकारें बेशक अव्यवस्थित गठबंधन थीं, लेकिन उन्होंने आर्थिक उदारीकरण के क्षेत्र में लगातार काम किया। राजन ने कहा कि सत्ता का अत्यधिक केन्द्रीकरण, मजबूत और सशक्त मंत्रियों का अभाव और एक सरल और स्पष्ट दिशा वाली दृष्टि की कमी से यह सुनिश्चित हुआ है कि कोई भी सुधार तब ही रफ्तार पकड़ता है जबकि पीएमओ उस पर ध्यान देता है, लेकिन जब पीएमओ का ध्यान दूसरे अहम मुद्दों की तरफ रहता है तो ये मुद्दे पीछे रह जाते हैं। उन्होंने लिखा है कि मोदी सरकार न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन के नारे के साथ सत्ता में आई थी। इस नारे का गलत मतलब लिया जाता है। इसका मतलब यह है कि सरकार चीजों को अधिक दक्षता से करेगी न कि लोगों और निजी क्षेत्र को अधिक करने की आजादी होगी।

पहले समस्या को स्वीकार करें सरकार
राजन ने कहा कि आर्थिक सुस्ती को दूर करने की शुरुआत के लिए यह जरूरी है कि मोदी सरकार सबसे पहले समस्या को स्वीकार करें। उन्होंने कहा कि भारत आर्थिक मंदी के घेरे में है। शुरुआती बिंदु यह है कि समस्या कितनी बड़ी है उसे समझा जाए, प्रत्येक आंतरिक या बाहरी आलोचक को राजनीतिक मंशा से प्रेरित नहीं बताया जाना चाहिए। यह मानना कि समस्या अस्थायी है और बुरी खबरों को दबाने और सुविधाजनक सर्वे के जरिए इसका हल किया जा सकेगा, यह सब बंद करना होगा। राजन ने लिखा है कि निर्माण, रीयल एस्टेट और बुनियादी ढांचा क्षेत्र गहरे संकट में हैं। इसी तरह गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भी दबाव में हैं। राजन ने यह भी कहा कि सरकार को मध्यम वर्ग के लिये व्यक्तिगत आयकर की दरों में कटौती से फिलहाल परहेज करना चाहिए और अपने अहम वित्तीय संसाधनों का उपयोग ग्रामीण गरीबों को मनरेगा जैसी योजनाओं के जरिए समर्थन देने के लिए करना चाहिए।

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