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Friday 22nd of October 2021
 
ब्लॉगर मंच

सोशल कर्फ्यू और पधारो म्हारे देश

मनोज वार्ष्णेय

लंबे लॉकडाउन के बाद जयपुर के निवासी और राजस्थान की जनता एक बार फिर लॉकडाउन जैसी जिंदगी का एहसास करने जा रही है। यह सोशल कर्फ्यू इस बार सरकार की ओर से नहीं बल्कि आम जनता द्वारा आम जनता के लिए है। दरअसल यह सोशल कर्फ्यू कोरोना या डेंगू के कारण नहीं लगाया जा रहा है,यह इसलिए लगाया जा रहा है ताकि हमारे बच्चे बिना किसी परेशानी के रीट की परीक्षा देकर अपना भविष्य सुरक्षित कर सकें। रीट की परीक्षा लंबे समय से टल रही थी और कोरोना ने इसे इतना लंबा खिंचवा दिया कि इसमें परीक्षार्थियों की संख्या तो रिकॉर्ड हुई ही साथ ही तमाम ऐसे परीक्षार्थियों को परीक्षा देने का मौका मिल गया जो कम समय में तैयारी करके पेपर देने को तैयार थे। अगर कोरोना को कारण मान लें तो परीक्षा देने वाले परीक्षार्थी इसकी तैयारी करते हुए बोर भी हो चुके थे और तमाम तो इस कदर बोर हुए कि दूसरी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गए।


रविवार यानी 26 सितंबर 2021 को होने वाली इस परीक्षा के लिए सरकार ने तैयारी करने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। ताकत इतनी कि इस परीक्षा को लेकर खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कमान अपने हाथ में ले रखी है। राजस्थान के इतिहास में यह पहली परीक्षा होगी जब आम जनता का सोशल कर्फ्यू इस परीक्षा को संपन्न कराने के लिए सरकार को सहयोग करेगा।
रविवार को ऐसे ही सरकारी कार्यालय,अधिकांश प्राइवेट संस्थान,तमाम बाजार,स्कूल-कॉलेज बंद रहते हैं,लेकिन इस रविवार को लॉकडाउन खुलने के बाद तथा सरकार द्वारा दी गई आम जनता को अधिक छूट के बाद रीट परीक्षा के कारण प्रदेश में सर्वाधिक भीड़ हर शहर में होनी है। जयपुर ही नहीं राजस्थान के दूसरे बड़े शहरों से छोटे शहरों तक में परीक्षा के केन्द्र हैं। श्राद्ध पक्ष चल ही रहा है और लोग घरों में ही रहना पसंद कर रहे हैं, इस पर भी सोशल कर्फ्यू एक बार फिर यह सिद्ध करता है कि राजस्थान की जनता साथी हाथ बढ़ाना में विश्वास करते हैं। लॉकडाउन के समय जो लोग दूसरों की मदद कर रहे थे,उन्हीं में से तमाम और दूसरे लोग भी अब रीट परीक्षा के परीक्षार्थियों की मदद के लिए आगे आए हैं। वे उन्हें नकल नहीं कराएंगे। वे उन्हें वो मदद देेंगे जो एक आम व्यक्ति अपने घर से बाहर होने के बाद दूसरों से उम्मीद करता है। पेपर देने के बाद खाने की तलाश करने वाले परीक्षार्थियों को खाना उपलब्ध कराने के लिए सामाजिक संगठन तैयार हैं तो कुछ लोगों ने इस बात के लिए भी तैयारी की है जो बच्चे बाहर से आ रहे हैं उन्हें ठहरने में कोई परेशानी न हो। अभी तक एक-दूसरे के घर जाने से डरने वालों ने अब अपने घरों के दरवाजे इसलिए खोल दिए हैं कि कोई परिचित यदि परीक्षा देने आए और उसे उनके शहर में परेशानी न हो। पधारो म्हारे देश का इससे बड़ा सामूहिक स्वर भला कहां सुनने को मिलता है? सरकार की मुफ्त बस यात्रा की तर्ज पर शहरों में जो सामाजिक समरसता नजर आने वाली है उससे मन में तरंग जगती है कि कोरोना जैसी बीमारी के समय में भी हम मदद के लिए पीछे नहीं रहते। अपनी मांगे मनवाने के लिए लोग बाजार या दूसरे प्रतिष्ठान बंद रखते हैं लेकिन यहां तो उल्टा है सरकार को सहयोग करने के लिए और दूसरों की मदद के लिए सोशल कर्फ्यू लगाना सिद्ध करता है कि हम जनसहयोग में जापान से कम नहीं हैं।


जनता की मांग रही है कि नकल कराने वाले, भ्रष्टाचार को रोशनी दिखाने वाले लोगों को कड़ी सजा मिले तो सरकार ने कह ही दिया है कि अगर नकल की तो या नकल कराई तो या फिर भ्रष्टाचार किया तो तुम्हारी जिंदगी पर दंड का सोशल कर्फ्यू लग जाएगा। अर्थात नौकरी से सीधे बर्खास्त होगे या फिर परीक्षार्थियों का क्या होगा यह बताने की जरूरत नहीं है। स्कूल-कालेज के लिए भी नियम आ ही गए हैं। क्या अच्छा हो कि जिस स्कूल-कालेज में सेंटर हो वहां का मैनेजमेंट परीक्षार्थियों को उनको अपने परिवहन के साधन उपलब्ध कराए और वह भी मुफ्त। यू भी इस परीक्षा के लिए सरकार ने उन्हें धन तो दिया ही है। तो यह सुुविधा वह क्यों नहीं दें? मतलब यह कि हर कहीं व्यवस्था और सोशल कर्फ्यू की जुगलबंदी रविवार को नजर आएगी और हम हैं कि इस सबके लिए खुद को तैयार कर चुके हैं। आखिर क्यों न हों,हैं तो हम भी हिंदुस्तानी,जिनके दिल में बसता है जीना तो है उसी का जो और के काम आया।


     मनोज वार्ष्णेय

(ये लेखक के अपने विचार हैं)