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Tuesday 16th of July 2019
इंडिया गेट

कठिन समय में एक गैरजरूरी बैठक

Thursday, June 20, 2019 10:05 AM

एक राष्ट्र, एक चुनाव के सवाल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से बुधवार को दिल्ली में बुलाई गई सर्वदलीय बैठक एक गैर जरूरी कवायद ही साबित हुई। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस सहित बसपा, डीएमके, टीआरएस और तृणमूल कांग्रेस जैसी क्षेत्रीय दलों ने भी बैठक से अपनी-अपनी वजहों से किनारा कर लिया। कांग्रेस का कहना है कि वह इस बैठक में शामिल नहीं हुई क्योंकि वह एक राष्ट्र, एक चुनाव के इस विचार से ही सहमत नहीं है। तो तृणमूल कांग्रेस की ओर से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बाबत संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद जोशी को एक पत्र लिखा है। इसमें उनने कहा है, ‘इतने अहम मसले पर विचार के लिए एक बैठक काफी नहीं है। ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ जैसे मुद्दे पर सरकार को श्वेत पत्र लाना चाहिए। जिससे विभिन्न दल उस पर विशेषज्ञों से बात करने के बाद राय प्रकट कर सकें। वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा है, ‘अगर सर्वदलीय बैठक ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) के मसले पर होती, तो मैं जरूर आती है। आज ईवीएम से चुनाव कराने की जिद लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है। वामदलों ने हालांकि बैठक में हिस्सा तो जरूर लिया मगर उनके नेताओं ने भी इस विचार का विरोध किया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रेशेखर राव और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी बैठक में हिस्सा लेना मुनासिब नहीं समझा।

बहरहाल इस मुल्क भर में चुनाव कराने के इस गैरजरूरी आइडिया का जो हश्र होना था, वही हुआ। जिन विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री की इस आइडिया का विरोध किया है, माना जा सकता है उनका मकसद सियासी हो। अगर यह सियासी है तो बेबुनियाद नहीं है। क्योंकि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के इस विचार की अपनी मौलिक समस्या है और यह समस्या हमारे संविधान के बरक्स है। हमारा संविधान लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली को स्वीकार करता है और साथ ही संविधान के अनुच्छेद-1 में यह भी कहा गया है कि इंडिया, जो भारत है वह राज्यों का एक संघ होगा। यानी हमारा संविधान राज्यों की स्वायत्तता को भलीभांति स्वीकार करता है। बेशक संविधान ने केन्द्र को अधिक ताकत दी है, पर केन्द्र को यह ताकत राज्यों की स्वायत्तता छीन कर नहीं दी गई है। जहां तक ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के विचार का सवाल है तो यह विचार राज्यों की स्वायत्तता के साथ खिलवाड़ करने वाला है। कल्पना कीजिए मुल्क की चुनाव प्रणाली में यह विचार लागू कर दिया गया और केन्द्र सरकार के साथ मुल्क के सभी सूबों में चुनाव हुए और किसी एक सूबे की सरकार में बहुमत की सरकार नहीं बन पाई। या अगर बन भी गई तो अगले 6 महीने में ही गिर गई। तो क्या होगा, क्या अगले साढ़े चार साल सूबे में राष्ट्रपति शासन लागू रहेगा। इस हालत में राज्यों की स्वायत्तता जो हमारे संविधान का बुनियादी मूल्य है, क्या उसके साथ समझौता नहीं होगा? फिर सवाल केवल सूबे भर का ही नहीं है। दूसरी स्थिति यह भी पैदा हो सकती है कि चुनाव में केन्द्र में ही किसी एक पार्टी या गठबंधन को बहुमत हासिल न हो सके, तो क्या मुल्क के सारे सूबों पर दोबारा चुनाव थोपा जाएगा? यहां सवाल केवल केन्द्र या सूबों में सरकार बन पाने या न बन पाने भर का नहीं है।

सवाल चुनाव में निष्पक्षता का भी है। यानी चुनाव आयोग की भूमिका का सवाल। अभी पिछले दिनों मुल्क में आम चुनाव हुआ और सात चरणों में चुनाव कराने पड़े। चुनाव की अधिसूचना से लेकर नतीजे आने तक तकरीबन 70 दिन लगे। और इस बीच चुनाव आयोग की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए। न केवल चुनाव आयोग की भूमिका अलबत्ता नतीजों के बाद ईवीएम को लेकर भी विपक्षी दलों और आम जनता के मन में पहले से कहीं अधिक शंका पैदा हुई है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने जिस बात की ओर साफ इशारा करते हुए प्रधानमंत्री की ओर से बुलाई गई बैठक का विरोध किया है। ऐसे में जरा कल्पना कीजिए कि अगर आम चुनाव और मुल्क के सभी सूबों में विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने पड़े तो क्या विश्वसनीयता का संकट झेल रहा चुनाव आयोग क्या पारदर्शिता के साथ चुनाव करा पाएगा। लिहाजा ऐसी गैर जरूरी बैठकों के बजाए आज दरकार इस बात की है कि चुनाव आयोग की घटती विश्वसनीयता और ईवीएम को लेकर सियासी पार्टियों और आम लोगों के जेहन में पैदा हो रही शंका का समाधान पहले किया जाए। पर पहले से भी प्रचंड बहुमत हासिल कर चुकी केन्द्र सरकार की प्राथमिकता में यह मुद्दे कहीं नजर नहीं आ रहे। फिर इस चुनाव में जिस तरह से धनबल का इस्तेमाल हुआ, वह भी एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंता का सबब है। एक खबर के मुताबिक अकेले भाजपा ने 27 हजार करोड़ रुपए खर्च किए है। चुनाव में पैसे का यह बढ़ता असर क्या सियासी पार्टियों के लिए विचार का मुद्दा नहीं होना चाहिए। और आखिरकार सबसे बड़ा सवाल है कि जब मुल्क की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट के दौर में हो तो एक राष्ट्र, एक चुनाव जैसे गैर जरूरी मसले पर विचार कर समय और संसाधन जाया करने का क्या तुक बनता है?

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)