Dainik Navajyoti Logo
Sunday 21st of April 2019
इंडिया गेट

इमरान खान का मोदी प्रेम

Saturday, April 13, 2019 10:50 AM
इमरान खान (फाइल फोटो)

पिछले दो आम चुनाव से मुल्क की सियासत में पाकिस्तान का भूत आ खड़ा हो रहा है। याद करें 2014 के आम चुनाव से पहले भाजपा के तमाम नेता अपने सियासी विरोधियों को पाकिस्तान भेज दिए जाने की धमकी दिया करते थे। सांसद गिरिराज सिंह और साक्षी महाराज जैसे नेताओं ने तो गोया ट्रेवल एजेंसी खोल रखी थी। पर पांच साल में तो वे एक अदद आदमी को भी पाकिस्तान नहीं भेज पाये। अलबत्ता, यह जरूर हुआ कि चुनाव जीतने के बाद खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिना बुलाए पाकिस्तान जरूर चले गए और अपने शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित कर मुल्क को चौंका डाला था। ऐसा लगा कि अब दोनों मुल्कों के बीच के विवाद हल होकर  रहेंगे। हालांकि ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, दोनों मुल्कों के रिश्ते और भी खराब होते चले गए। चुनाव आते-आते तो दोनों ही मुल्क एक बार फिर दो-दो हाथ करने पर आमादा नजर आने लगे। पाकिस्तान का सवाल एक बार फिर से मुल्क की सियासत पर जिन्न की तरह हावी होने लगा। बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद प्रधानमंत्री यह दावा करने लगे कि उन्होंने दुश्मन के घर में घुस कर प्रहार किया है, जो अब से पहले मुल्क में पहले कभी नहीं हुआ था। वे कई जगह अपने भाषणों में कहते पाए गए कि कांग्रेस आतंकवादियों के साथ खड़ी नजर आ रही है। तो भाजपा के नेता यह दावा करने सुने गए कि अगर 2019 के आम चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनते हैं तो पाकिस्तान में फटाखे फूटेंगे।

यानी कवायद खुद को देशभक्त और कांग्रेस और विरोधियों को देशद्रोही साबित करने की थी। और साथ ही पाकिस्तान के बरक्स राष्ट्रवाद की नई परिभाषा गढ़ने की भी थी। अब भला चुनावी सियासत पर पाकिस्तान भूत की तरह काबिज हो, तो भला पाकिस्तान के सियासतदां कैसे चुप रहते। उन्होंने भी खेल शुरू कर दिया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर नरेन्द्र मोदी दोबारा चुनाव जीत कर आते हैं तो वह पाकिस्तान के हित में होगा। और कश्मीर समस्या का समाधान पूरी तरह से मुमकिन हो सकेगा। दिलचस्प यह रहा कि उन्होंने अपने इसी बयान में कांग्रेस की आलोचना भी की। इमरान ने कहा कि उन्हें कश्मीर समझौते पर भव्य पुरानी पार्टी से कोई उम्मीद नहीं है। इमरान खान के इस बयान पर कांग्रेस भला क्यों पीछे रहती। उसने पलटवार किया कि साफ हो गया कि किसकी जीत से पाकिस्तान में फटाखे फूटेंगे। बेशक, इमरान के इस बयान ने कांग्रेस को भाजपा की कवायद के बरक्स पटलवार करने का एक मौका दे दिया हो। पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का यह बयान दोहरे अर्थोंवाला है। क्योंकि यह हकीकत है कि पाकिस्तान को लेकर कांग्रेस या पिछली मनमोहन सरकार की कूटनीति कभी बहुत उत्साहजनक नहीं रही। बेशक, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पाकिस्तान के खिलाफ कभी मुखर नहीं रहे। पर जब कभी उन्होंने पाकिस्तान के बरक्स भारतीय हितों की बात की तो उनका रुख बेहद सख्त हुआ करता था और उनने पाकिस्तान को कभी कोई रियायत नहीं दी। यहां तक कि उनका जन्म पाकिस्तान में ही हुआ था। कहा जाता है कि वर्ष 2004 में उनके प्रधानमंत्री बनने के साथ ही पाकिस्तान ने उनके पैतृक गांव तक सड़क की व्यवस्था चाक-चौबंद कर दी। इस उम्मीद में कि मनमोहन सिंह कभी भी अपना पैतृक गांव देखने की इच्छा जाहिर कर सकते हैं। पर पाकिस्तान को लेकर उनके सख्त रुख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपने दस साल के कार्यकाल में उन्होंने एक बार भी पाकिस्तान का दौरा नहीं किया। सवाल केवल मनमोहन सिंह की कूटनीति का ही नहीं है। उन्होंने असल में, वही किया जो उनकी पार्टी कांग्रेस की विरासत रही है। पाकिस्तान को लेकर पिछली किसी भी कांग्रेस सरकार का रुख कभी नरम नहीं रहा। बांग्लादेश युद्ध, सियाचिन पर कब्जा, सरक्रीक में समुद्री सीमा जैसे मुद्दे हैं, जो पाकिस्तान के सवाल पर कांग्रेस के सख्त रुख के सबूत रहे हैं।

इमरान खान के कहे मुताबिक जहां तक कश्मीर मुद्दे का सवाल है तो यह भी भूलने की दरकार नहीं है कि कश्मीर की जिस स्वायत्तता के सवाल को भाजपा अपना चुनावी मुद्दा बनाती रही है, उस स्वायत्तता को कालांतर में बेहद व्यवस्थित रूप से कांग्रेस की सरकारों ने कमजोर किया है। और यह तब हुआ है जब भाजपा जैसी कथित राष्ट्रवादी पार्टी का शायद ही कोई नामलेवा हो। लिहाजा, कश्मीर के सवाल पर कांग्रेस के रुख के बरक्स इमरान खान, नरेन्द्र मोदी में अपना विश्वास जता रहे हैं तो वह बेबुनियाद भी नहीं है। वैसे, इमरान एक तीर से दो निशाने लगाते भी नजर आते हैं। पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से दोनों मुल्कों के बीच सीमा पर तनाव बढ़ा है, नरेन्द्र मोदी की जीत को उन्होंने पाकिस्तान और कश्मीर के हित में बताकर उस तनाव को कम करने की कोशिश भी की है। सो, अगर इमरान खान को नरेन्द्र मोदी की जीत में अपना हित दिखता है तो वह यों ही नहीं है।    

- शिवेश गर्ग     
(ये लेखक के अपने विचार हैं)