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Monday 14th of October 2019
ओपिनियन

आंध्र प्रदेश की नई राजधानी अधर में

Monday, September 30, 2019 10:00 AM
फाइल फोटो।

गत मई माह में जब आंध्र प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व में वाई एस आर कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी तो इसने सबसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री और तेलेगुदेशम पार्टी के नेता चन्द्रबाबू नायडू के ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ राज्य के नई राजधानी अमरावती के निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी। यह कहा गया कि पिछली सरकार के काल में इस योजना के कार्यान्वन में भारी भ्रष्टाचार हुआ है। पहले उन सबकी जांच होगी तभी इस योजना पर आगे काम शुरू किया जाएगा। इसके साथ ही गुंटूर और विजयवाड़ा के बीच कृष्णा नदी के निकट बन रही इस राजधानी में निर्माण गतिविधियों पर विराम लग गया। 2014 में जब आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना बनाया गया तो अविभाजित आन्ध्र प्रदेश की राजधानी तेलंगाना के हिस्से में आई तथा आंध्र प्रदेश को अपनी राजधानी बनाने के लिए कहा गया तो तब नायडू सरकार ने कभी सत्वाहन राजवंश काल की राजधानी रही अमरावती को इसलिए चुना। आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना बनाए जाने निर्णय समय तब मनमोहन सिंह के नेतृव वाली कांग्रेसनीत सरकार केंद्र में थी। तब यह कहा गया था कि केंद सरकार नई राजधानी के निर्माण के लिए एक आर्थिक पैकेज देगा। इसके साथ ही विश्व बैंक सहित नया अन्तराष्ट्रीय वित्त संस्थाओं से कर्ज दिलवाने की वयवस्था करवाई जाएगी।

नायडू ने दावा किया था कि राज्य की नई राजधानी अमरावती विश्व स्तर का शहर होगा। जिसमें सब कुछ आधुनिक और अपनी ही तरह का होगा। विश्वभर के विशेषज्ञों से सलाह कर नई राजधानी का स्थल तथा पूरी परियोजना का प्रारूप तैयार किया गया। दो चरणों में बनने वाली इस राजधानी के योजना पर कुल 1.10 लाख करोड़ की लागत आनी थी। बाद में यह रही बढ़कर 2 लाख करोड़ हो गई क्योंकि इस मेट्रो रेल सेवा तथा अन्य कई सुविधाएं जोड़ने क निर्णय किया गया। नई राजधानी के निर्माण के लिए कुल 217 वर्ग किलोमीटर जमीन का अधिग्रहण किया जाना था जिसमें से अधिकतर कृषि भूमि थी। नई राजधानी के स्थान की घोषणा होते ही यहां जमीन की कीमतों में बेहिसाब वृद्धि हो गई। सरकार ने अच्छी खासी कीमत पर किसानों की जमीनों का अधिग्रहण किया। इस ड्रीम कैपिटल का जिस ढंग से प्रचार किया गया उससे बड़ी-बड़ी कंपनियों, यहां तक कि मल्टीनेशनल कंपनियों ने यहां अपने ऑफिस निर्माण करने के लिए जमीनें खरीदना शुरू कर दिया। एक समय ऐसा भी आया कि यहां एक एकड़ जमीन की कीमत 2 करोड़ तक पहुंच गई। जबकि सामान्य तौर पर यह केवल 80 लाख रूपये होनी चाहिए थी। बड़ी-बड़ी आवास निर्माण कंपनियों ने यहां ऊंची कीमतों पर काफी जमीन खरीदी। उनका अंदाज था कि नई राजधानी में आवसीय मांग बहुत अधिक होगी और वे अपने आवास अच्छे खासे लाभ पर बेच सकेंगे।

एक समय यहां सरकारी और गैर सरकारी निर्माण इतनी तेजी से हो रहे थे कि उन पर लगभग 2 हजार इंजीनियर काम पर लगे थे। मजदूरों के संख्या तो कई हजारों में थी। इनके रहने के लिए आवास की मांग को देखकर किसानों के अपनी कृषि जमीन पर मिले मुआवजे की राशि से घर बनाकर उसे ऊंचे किराए पर उठाकर अच्छी खासी कमाई का जरिया बना लिया। जो किसान अधिक तेज थे उन्होंने कुछ अपनी राशि और बाकी बैंक से कर्ज लेकर मिट्टी खोदें वाली बड़ी मशीनें खरीद कर निर्माण कंपनियों को किराये पर दी या उन्होंने इन मशीनों के आधार पर मिट्टी हटाने के ठेके ले लिए। पिछले चार साल में वे किसान भी अच्छी खासी कमाई करने लगे जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे। ऐसा भी समय था कि आवास की आभाव में निर्माण कार्यों में लगे इंजीनियर तथा अन्य कर्मी रोज हैदराबाद से आते थे और शाम को वापस लौट जाते थे। बड़ी संख्या में राजधानी क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण, जो राजधानी के निर्माण के लिए गठित की गई थी तथा अन्य सरकारी कर्मचारी और अधिकारी भी रोज हैदराबाद अथवा अन्य स्थानों से आते थे क्योंकि यह तो उन्हें आवास नहीं मिल रहा था। अगर मिलता भी तो उसका किराया उनकी पहुंच से बाहर था। लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ ही यहां का सारा परिदृश्य ही बदल गया।

सरकार द्वारा निर्माण पर रोक लगा देने के बाद विश्व बैंक और एशियाई डेवलपमेंट बैंक जिन्होंने मिलकर लगभग 3600 करोड़ कर्ज इस राजधानी परियोजना के लिए देना था। वह रोक दिया। इस बारे में उन्होंने केंद्र सरकार और राज्य सरकार को पत्र लिखकर कर्ज देने में असमर्थता जताई है। आज हालत यह है कि जिन किसानों ने अपने और बैंक कर्ज के पैसों से मिट्टी खोदने और उठाने के महंगे संयंत्र खरीदे थे। वे उनके घरों के सामने पड़े है। उन्हें अब बैंक की मासिक किश्त भी देने में भी मुश्किल हो रही है। जिन्होंने किराए पर देने के लिए छोटे-छोटे मकान बनवाए थे वे खाली पड़े है। मोटे तौर लगभग 70 प्रतिशत मकान खाली पड़े है। जिन बड़ी आवास निर्माण कंपनियों यहां अपने प्रोजेक्ट शुरू में किए थे उनकी हालत और भी पतली है। एक समय था कि प्रोजेक्ट घोषणा के साथ ही सारे फ्लैट बुक हो जाते थे लेकिन अब अनिश्चिता की स्थिति के कारण खरीदारों ने अपनी बुकिंग रद्द कर दी है और अग्रिम दी गई राशि वापस मांग रहे हैं। नए खरीदार या तो हैं ही नहीं या निर्माण कंपनी को उसकी कीमत का आधा पैसा भी देने को तैयार नहीं है। राज्य सरकार हाउसिंग बोर्ड ने भी यहां 1200 लक्जरी फ्लैट्स के एक मल्टीस्टोरी प्रोजेक्ट ‘हैप्पी नेस्ट’ की घोषणा की थी। घोषणा के पहले ही दिन सारे के सारे  फ्लैट बुक हो गए। अब खरीदार इसके लिए रो रहे हैं क्योंकि प्रोजेक्ट पर काम रूक गया है और उन्हें कोई बताने वाला नहीं कि फ्लैट कब मिलेगें। ऐसा लगा रहा है कि नायडू का यह ड्रीम प्रोजेक्ट अधर में झूल गया है।

लोकपाल सेठी (ये लेखक के अपने विचार हैं)