Dainik Navajyoti Logo
Monday 14th of October 2019
ओपिनियन

तमिलनाडु : दक्षिण में हिंदी विरोध का केंद्र

Monday, September 23, 2019 10:10 AM
स्टालिन (फाइल फोटो)

उत्तर भारत में आमतौर पर यह समझा जाता है कि दक्षिण के सभी राज्य हिंदी का विरोध करते है। पर सच्चाई यह है कि हिंदी का विरोध मोटे तौर पर तमिलनाडु में ही है। केरल, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसका विरोध बहुत कम और इन राज्यों में हिंदी के विरुद्ध खुलकर अथवा कोई बड़ा विरोध या आन्दोलन नहीं हुआ। तमिलनाडु में हिंदी विरोध की जड़ें लगभग आठ दशक पहले पड़ी थीं। उस समय इस राज्य में पहली बार सी. राजगोपालचारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी थी। इस सरकार ने राज्य में स्कूलों में हिंदी पढाए जाने का निर्णय किया। राज्य में द्रविड़ आन्दोलन के जनक पेरियार और उनकी पार्टी डीके राज्य में हिंदी की पढ़ाई करवाए जाने का विरोध किया। एक बड़ा आन्दोलन भी हुआ और इसके चलते सरकार को स्कूलों में हिंदी पढ़ाए जाने के फैसले को वापस लेना पड़ा। आजादी के बाद हिंदी को  राजभाषा बनाए जाने का निर्णय किया गया तो इसका सबसे अधिक विरोध तमिलनाडु में हुआ। तब बाद में कहा गया कि सरकारी कामकाज की भाषा पहले की तरह इंग्लिश ही रहेगी। हिंदी केवल एक सम्पर्क भाषा रहेगी। केंद्र किसी भी राज्य पर हिंदी नहीं थोपेगा।

स्कूलों में पढ़ाई के लिए त्रिभाषी फार्मूला बनाया गया जिसके अंतर्गत प्रत्येक राज्य इंग्लिश स्थानीय भाषा के साथ-साथ तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को स्कूलों में पढाएगा। लेकिन तमिलनाडु ने तीसरी भाषा के रूप में हिंदी पढाए जाने को कभी लागू नहीं किया। दक्षिण के अन्य राज्यों में हिंदी पढाए जाने को आंशिक रूप से लागू किया गया। तमिलनाडु में हिंदी का विरोध करने में भाषाई, सामाजिक अथवा सास्कृतिक संगठनों की बजाए राजनैतिक दल ही आगे थे। इसमें भी सबसे आगे द्रमुक था जिसका मुख्य एजेंडा  केवल हिंदी का विरोध ही करना है। धीरे वोट बैंक के चक्कर में अन्य द्रविड़ दलों ने भी  हिंदी  का विरोध करना शुरू किया। इस समय कोई भी ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं हैं जो हिंदी का विरोध ना करता हो। राज्य में बीजेपी कोई बड़ी ताकत नहीं है फिर भी इसके नेता खुलकर हिंदी का विरोध नहीं करते। अगर इस राजनीतिक विरोध के इतर देखा जाए तो दक्षिण के इस राज्य में भाषा के मामले में धरातली सच्चाई अलग हैं। एक समय था जब हिंदी के होर्डिंग, बैनर तथा पोस्टर फाड़ दिए जाते थे। केंद्र सरकार के दफ्तरों के साईन बोर्डों पर हिंदी नामों को कालिख से पोत दिया जाता था। इसी प्रकार रेलवे स्टेशनों के हिंदी में लिखे नामों को भी हटा दिया जाता था। आज वह स्थिति नहीं है। अब बोर्डो पर हिंदी लिखी जाती है। केवल इतना ही नहीं, हिंदी भाषा की फिल्में इस तथा दक्षिण के अन्य राज्यों में अच्छी खासी कमाई करती है। इसके विपरीत एक समय था जब हिंदी फिल्मों को यहां रिलीज भी नहीं किया जा सकता था। विभिन्न टीवी चैनलों के सास बहु जैसे सीरियल दक्षिण के राज्यों में उतने ही लोकप्रिय जितने उत्तर भारत के राज्यों में अगर ग्रामीण इलाकों को छोड़ दिया जाए तो सभी बड़े शहरों में हिंदी समझी जाती है। युवा पीढ़ी को लगता है कि अगर उन्होंने हिंदी नहीं सीखी तो उन्हें दिल्ली सहित उत्तर भारत के राज्यों में नौकरी नहीं मिल पाएगी। कुल मिलाकर दक्षिण में हिंदी का विरोध भाषाई कारणों से नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से अधिक है।

गत 14 सितंबर को हिंदी दिवस से जुड़े एक समारोह में जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि देश में हिंदी सभी राज्यों में समझी जाती है। इसलिए इसका  राष्ट्रीय भाषा के रूप में लागू किए जाने का विरोध नहीं करना चाहिए। उनकी बात काफी हद तक सही भी है। अगर अधिकारिक आंकड़ों को देखा जाए तो इस समय देश के लगभग 44 आबादी हिंदी बोलती अथवा समझती है। यह आकंडा 2011 की जन गणना का है। अब यह आंकड़ा कहीं अधिक हो गया है। देश की कोई अन्य भाषा दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं करती। देश में तमिल बोलने वालों की संख्या मात्र 5.7 है, कन्नड़ 3.6 प्रतिशत है और मलयालम इससे भी कम 2.9 प्रतिशत है। जैसा कि अनुमान था शाह की इस टिप्पणी पर दक्षिण में सबसे अधिक प्रतिक्रिया तमिलनाडु में ही हुई। इस बार इसका बड़ा कारण हाल के लोकसभा चुनाव के नतीजे हैं। जिसमें बीजेपी पहले से भी बड़ी ताकत के रूप में उभर कर आई है और उसके प्रभाव दक्षिण में भी बढ़ रहा है। कुछ राजनीतिक दलों को भय खा रहा है कि नरेन्द्र मोदी जैसे कड़े निर्णय लेने वाले प्रधानमंत्री निकट भविष्य में हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्थापित करने के निर्णय ले सकते है।

सबसे पहला विरोध तमिलनाडु में प्रमुख विपक्षी दल द्रमुक के सुप्रीमो स्टालिन की तरफ से आया। उन्होंने राज्य में हिंदी के विरोध में बड़ा आन्दोलन करने की घोषणा कर दी। क्योंकि राज्य में विधानसभा के चुनाव नजदीक आ रहे है। इसलिए इस तरह के आन्दोलन शुरू होना स्वाभाविक है। सबसे अजीबो-गरीब टिप्पणी मार्क्सवादी नेता और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की तरफ से आई। उनका कहना था कि हिंदी के नाम पर बीजेपी और संघ परिवार दक्षिण में अपना हिंदुत्व का एजेंडा लागू करनी की कोशिश कर रही है। कुछ राजनेताओं की टिप्पणियों के अलावा केरल में हिंदी के विरोध की कोई बड़ी आवाज नहीं उठी। आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना में तेलगु के साथ-साथ दकिनी भाषा भी बोली जाती है। यह भाषा हिंदी, उर्दू, मराठी और तेलगु का मिश्रण है लेकिन मोटे तौर पर यह हिंदी जैसी ही है। इसलिए शाह की टिप्पणी पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई। कर्नाटक में मई 2018 में हुए विधानसभा के चुनावों के कुछ पहले कन्नड़ गौरव के नाम पर कुछ साहित्यक और संस्कृतिक संगठनों ने बेंगलुरु की मेट्रो ट्रेन के स्टेशनों पर हिंदी में लिखे नाम हटाए जाने की मांग की थी।
लोकपाल सेठी (ये लेखक के अपने विचार हैं)