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Monday 14th of October 2019
ओपिनियन

वायुसेना को चाहिए दो सौ लड़ाकू विमान

Monday, September 23, 2019 10:05 AM
फाइल फोटो।

एक ओर जहां स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान ‘तेजस’ और हवा से हवा में मार करने वाली स्वदेश निर्मित ‘अस्त्र’ मिसाइल तथा फ्रांस से मिलने वाले अत्याधुनिक ‘राफेल’ विमान वायुसेना के बेड़े में शामिल होकर भारतीय वायुसेना को और मजबूत तथा अत्याधुनिक बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले हैं, वहीं पिछले दिनों वायुसेना प्रमुख एयर चीफ  मार्शल बी एस धनोआ ने जिस प्रकार वायुसेना के बेड़े में शामिल 44 साल पुराने मिग लड़ाकू विमानों को लेकर चिंता जाहिर की। उससे वायुसेना में लड़ाकू विमानों की कमी और वायुसेना की जरूरतों का स्पष्ट अहसास हो जाता है। दरअसल वायुसेना को फिलहाल करीब 200 अत्याधुनिक विमानों की आवश्यकता है और राफेल तथा स्वदेशी विमानों के वायुसेना के बेड़े में शामिल होने के बाद भी इस कमी को पूरा करना संभव नहीं दिखता। हालांकि वायुसेना के आधुनिकीकरण और सशक्तिकरण की दिशा में पिछले कुछ वर्षों में सशक्त कदम उठाए गए हैं लेकिन अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

पिछले दिनों एयर चीफ मार्शल धनोआ ने कहा था कि हमारी वायुसेना जितने पुराने मिग विमानों को उड़ा रही है, उतनी पुरानी तो कोई कार भी नहीं चलाता। उक्त कथन वायुसेना प्रमुख ने दिल्ली में ‘भारतीय वायुसेना का स्वदेशीकरण और आधुनिकीकरण योजना’ विषय पर आयोजित एक सेमिनार में व्यक्त किए थे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति में उनका कहना था कि भारतीय वायुसेना की स्थिति बिना लड़ाकू विमानों के बिल्कुल वैसी ही है, जैसे बिना फोर्स की हवा। धनोआ का दो टूक लहजे में यही कहना था कि दुनिया को अपनी हवाई ताकत दिखाने के लिए हमें अभी और अधिक आधुनिक लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है। उनके मुताबिक मिग विमानों का निर्माता देश रूस भी अब मिग-21 विमानों का उपयोग नहीं कर रहा है लेकिन भारत इन विमानों को अभी तक उड़ा रहा है क्योंकि हमारे यहां इनके कलपुर्जे बदलने और मरम्मत की सुविधा है। हालांकि उनकी इस टिप्पणी को अगर बहुत पुरानी कारों का इस्तेमाल न किए जाने से जोड़कर देखें तो उसका सीधा सा अर्थ है कि जब कलपुर्जे बदलकर मरम्मत के सहारे इतनी पुरानी कार को चलाना ही किसी भी दृष्टि से किफायती या उचित नहीं माना जाता तो मिग-21 विमानों को कैसे माना जा सकता है?

हालांकि मिग अपने समय के उच्च कोटि के लड़ाकू विमान रहे हैं लेकिन अब ये विमान इतने पुराने हो चुके हैं कि सामान्य उड़ान के दौरान ही क्रैश हो जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में ही मिग विमानों की इतनी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं कि अब इन्हें हवा में उड़ने वाला ताबूत भी कहा जाता है। बहरहाल, अच्छी खबर यह है कि फ्रांस से अत्याधुनिक तकनीक से निर्मित राफेल विमानों की आपूर्ति शुरू होते ही वायुसेना के बेड़े से मिग विमान हटने शुरू हो जाएंगे। लेकिन फिलहाल भारत को अगले तीन वर्षों के भीतर कुल 36 राफेल विमान ही मिलने हैं जबकि भारतीय वायुसेना को इस समय अपने बेड़े में करीब 200 अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है। चरणबद्ध तरीके से मिग विमानों की विदाई होते जाने के बाद वायुसेना की जरूरतों की पूर्ति करने के लिए सुखोई विमानों के अलावा तेजस विमान भी मिग का स्थान लेंगे किन्तु इनके वायुसेना के बेड़े में शामिल होने के बाद भी वायुसेना को बड़े पैमाने पर आधुनिक लड़ाकू विमानों की जरूरत रहेगी, इसलिए संभावना है कि आने वाले समय से आधुनिक विमानों की खरीद के कुछ और बड़े सौदे हो सकते हैं।

इसके अलावा जिस प्रकार रक्षामंत्री द्वारा विदेशी निर्माताओं पर निर्भरता कम करने की बातें कही जा रही हैं, उससे संभव है कि तेजस जैसे ही कुुछ और स्वदेशी लड़ाकू विमानों के निर्माण की दिशा में तेजी देखने को मिले। ऐसे में आधुनिक विदेशी और स्वदेशी लड़ाकू विमानों से लैस भारतीय वायुसेना की शक्ति में बढ़ोतरी होगी और कहना गलत नहीं होगा कि भारत की सैन्य शक्ति ऐसे में बेमिसाल होगी। दरअसल भारत द्वारा जो लड़ाकू विमान बनाए जा रहे हैं, वे भी अनेक विशेषताओं से लैस अपने आप में बेहतरीन हैं।
योगेश कुमार गोयल (ये लेखक के अपने विचार हैं)