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Thursday 19th of September 2019
ओपिनियन

विलय समस्या का समाधान नहीं है

Friday, September 06, 2019 11:30 AM
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण( फाइल फोटो)

बैंकों का बढ़ता एनपीए गंभीर चिंता का विषय है जो कि बैंकों को समामेलित करने के लिए प्रेरित कर रहा है। एनपीए के नुकसान की भरपाई के लिए सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों में पूंजी डालकर थक चुकी है। इसके बावजूद भी इस वित्तीय वर्ष में सरकार 70 हजार करोड़ की पूंजी सार्वजनिक बैंकों में डाल रही है। अब वह कमजोर बैंक को दूसरी मजबूत बैंकों में मर्जर के शॉर्टकट का मार्ग अपना रही है। यह बात सही है कि देश में बैंकों की संख्या कम होनी चाहिए। देश में सिर्फ 3 से 4 सरकारी बैंक, 3 से 4 प्राइवेट सेक्टर बैंक और एक या दो विदेशी बैंक होने चाहिए। अधिक बैंक होने से बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा का फायदा चूककर्ता ऋणी आसानी से उठा लेते है। वे एक बैंक के अपने अनियमित खातों को नियमित करने के लिए दूसरे बैंक से अपनी नई फर्जी कंपनी बनाकर ऋण लेते हैं और फिर दूसरे बैंक के ऋण खातों को ठीक करने के लिए तीसरे बैंक से एक और नई फर्जी कंपनी बनाकर ऋण लेते हैं। इस प्रकार ऐसे चूककर्ता ऋणी कई सालों तक इस प्रकार की फर्जी कंपनियां खड़ी करके कई बैंकों को चूना लगाते रहते है और जब किसी कारण से इनकी और ऋण लेने की चेन टूट जाती है तो इनका भांडा फूट जाता है। इतने अधिक पब्लिक सेक्टर बैंकों की स्थापना के लिए लाइसेंस जारी करने के स्थान पर कुछ ही बैंकों की स्थापना की जानी चाहिए थी जिससे उन्हीं कम बैंकों का प्रबंधन आसानी से किया जा सकता था एवं उन पर निगरानी और नियंत्रण भी आसानी से रखा जा सकता था। बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा होने से बैंकों द्वारा ग्राहक की आर्थिक हैसियत और क्रेडिट रेटिंग का उचित विश्लेषण किए बिना ही अनसिक्योर्ड लोन बांट दिए जाते हैं। बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण बैंक ऋण देने में सही व्यक्ति और सही परियोजना का चयन नहीं कर पाता है और जल्दबाजी में ऐसे ऋण स्वीकृत व वितरण कर देते है जो कि एक या दो वर्षों में ही एनपीए में परिवर्तित हो जाते हैं।

सरकार के अनुसार बैंकों को घाटे से उबारने एवं फंसे कर्ज की समस्या को दूर करने के ठोस उपायों में सरकार चाहती है किÞ बैंकों के विलय की प्रक्रिया को तेज गति से आगे बढ़ाया जाए। सरकार के मतानुसार बैंकों के अच्छे नियमन और नियंत्रण के लिए बैंकों का विलय जरूरी है। वित्त मंत्रालय के अनुसार बैंकों के विलय से बैंकों की दक्षता और संचालन में सुधार होगा। यह बात सही है कि उदारीकरण के दौर से ही सरकारी बैंकों के विलय कि प्रक्रिया चल रही है। मोदी सरकार के पहले न्यू बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक में विलय हो चुका था। निजी बैंक रत्नाकर बैंक और श्री कृष्णा बैंक का केनरा बैंक में विलय हुआ था। आईएनजी वैश्य बैंक का कोटक महिंद्रा बैंक में विलय हुआ था। हमारे देश में बैंकों के विलय का पुराना रिकॉर्ड ठीक नहीं रहा हैं। न्यू बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब नेशनल बैंक का विलय, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और ओरियंटल बैंक ऑफ  कॉमर्स का विलय, भारतीय स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों का विलय हमारे सामने उदाहरण है। भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा आईडीबीआई बैंक का अधिग्रहण किया गया है।

सरकार ने 1 अप्रेल, 2019 को विजया बैंक और देना बैंक का बैंक आॅफ  बड़ौदा में विलय कर दिया है। इन बैंकों में फंसे हुए कर्ज की समस्या अन्य बैंकों के समान और अधिक बढ़ती गई। अब सरकार मेगा कंसॉलिडेशन प्लान के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों का विलय करके चार बड़े बैंक बना रही है। इस मेगा प्लान के तहत सरकार पंजाब नेशनल बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ  कॉमर्स तथा यूनाइटेड बैंक ऑफ  इंडिया का आपस में विलय, केनरा बैंक और सिंडिकेट बैंक का विलय, यूनियन बैंक ऑफ  इंडिया में आंध्रा बैंक तथा कॉर्पोरेशन बैंक का विलय और इंडियन बैंक में इलाहाबाद बैंक का विलय कर रही है। इस बड़े मर्जर प्लान के क्रियान्वयन के पश्चात देश में 27 की जगह सिर्फ 12 सार्वजनिक बैंक रह जाएंगे।

सरकार का कहना है कि बैंकों के विलय के पश्चात सरकारी बैंक मजबूत होंगे और वे अधिक राशि के ऋण देने के लिए सक्षम हो जाएंगे, जिससे सुस्त होती अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिलेगी और 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल हो जाएगा। विलय से बैंकों के जोखिम और अधिक बढ़ जाते हैं। 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य तो हासिल हो जाएगा लेकिन भविष्य में बैंकों के एनपीए इतने बढ़ जाएंगे कि बैंकों को इस एनपीए नामक बीमारी से निजात पाना मुश्किल हो जाएगा। बैंकों के विलय से बैंक अधिक ऋण देने के लिए सक्षम हो जाएंगे। अधिक ऋण के वितरण से बैंकों की बैलेंस शीट बिना एनपीए कम किए सुधर जाएगी क्योंकि कुल ऋण राशि बढ़ने से सकल एनपीए का प्रतिशत कुल ऋण राशि की तुलना में कम हो जाएगा। सरकार कब तक इन सार्वजनिक बैंकों में पूंजी डालती रहेगी?

राष्ट्रीयकृत बैंकों के विलय से कॉर्पोरेट घरानों और पूंजीपतियों की लूट का रास्ता और आसान होता जा रहा हैं। वित्तीय संस्थाओं, बैंकों का विलय तो बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के अनुसार ही होना चाहिए न की सरकार के हस्तक्षेप से। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों के गठजोड़ और विलीनीकरण करने से पहले मर्जर होने वाली बैंकों की बैलेंसशीट को स्वच्छ (एनपीए मुक्त) करने की सलाह दी थी। बैंकों का विलय एक पेचीदा मुद्दा है। बैंकों का विलय करने से फंसे कर्ज की वसूली नहीं हो पाएगी और बैंक प्रबंधन का पूरा ध्यान विलय के मुद्दे पर चला जाएगा। स्टेट बैंक आॅफ  इंडिया में 5 सहयोगी बैंकों के विलय से कोई चमत्कार नहीं हुआ बल्कि 200 साल में पहली बार स्टेट बैंक को घाटा हुआ था। सरकार को इसमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। क्या बैंकों का मर्जर ही रामबाण इलाज है? सार्वजनिक बैंकों का विलय करना समस्या का समाधान नहीं है, यह तो वैसा ही हुआ कि हम हाथ में लगी चोट का बेहतर इलाज करने के बजाए हाथ को ही कटवा डालने का विकल्प चुनना चाहते है।

दीपक गिरकर (ये लेखक के अपने विचार हैं)