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Thursday 19th of September 2019
ओपिनियन

कर्नाटक : मध्यावधि चुनाव की बढ़ती संभावनाएं

Monday, September 02, 2019 10:40 AM
बीएस येद्दियुरप्पा (फाइल फोटो)

कर्नाटक में येद्दियुरप्पा के नेतृत्व में बनी बीजेपी सरकार को फिलहाल केवल एक माह से कुछ अधिक समय हुआ है। लेकिन अभी से इसमें सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। विपक्षी दल कांग्रेस और जनता दल (स) के नेता खुले तौर पर और बार-बार कह रहे हैं कि यह सरकार अधिक दिन नहीं चलने वाली, इसलिए उन्होंने अभी से मध्यावधि चुनावों की तैयारियां शुरू कर दी है। खुद बीजेपी के कुछ वरिष्ठ नेताओं में भी यह खुसुर पुसर हो रही है कि उनकी वर्तमान सरकार के दिनमान ठीक नहीं तथा केंद्रीय नेतृत्व आने वाले कुछ समय में यह फैसला कर सकता है कि विधानसभा को भंग कर मध्यावधि चुनाव करवाए जाएं तो उसमें बीजेपी को विधानसभा में पूर्ण बहुमत मिल सकता है।

देश में संभवत: यह पहला मौका है जब किसी राज्य में एक, दो नहीं बल्कि तीन उप मुख्यमंत्री बनाए गए हैं। तीनों उप मुख्यमंत्री राज्य की तीन प्रमुख जातियों द्वारा लिंगायत, वोक्कालिंगा तथा दलित जाति के हैं। राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि इसके पीछे पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा हाल ही बनाए गए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव, संगठन बीएल, संतोष का दिमाग है। संतोष अब तक राज्य में पार्टी के संगठन महासचिव थे तथा वे राज्य की राजनीति को अन्य पार्टी नेताओं से अधिक समझते हैं। वे एक रणनीतिकार माने जाते हैं। येद्दियुरप्पा मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में कुल 17 मंत्री बनाए गए। यह पहला विस्तार भी सरकार बनने के लगभग तीन सप्ताह बाद हो सका। क्योंकि अनुच्छेद 370 को समाप्त किए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर के स्थिति को लेकर अमित शाह व्यस्त थे। लगभग सभी मंत्रियों का चयन अमित शाह और बीएल संतोष ने किया। येद्दयुरप्पा की इस मामले में अधिक नहीं चली। इसको लेकर बीजेपी के एक वर्ग में असतोष पैदा हुआ, जो अभी थमने का नाम नहीं ले रहा। विभागों के बंटवारे के बाद तो यह असंतोष और बढ़ गया। नए मंत्रिमंडल में दो पूर्व मख्यमंत्री भी रहे चुके मंत्री भी हैं। इसलिए वे महत्वपूर्ण विभाग चाहते थे। सबसे बड़ा असंतोष नए उप मुख्यमंत्रियों को लेकर है। क्योंकि इनमें एक लक्ष्मण सवदी विधानसभा चुनाव ही नहीं जीत पाए थे तथा वे वर्तमान में दोनों में से किसी भी सदन के भी सदस्य नहीं है। दूसरे अश्वरथ नारायण पार्टी के कोई बाद नेता नहीं हैं। लेकिन यह कहा जाता है कि इन दोनों नेताओं ने पिछली सरकार को गिराने के लिए चलाए गए आॅपरेशन कमल में बड़ी भूमिका निभाई थी। सबको लगता था कि आदिवासी नेता बी श्रीरोमुलू को उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। पूर्व में मुख्यमंत्री रहे आर अशोक ने साफ कह दिया कि वे सीधे मुख्यमंत्री के नीचे काम करेंगे, उप मुख्य्मन्त्रियों के नीचे नहीं। एक मंत्री तो उनको मिले विभागों से इतने नाखुश थे कि उन्होंने सरकार द्वारा दी गई कार ही लौटा दी। उधर मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा के कहने पर बीएल संतोष ने असंतुष्टों को फिलहाल शांत रहने को कहा है तथा धीरे-धीरे उनकी शिकायतों पर गौर किया जाएगा। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि तीन उप मुख्यमंत्रियों का चयन बड़ी सोच समझ कर किया गया है। एक तो इससे संभावित मध्यावधि चुनावों में जातिगत समीकरणों को ठीक से उपयोग किया जा सकेगा। दूसरा इसमें पार्टी नेताओं की अगली पीढ़ी तैयार करने में सहायता मिलेगी। क्योंकि तीनों उप मुख्यमंत्री युवा हैं तथा अपनी जातियों के उभरते नेता हैं।

अभी की परम्परा के अनुसार बीजेपी में 75 वर्ष की अधिक आयु के नेता को बड़ा पद नहीं दिया जाता। लेकिन येद्दियुरप्पा के मामले में इसमें ढील की गई। वे 76 के हो गए है। पहले उन्हें राज्य पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया फिर विधानसभा चुनावों में उन्हें पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किए गया। वे लिंगायत वर्ग से आते है। राज्य में  लिंगायत राज्य की कुल आबादी का 16 प्रतिशत है लेकिन उनका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव उनकी आबादी की तुलना से कहीं अधिक है। येद्दियुरप्पा इस समुदाय के सबसे बड़े और निर्विवादित नेता है। बीजेपी हलकों में यह माना जाता है है कि अगर राज्य में मध्यावधि चुनाव होता हो और बीजेपी फिर सत्ता में आती है तो संभवत येद्दियुरप्पा के मुख्यमंत्री ना बनाकर किसी युवा नेता को सरकार चलाने की जिम्मेदारी दी जा सकती है। इस सन्दर्भ में लक्ष्मण सवदी, जो लिंगायत वर्ग के हैं, को मुख्यमंत्री का पद मिल सकता है। पिछली सरकार के समय विधानसभा के अध्यक्ष पद रहे रमेश ने जाते-जाते कांग्रेस और जनता दल-स के 17 विधायकों को दल बदल कानून के अंतर्गत सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया था। केवल इतना ही नहीं उन्हें विधानसभा के शेष कल में चुनाव लड़ने से भी अयोग्य घोषित कर दिया था। इन सभी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है लेकिन अभी उनकी याचिका पर सुनवाई होनी है।

अगर चुनाव आयोग इन सब सीटों पर उप चुनाव करवाने का निर्णय करता है तो येद्दियुरप्पा और बीजेपी के एक बड़ी चुनौती होगी। इन 17 विधायकों के अयोग्य घोषित किए जाते से 225 सदस्यों वाली विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 208 रह गई है जबकि बीजेपी के पास 207 सदस्य है। बीजेपी को अपना बहुमत पाने के लिए कम से कम 7 सीटें जीतना जरूरी है। चूंकि इन 17 विधायकों की सदस्यता इसलिए गई क्योंकि उन्होंने अपनी पार्टी से बगावत करके बीजेपी का समर्थन करने का निर्णय किया। चूंकि फिलहाल वे चुनाव नहीं लड़ सकते। इसलिए वे चाहते हैं उनके किसी रिश्तेदार अथवा उनके किसी करीबी को बीजेपी अपना उम्मीदवार बनाए। अब चूंकि कांग्रेस और जनता दल-स का समझौता टूट चूका हैं। इसलिए बीजेपी नेताओं को विश्वास  है उनके लिए 17 में से अधिकाश सीटें जीतना मुश्किल नहीं होगा। अगर सर्वोच्च न्यायालय इन 17 विधायकों की याचिका पर फैसला होने तक उप चुनाव करवाए जाने पर रोक लगता है तो अगले मई 2023 तक सदन में  यही स्थिति बनी रहेगी। लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का मानना है कि इस समय देश बीजेपी की हवा चल रही है। इसलिए अगर मध्यावधि चुनाव होते है तो पार्टी पहले से अधिक सीटें जीत सकती है।             
(ये लेखक के अपने विचार हैं)