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Sunday 25th of August 2019
ओपिनियन

महिला उत्पीड़न से मुक्त भारत चाहिए

Thursday, August 01, 2019 11:35 AM

मुझे 2019 का ये नारा भी याद है कि मोदी है तो मुमकिन है। इसलिए मैं आप से आशा करता हूं कि आप कभी महिलाओं के दुख-दर्द पर और महिलाओं के जीवन में व्याप्त भ्रम और यथार्थ पर भी कोई बदलाव तथा परिवर्तन लाने वाला हंगामा खड़ा करें। हमारी विधायिका और कार्य पालिका तथा न्यायपालिका का भी ये इतिहास रहा है कि ये सब महिला अधिकारों के लिए आगे बढ़कर कभी कोई कदम नहीं उठाते। वर्तमान केन्द्र सरकार जिस तरह से पिछले कुछ वर्षों से केवल पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के दुख से दुबली हो रही है। काश ऐसी ही चिंता सरकार देश की सभी साधारण पीड़ित महिलाओं के लिए दिखाती तो देश की हवा ही बदल जाती। हमारा ये भी मानना है कि महिलाओं को हमें-भारत माता और धरती माता ही समझना चाहिए। क्योंकि जिस तरह पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल, प्रकाश और सूरज, चांद, सितारों की कोई जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, देश-विदेश नहीं होता। उसी तरह स्त्री की सम्पूर्ण पहचान एक सृजन और प्रकृति में ही निहित है। ऐसा नहीं है कि महिलाएं अब पहली बार संसद में बोल रही है क्योंकि महिलाएं तो हजारों साल से हर घर-आंगन और धूप-छांव में बोल रही हैं। ऐसे में महिलाओं का सम्मान और अधिकार कोई दलगत राजनीति नहीं है अपितु एक वैश्विक सच्चाई है। मुझे याद है कि विजय लक्ष्मी पण्डित कभी संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में पहली महिला अध्यक्ष थीं तो इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री थी और हमारे कई राज्यों में पहले भी और आज भी कई महिलाएं मुख्यमंत्री, सांसद और विधायक हैं। इस मामले में महिला अधिकारों को लेकर सभी राजनैतिक दलों को अपने गिरहवान में झांकना चाहिए और बताना चाहिए कि पिछले 5 हजार साल के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक इतिहास से लेकर 21वीं शताब्दी तक आज सबसे अधिक महिलाएं ही क्यों शोषित, पीड़ित और उत्पीड़ित हैं।

गंगा-यमुना, सरस्वती की त्रिवेणी में नहाते हुए उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान में ही कोई सीता, द्रोपदी, अहिल्या, सावित्री, शाहबानो तथा भंवरी बाई, निर्भया होकर भी अबला और पीड़िता क्यों है और मेरी देश की संसद और संविधान इनकी अनदेखी क्यों कर रहे हैं? अच्छा हो यदि संसद की महिला गर्जना अब सड़कों पर और हर घर-चौपाल पर भी सुनाई पड़े। महिलाओं को लेकर शहरों में जहां हलचल है वहीं लाखों गांवों में खामोशी है और महिला आयोगों तक में बेहोशी है जो हमारे तथाकथित सभ्य समाज के लिए आज एक चुनौती है। पुलिस प्रशासन की मानसिकता तो ये है कि पीड़ित महिलाओं के लिए उनके पास कोई किसी तरह का पुनर्वास केन्द्र और सामाजिक, आर्थिक ढांचा ही नहीं है। पुरुर्षों के इस हजारों साल पुराने साम्राज्य में किसी महिला की आवाज अब एक तूती की तरह है जो अपराधों के जंगल में कहीं सुनाई नहीं पड़ती। महिलाओं के मन की बात यहां कभी कोई नहीं करता। हमें बड़े दुख से कहना पड़ता है कि आज सरकार को जहां कश्मीर में धारा 370 और 35-ए की चिंता है तो असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की चिंता है तो राम मंदिर और हिन्दू गौरव की चिंता है और गोवा, कर्नाटक के बाद मध्यप्रदेश, राजस्थान और बंगाल विजय की चिंता है।

वहां उसे महिलाओं के दलित, आदिवासी और साधारण महिला वर्ग के अधिकारों की कोई चिंता नहीं है? क्या ये नए भारत का सच नहीं है कि भारत में महिला शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कुपोषण के क्षेत्र में भारी पिछड़ापन और असमानता है और महिलाओं पर अत्याचार बढ़ रहे हैं। 2019 के जनादेश में इस बार महिलाओं की उच्चतर भागीदारी रही है तो पहली बार संसद में 78 सांसद चुनी गई हैं तथा चन्द्रयान-2 तक में उनकी भागीदारी है। लेकिन क्या कारण है कि मोदी हैं तो मुमकिन है के अन्तर्गत महिलाओं की इज्जत-आबरू पर आज कोई रोने वाला नहीं है। इसलिए हम कह रहे हैं- अपनी भारत माता को अधिकार और सम्मान दो।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)