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Wednesday 16th of October 2019
ओपिनियन

जानिए, राजकाज में क्या है खास?

Monday, July 08, 2019 15:00 PM

खूब लड़ी वो तो
सूबे की ब्यूरोक्रेसी में तीन दिन से एक चर्चा जोरों पर है। चर्चा भी किसी बड़े आदमी को लेकर नहीं, बल्कि एक मातहत महिला अधिकारी को लेकर है। महिला अधिकारी ने भी गुरु की कृपा से सूरजमल की नगरी में ऐसी मर्दानगी दिखाई कि राज के दो रत्नों के चेहरों की हवाइयां उड़ गई। पावर के सपनों में खोए बेचारों को यह थोड़े ही पता था कि लाल आंखें दिखाकर लक्ष्मण रेखा लाघेंगे, तो उसका असर तो दिखाई देगा। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस से ताल्लुकात रखने वाली महिला ने  राज के मूंछ वाले रत्न के सामने जुबान चला कर मैसेज दे दिया कि भरतपुर और अजमेर में कोई फर्क नहीं हैं, लेकिन पावर का यूज करने से पहले आगा-पीछा सोचने में ही भलाई है।


असर पगफेरे का
किसी के लिए पगफेरा शुभ होता है, तो किसी की रातों की नींद हराम हो जाती है। यह तो पगफेरा वाले भाईसाहब पर निर्भर करता है। कुछ इस तरह के पगफेरे का असर इंदिरा गांधी भवन में दिखाई देता है। जब-जब मेष राशि वाले पाण्डे साहब का पग सूबे की धरती पर पड़ता है, तब-तब भूचाल आ जाता है। आदेशों की पालना में हाथ जोड़ कर खड़ा रहने वाला अदना सा कार्यकर्ता भी निर्णायक की भूमिका में दिखाई देता है। पाण्डे साहब का पग सूबे के काकड़ से बाहर पड़ता है, तो सबकुछ शांत हो जाता है, कि मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। भाईसाहब के पगफेरों से दुखी कई गांधी टोपी वालों ने टोटके तक करने शुरू कर दिए। उनके समझ में नहीं आ रहा कि भाईसाहब फीडबैक ले रहे है कि अपनों की उतरवाने में जुटे हैं।


बदले बदले से साहब
इन दिनों हाड़ौती वाले एक साहब का मूड काफी खराब है।  कुछ बदले-बदले से भी नजर आ रहे हैं। और तो और राज के खिलाफ भी बोलने से नहीं कतरा रहे। पिछले दिनों बोले मेरा मुंह मत खुलवाओ, सब गड़बड़ हो जाएगा। समय आने दो, इतना बोलूंगा कि राज के भी कान पक जाएंगे। उनके बदले स्वभाव से उनके नजदीकी लोग भी चिंतित हैं। राज का काज करने वाले भी खुसर-फुसर कर रहे हैं। कई सालों से साथ निभा रहे साथी भी सोच में डूबे हैं।  कुछेक ने तो इधर उधर से सूंघ कर कारणों का भी पता लगा लिया। उनसे हर किसी का मूड खराब होना लाजमी है। राज में दो नंबर की कुर्सी पर बैठे भाईसाहब के खास काम नहीं हो रहे। वो फाइल पर कुछ लिखकर भेजते हैं, तो सीएमओ में अटक जाती है। पंचायतों और सड़कों के विकास में जुटे अफसर भी परवाह नहीं कर रहे। सब कुछ ऊपर ही ऊपर हो रहा है।

सब पर भारी कचरा
मुफ्त दवा और पेंशन योजनाओं की आड़ में भाईसाहब की बॉडी लेंग्वेज कुछ अलग ही इशारा करती है, मगर इन सब पर शहरों का कचरा और सड़कों के खड्डे भारी पड़ रहे हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर भी चर्चा है कि और तो सबकुछ ठीक ठाक है, पर कचरे और खड्डे ने रेड मार रखी है। लोग कहने लग गए हैं कि एक हजार के चक्कर में कमर थोड़े ही तुड़वानी है।


एक जुमला यह भी
सूबे में इन दिनों गांधीजी के तीन बंदरों का जुमला खाकी वालों के बीच जोरों पर है। गुजरे जमाने में यह जुमला खादी पर सटीक बैठता था, पर अब खाकी पर फिट है। जुमला पीएचक्यू से शुÞरू होकर सचिवालय के गलियारों तक पहुंचा। लंच केबिनों में भी चटकारे लगा कर सुनाया जा रहा है। हमें भी स्टेच्यू सर्किल पर खाकी वाले साहब ने सुनाया। खाकी में इन दिनों न कोई सुनता है, न कोई देखता है और नहीं कोई बोलता है। आईओ वो करते है, जो ऊपर वालों का आदेश होता है। यानी कि वे गूंगे, बहरे और अंधे के समान है।


(यह लेखक के अपने विचार हैं)