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Tuesday 16th of July 2019
ओपिनियन

जानिए, राजकाज में क्या है खास?

Monday, July 01, 2019 15:45 PM

तरीका-ए-मैसेज
मैसेज तो मैसेज ही होता है, केवल उसे देने वालों के तरीके पर निर्भर होता है कि वह उसे कैसे दे। अब देखो ना जोधपुर वाले भाई साहब ने अपने तरीके जहां मैसेज देना था दे दिया और सफल भी हो गए। केवल एक दर्जन नवरत्नों के साथ मेवाड़, मारवाड़ और शेखावाटी में जनता के बीच जाकर कइयों की बोलती बंद कर दी। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 के साथ ही इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर भी चर्चा है कि ठाले बैठे भाई लोगों ने दिल्ली दरबार के लिए हुई जंग में हार को लेकर एक मुद्दा खड़ा करने की योजना बनाई थी, लेकिन उस पर अमल होने से पहले भाई साहब ने दिल्ली में फगफेरा कर लाल किले तक मैसेज दे दिया कि काम करने के लिए 30 रत्नों का होना जरूरी नहीं है।


निष्ठा परिवर्तन
निष्ठा तो निष्ठा ही होती है, वह कब और कहां तथा किसके प्रति बदल जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। अब देखो ना दिल्ली दरबार की जंग से पहले कई भाई लोगों ने मैडम के प्रति पूरी निष्ठा दिखाई। और तो और कई देवी- देवताओं को साक्षी मानकर मरते दम तक निष्ठा निभाने तक की सौगंध भी खाई। दिन-रात मैडम के गुणगान भी किए, मगर जीते तो निष्ठा बदलने में एक पल भी नहीं लगाया। गिरगिट की तरह रंग बदल कर मैडम से नमस्ते तक करने से परहेज करने लगे। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि 25 में से चार ने तो 23 मई को ही अलविदा कर लिया। एक ने तो गुजरात वाले भाई साहब से रिश्तेदारी की दुहाई दी, तो दूसरे ने कहीं ओर निशाना लगा दिया। तीसरे ने लाल बत्ती की चाहत में खुद का शाखाओं से पुराना रिश्ता साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चौथे ने भी बहती गंगा में हाथ धोने में ही अपनी भलाई समझी।


आगाज तूफान का
दिल्ली दरबार के चुनावों में करारी हार के बाद हाथ पार्टी के नेताओं के मुंह बंद हैं। जो मुंह खोलते हैं, उन्हें डांट-डपट मिलती हंै। नेता बदलने की बात करने वाले अपनी पूरी तैयारी में हैं, लेकिन वे समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें? उनके क्षेत्रों में भी हाथ वाली पार्टी बुरी तरह हारी है। पीसीसी चीफ की कुर्सी पर बैठे छोटे पायलट यह कह कर पहले ही आंख दिखा चुके हैं कि सत्ता के लोग बच नहीं सकते। लेकिन हम बता देते हैं कि समंदर की शांति तूफान का आगाज है।


शामत राशन वालों की
आजकल राशन वाले मंत्रीजी की चहुं ओर चर्चाएं हैं। खासतौर से उनके महकमे के अफसर तो सुबह-शाम उन्हीं के नाम की रट लगा रहे हैं। मंत्रीजी भी बड़े अजीब हैं। सुबह कार्रवाई की डांट लगाते हैं, तो शाम को सिफारिश करते हैं। अब बेचारे अफसर सुबह के आदेश मानें या फिर शाम वाले। हमारे अफसर भी स्याणे हैं, उन्होंने ने भी बीच का रास्ता निकाल लिया कि सुबह और शाम दोनों ही आदेशों को एक कान से सुनो और दूसरे से निकाल दो। पब्लिसिटी के शौकीन मंत्रीजी को अपना काम करने दो।


चर्चा चाल, चरित्र और चेहरे की
कहावत है कि ठाले बैठे लोगों का दिमाग शैतान की तरह हो जाता है। कुछ इसी तरह का आज कल इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने में हो रहा है। गुजरे पांच साल बिना काम के बैठे भाई लोगों का दिमाग चाल, चरित्र और चेहरा की चर्चा में मशगूल है। राजनीति के जरिए व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़ने वालों की उनकी तरफ से बनाई जा रही सूची भी रोजाना बढ़ती जा रही है। पच्चीस साल पहले साइकिलों से भाग दौड़ करने वाले भाई लोग अब बीस-बीस लाख की लग्जरी कारों में घूम रहे हैं। आखिर मामला चाल, चरित्र और चेहरे से जुड़ा है।


एक जुमला यह भी
इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमजा भी छोटा-मोटा नहीं है, बल्कि धरती के भगवानों से ताल्लुकात रखता है। जुमला है कि पांच-छह महीनों से धरती के भगवान अस्पताल जाने के बजाय इस्तीफा देने में ही अपनी भलाई समझते हैं। इंदिरा गांधी भवन के साथ ही सरदार पटेल मार्ग के बंगला नंबर 51 में भी खुसरफुसर है कि अस्पतालों में दवा है नहीं, जनता डॉक्टर को लाल आंखें दिखाती है, तो ऊपर से मंत्रीजी फटकार अलग से मिलती है। सो धरती के भगवान नौकरी के बजाय इस्तीफा देने में ही अपनी भलाई समझने लगे हैं।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)