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Tuesday 16th of July 2019
ओपिनियन

रेत के नाविक कप्तान साहब

Saturday, June 29, 2019 10:30 AM
दैनिक नवज्योति के संस्थापक संपादक और स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी।

कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी के जीवन पर जब एक दृष्टि डाली जाती है, तब वहां ऐसी ही ऊर्जा उद्भागित होती हुई मिलती है। एक जीवट भरा जुझारू व्यक्तित्व, कुछ करने की मन में अंतहीन लगन। अंग्र्रेजों की हुकूमत का जमाना, कुछ करना, बोलना एक सशक्त साहस। चारों ओर स्वतंत्रता संग्र्राम की तपी लहर। प्रकाशन पर कई खुफिया आंखें, कई प्रकार की बंदिशें। खोखली भाषा के चुटकी भर अखबार।

कुछ तेज तर्रार दिखाई पड़े कि उन पर आक्रमण! कुछ साफगोई के कारण जब्त, तो कुछ आर्थिक संकट व अन्य असहयोगों के कारण बंद। चौधरी साहब ठहरे, उस वक्त की पुकार में रचे बसे। देश की आजादी के लिए मन प्राण आन्दोलित। गांधी जी की विचारधारा के कट्टर समर्थक लेकिन अपनी भावना को अक्षर-अक्षर में पिरोकर पूरे प्रान्त में, देश में फैला दे, ऐसा माध्यम क्या हो! मन में सेवाभाव की अटूट लालसा। राजस्थान के लोगों में जो निराशा कुंठा है, उन पर जो वक्त के हाथों सौंपे जुल्म शोषण हैं, ऊंच-नीच के भावों तल को मानसिक कष्ट है, हार्दिक पीड़ाएं है, इन्हें कैसे दूर किया जा सके? कैसे अमानवीय कार्यों की सही-सही झलक सभी को दी जा सके? इसके लिए केवल एक ही माध्यम कारगर हो सकता है, वह है अखबार लेकिन एक ओर सामंती युग, दूसरी ओर विदेशी सत्ता, इनके बीच बैठकर निचली जातियों की पैरवी करना, अखबार में मुखौटे उतारना, कई पर्दे खोलना कोई हंसी दिल्लगी का काम तो था नहीं लेकिन-
ने सागर की उत्ताल लहरों से बटोरे नहीं हैं सीपियां और शंख
मैंने बीने हैं रेत के पांवों से गोखरू और कांटे हवाओं की गंध फूलों की रेशमी छुअन
और नदी की वर्तुल लहरें मैंने नहीं पहचानी हैं-
हारे-थकों के बीच बैठकर सदा ही मैंने दुख-दर्द हैं बांटे

मन का ऐसा ही यथार्थ उफान कभी-कभी समूचे व्यक्तित्व को ऐसे ढंक-टांप लेता है कि जीवन का प्रत्येक चरण इसी यथास्थिति को लेकर चल पड़ता है। जहां न कोई आकांक्षा होती है और न कोई व्यक्तिगत प्रलोभन। एक सतत संघर्ष होता है देश के लिए देश की स्वतंत्रता के लिए, देश की प्रगति के लिए और मानव के अधिकारों के लिए तथा मानव के प्रति न्याय के लिए। अपनापन गौण हो उठता है और दूसरों के लिए जीवन की सांसें, उत्सर्ग हो उठती हैं। बस यहीं से एक नई पहचान, एक नया जनून और एक नवीन अभियान दृष्टि का लक्ष्य बन उठता है। वह पूर्ण होगा अथवा नहीं, ख्याति धन मिलेगा या नहीं, विजय होगी या पराजय, प्रशंसा हासिल होगी अथवा आलोचना, इसकी चिंता वहां नहीं रहती... लाभ हानि की कसौटी इधर वर्जित होती है- यहां केवल उस सोच की धुन होती है, वह शिद्दत भरी लगन होती है कि कैसे भी हो, कुछ भी हो, कुछ ऐसी उपलब्धि हो, जो शोषण, गरीबी, निस्सहायता और आत्मकुंठा को दूर करके श्रम, संकल्प, आत्मविश्वास और न्यायपूर्ण व्यवस्था को जन्म दे सके, सहारा बन सके जिसके माध्यम से हम कुछ कह सकें और दूसरों की आवाज को बहुतों तक पहुंचा सकें। ऐसा करने के लिए पहले खुद की आहुति देनी होती है, एक बीड़ा उठाया जाता है, दृढ संकल्प लेकर त्याग का व्रत लिया जाता है, समस्त घेरों में उजाले की रेखाएं खींचनी होती है, जो धीरे-धीरे प्रकाशवान होकर ज्योति का निर्झर बन जाती है।
कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी के  जीवन पर जब एक दृष्टि डाली जाती है, तब वहां ऐसी ही ऊर्जा उद्भागित होती हुई मिलती है। एक जीवट भरा जुझारू व्यक्तित्व, कुछ करने की मन में अंतहीन लगन।

अंग्र्रेजों की हुकूमत का जमाना, कुछ करना, बोलना एक सशक्त साहस। चारों ओर स्वतंत्रता संग्र्राम की तपी लहर। प्रकाशन पर कई खुफिया आंखें, कई प्रकार की बंदिशें। खोखली भाषा के चुटकी भर अखबार। कुछ तेज तर्रार दिखाई पड़े कि उन पर आक्रमण! कुछ साफगोई के कारण जब्त, तो कुछ आर्थिक संकट व अन्य असहयोगों के कारण बंद। चौधरी साहब ठहरे, उस वक्त की पुकार में रचे बसे। देश की आजादी के लिए मन प्राण आन्दोलित। गांधी जी की विचारधारा के कट्टर समर्थक लेकिन अपनी भावना को अक्षर-अक्षर में पिरोकर पूरे प्रान्त में, देश में फैला दे, ऐसा माध्यम क्या हो! मन में सेवाभाव की अटूट लालसा। राजस्थान के लोगों में जो निराशा कुंठा है, उन पर जो वक्त के हाथों सौंपे जुल्म शोषण हैं, ऊंच-नीच के भावों तल को मानसिक कष्ट है, हार्दिक पीड़ाएं है, इन्हें कैसे दूर किया जा सके? कैसे अमानवीय कार्यों की सही-सही झलक सभी को दी जा सके? इसके लिए केवल एक ही माध्यम कारगर हो सकता है, वह है अखबार लेकिन एक ओर सामंती युग, दूसरी ओर विदेशी सत्ता, इनके बीच बैठकर निचली जातियों की पैरवी करना, अखबार में मुखौटे उतारना, कई पर्दे खोलना कोई हंसी दिल्लगी का काम तो था नहीं लेकिन-
जो ठान लेते हैं शिखर पर ध्वज फहराना
ठान लेते जो हवा का रुख पलटना उठ, खड़े होते स्वयं जो प्रश्रय बनकर, आम जंगल छीन उनको रोक पाती।

और अखबार चौधरी जी के मन का सपना, जो केवल बुदबुदाता रहता था। साकार बनकर 1936 में सामने आया नवज्योति अखबार के रूप में। शायद पहला गर्वीला हठी अखबार, जो निर्भय होकर उन सभी के अत्याचारों को अन्याय को ललकार उठा, जो मजदूरों, किसानों, हरिजनों, आदिवासियों और गरीबों के साथ पशुवत व्यवहार करते थे। जिनकी न कहीं सुनवाई थी न कहीं सुरक्षित शरण और न कहीं मानवीय संवेदना। विद्रोह था गरीबों के लिए, उग्र्र स्वर थे देश की आजादी के लिए चाहे सामंतवादी लपेट में आएं, परिणाम जो होने थे हुए परन्तु अखबार चलता रहा। जन सेवा और गांधीवादी द्वारा बताए गए कार्य भी चलते रहे। कांग्र्रेस आंदोलन, किसान आंदोलन, हरिजन आंदोलन, आजादी का आंदोलन ‘नवज्योति’ इसका अगुआ बना। ब्रिटिश सरकार थक गई, सामन्ती भृकुटियां तनी रह गईं। लेकिन ‘नवज्योति’ की एक भी किरण को धूमिल नहीं कर पाई।

कप्तान साहब का यह भी सौभाग्य रहा कि परिवार की ओर से उन्हें बहुत प्रेरणा मिली और मिला बेहद सहयोग अन्यथा वे इतनी ज्वलंत चुनौतियों का सामना भला कैसे कर सकते थे? आज जो ‘नवज्योति’ के भव्य कलेवर को देखते हैं वहां कैसे कल्पना हो सकती है कि इसके पीछे कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी जी की अखण्ड तपस्या की सुगंध है। उनकी धर्म पत्नी श्रीमती विमला देवी चौधरी के संयमयुक्त त्याग से भी उन्हें बेहद आत्मिक शक्ति मिली। केसरगंज अजमेर के दफ्तर में कार्यभार संभालने वाले श्री दीनबंधु चौधरी का भी कम सहयोग नहीं रहा। एक बातचीत में दीनबंधु जी ने बताया कि कॉलेज जीवन से ही वे इस अखबार की प्रबंध व्यवस्था से जुड़ गए थे और पढ़ाई पूरी करते करते तो एकदम ही ‘नवज्योति’ का कार्यभार उनके कंधों पर आ गया था। एक ओर पिता का संघर्षशील जीवन, दूसरी ओर पत्नी का त्याग और परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त रखना, तीसरी ओर युवा का तन मन से पूर्ण सहयोग और हर कार्यभार का उत्तरदायित्व संभाल लेना आदि भी कप्तान साहब के लिए बहुत बड़े शुभ मांगलिक वरदान सदृश्य रहे। साथ ही पिता, बड़े भाई से सहृदय प्यार और सद्भावना प्राप्त करके ‘नवज्योति’ से जुड़ा एक-एक व्यक्ति इस अखबार के प्रति पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ काम कर रहा था। आज भी कर रहा है। आज ‘नवज्योति’ वटवृक्ष बना चौधरी साहब को कितनी आत्मिक शांति दे रहा होगा इसके लिए उन्हें कैसे-कैसे कठिन दिन याद आते होंगे यह कल्पनातीत है। वे आज भी कार्यरत रहते हैं जैसे नवज्योति ही उनकी प्राणवायु है यही जैसे उनके जीवन संकल्प की ज्योति है।

- सावित्री परमार
(यह आलेख कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी अभिनंदन ग्रंथ से लिया गया है।)