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Tuesday 16th of July 2019
ओपिनियन

तीन तलाक पर तकरार

Friday, June 28, 2019 10:30 AM

दुनिया के कई दूसरे देशों में तलाक पर बैन है या कानून में बदलाव किया गया है। मिस्र पहला ऐसा देश है जिसने वर्ष 1929 में अपने यहां तलाक पद्धति में बदलाव किया। श्रीलंका एक मुस्लिम बहुल देश नहीं है लेकिन मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि यहां कानून सबसे अच्छा है। श्रीलंका के नियम के अनुसार यदि कोई मुसलमान अपनी पत्नी को तलाक देना चाहता है तो वह मुस्लिम जज कादी को नोटिस देगा। पिछले दिनों तीन तलाक पर प्रतिबंध के लिए केंद्रीय कानून मंत्री ने हंगामे के बीच नया विधेयक लोकसभा में पेश किया। विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया। दरअसल पिछले साल दिसंबर में लोकसभा में यह बिल पास हुआ था और राज्यसभा में लंबित था। इस बीच लोकसभा भंग हो गई, तो बिल भी खत्म हो गया। लिहाजा नए सिरे से इस बिल को लाया गया। इस बाबत मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को मनाने की कवायद बेकार साबित हुई थी। दरअसल, इस विधेयक के प्रावधानों में विपक्ष संशोधन चाहता था, जिसके राजनीतिक निहितार्थ भी थे और आसन्न आम चुनाव के समीकरण भी थे। सत्ता पक्ष जहां बहुसंख्यक वोटों को लक्षित कर रहा था, वहीं विपक्षी दल अपने-अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को संबोधित कर रहे थे। इस बाबत जब राजग सरकार अध्यादेश लेकर आई तो निशाने पर कांग्रेस भी थी। भाजपा की दलील थी कि संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के बावजूद कांग्रेस ने सात दशक तक मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने की ईमानदार कोशिश नहीं की वहीं कांग्रेस बहुसंख्यक मतों के ध्रुवीकरण के लिए मुद्दे को भुनाने का आरोप लगाती रही है। भाजपा का आरोप रहा है कि तमाम मुस्लिम देशों में तीन तलाक को गैर कानूनी बनाया गया है और धर्म निरपेक्ष भारत में यह प्रथा बदस्तूर जारी है। वे इसे राजनीतिक दलों द्वारा अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के तौर पर देखते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के ‘असंवैधानिक’ करार देने के बावजूद तीन तलाक के 229 मामले सामने आए हैं। केंद्र सरकार के अध्यादेश पारित करने के बाद भी 31 ‘तलाक’ दिए जा चुके हैं। यानी तीन तलाक कहने या लिखने वालों को न तो शीर्ष अदालत और न ही सरकार का खौफ है। इस लिहाज से देखें, तो संसद द्वारा नया कानून बनाने के बावजूद कुछ बेहतर हालात की उम्मीद करना फिजूल है। फिर भी कानूनी और संवैधानिक बेडियां तो होनी चाहिए, लेकिन इस मुद्दे पर संसद और राजनीतिक दल अब भी पूरी तरह विभाजित हैं। जो स्थितियां और समीकरण दिसंबर  2018 में थे, आज भी वैसे ही हैं। कांग्रेस समेत विपक्ष का विरोध तो स्वाभाविक है, लेकिन सत्तारूढ़ एनडीए के सहयोगी जनता दल-यू और अन्नाद्रमुक भी बिल का विरोध क्यों कर रहे हैं? राज्यसभा में इन दलों के क्रमश: 6 और 13 सांसद हैं। यह विरोध वैचारिक नहीं है, क्योंकि हमारी राजनीति विचार पर केंद्रित नहीं है। दरअसल यह वोट बैंक की नाराजगी की चिंता है। यदि बीजद और वाईएसआर कांग्रेस भी प्रस्तावित बिल के खिलाफ  हैं, तो मुसलमानों की नाराजगी और उनके अलग छिटकने का अंदेशा है, लेकिन मुस्लिम वोट बैंक में औरतें भी तो शामिल हैं, जिनमें लाखों ऐसी हैं, जो ‘तीन तलाक’ से पीड़ित और बेघर हैं। यदि वे नाराज होकर कहीं और धु्रवीकृत हो जाएंगी, तो मुस्लिमवादी दलों का ही नुकसान होगा।

अब सवाल यह है कि संसद में यह बिल पारित कैसे होगा? मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल के दौरान लोकसभा में बिल आसानी से पारित करा लिया था। इस बार जनादेश और भी विराट और व्यापक है, लिहाजा लोकसभा में कोई दिक्कत नहीं है। उच्च सदन राज्यसभा में समीकरण बदल रहे हैं, लेकिन सत्ता पक्ष अब भी अल्पमत में है। उसके अपने घटक दल ही खिलाफ हैं। वे बिल के विरोध में वोट करेंगे या सदन से गैर-हाजिर हो जाएंगे, फिलहाल यह निश्चित नहीं है। सरकार ने कोई रणनीति तो सोची होगी, लेकिन फिर भी सवाल है कि क्या इस बार भी ‘तीन तलाक’ बिल की नियति और परिणति पहले जैसी ही होगी? क्या यह बिल लटक कर रह जाएगा और फिर अध्यादेश जारी करना पड़ेगा? गौरतलब यह है कि तलाक दिए बिना ही मुस्लिम औरतों को घर से बाहर खदेड़ने के कई मामले सामने आए हैं। यदि तलाक भी होता है, तो मुस्लिम पत्नी के हाथ खाली ही रहते हैं। बिल में ऐसा प्रावधान क्यों न जोड़ा जाए कि तलाक के वक्त सात या दस दिनों के अंतराल में पति एक-तिहाई संपत्ति तलाकशुदा महिला के नाम करे। मौजूदा बिल में यह प्रावधान नहीं किया गया है। यदि संसद के दोनों सदनों में बिल के पारित होने के समीकरण बनते हैं, तो यह प्रावधान संशोधन के साथ जोड़ा जा सकता है। उससे मुस्लिम महिला का ज्यादा सशक्तिकरण होगा। दुनिया के कई दूसरे देशों में तलाक पर बैन है या कानून में बदलाव किया गया है। मिस्र पहला ऐसा देश है जिसने वर्ष 1929 में अपने यहां तलाक पद्धति में बदलाव किया। श्रीलंका एक मुस्लिम बहुल देश नहीं है लेकिन मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि यहां कानून सबसे अच्छा है। श्रीलंका के नियम के मुताबिक यदि कोई मुसलमान अपनी पत्नी को तलाक देना चाहता है तो वह मुस्लिम जज कादी को नोटिस देगा। फिर जज, दोनों परिवारों के सदस्य, बड़े-बुजुर्ग तथा अन्य प्रभावशाली मुसलमान दोनों को समझाने का प्रयास करेंगे। नोटिस के 30 दिन के बाद पति अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। तलाक मुस्लिम जज और दो गवाहों की उपस्थिति में होगा। पाकिस्तान में तीन तलाक को समाप्त करने के लिए एक कमेटी की सिफारिशों के आधार पर नियम बनाए गए। इराक में एक बार में तीन तलाक बोलने पर एक ही तलाक माना जाता है। पति और पत्नी दोनों को ही तलाक लेने का हक है। अदालत पति और पत्नी के बीच झगड़े के वजह की जांच कर सकता है। अदालत दोनों के बीच सुलह के लिए दो लोगों की नियुक्ति कर सकता है।

- संतोष कुमार भार्गव
(ये लेखक के अपने विचार हैं)