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Tuesday 16th of July 2019
ओपिनियन

एक साथ चुनाव आसान नहीं

Wednesday, June 26, 2019 11:20 AM

भारत में लोकसभा के साथ विधानसभाओं के चुनाव पहले कई बार हो चुके हैं। 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में राज्य विधानसभा चुनावों का आयोजन लोकसभा चुनाव के साथ ही हुआ था। दुनिया के कई और देशों में भी एक साथ चुनाव का आयोजन किया जाता है। इसी साल इंडोनेशिया में राष्ट्रपति चुनावों के साथ ही लोकसभा चुनाव का भी आयोजन किया गया। दरअसल हम इस निष्कर्ष पर एकदम नहीं पहुंचना चाहते कि केंद्र और सभी 29 राज्यों, संघ शासित क्षेत्रों में चुनाव एक साथ ही कराए जाएं। मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श का है। उसकी शुरुआत हुई है, तो सभी दलों को अपना विचार रखने के लिए उसमें शिरकत करनी चाहिए। यदि किसी ने ऐसी बैठक का विरोध और बहिष्कार किया है, तो वह इस विमर्श का ‘दुश्मन’ करार दिया जाना चाहिए। वे दल अपने राष्ट्रीय दायित्व से भाग रहे हैं। सवाल पूछना चाहिए कि कांग्रेस के राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, बसपा की मायावती, सपा के अखिलेश यादव, तेलुगू देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू, द्रमुक के स्टालिन और ‘आप’ के अरविंद केजरीवाल ने बैठक का बहिष्कार क्यों किया? लोकसभा की 543 सीटों पर चुनाव के लिए औसतन 38,018 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं। 2019 के चुनाव में करीब 20 लाख सुरक्षा बल जवानों को ड्यूटी पर तैनात रहना पड़ा। अनुमान यह भी है कि चुनाव खर्च में 1998 की  तुलना में 6-7 गुना बढ़ोतरी हुई है। यदि ये तमाम जानकारियां विपक्ष ‘श्वेत पत्र’ के जरिए प्राप्त करना चाहता है, तो बैठक में इस पक्ष को रखा जाना चाहिए था। बहिष्कार विपक्ष की कोई सकारात्मक राजनीति नहीं है। बेशक इतने खर्च को ‘एक साथ चुनाव’ का मानदंड न माना जाए, लेकिन इसे एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन और बड़े चुनाव सुधार के तौर पर ग्रहण किया जा सकता है। अभी से यह कुतर्क नहीं पचता कि ‘एक साथ चुनाव’ से भाजपा को फायदा होगा। संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा और क्षेत्रीय दलों का सूपड़ा साफ हो सकता है, क्योंकि ‘एक साथ चुनाव’ किसी नेता की लहर और राष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित हो सकते हैं।

विमर्श के दौरान इन आशंकाओं को भी संबोधित किया जा सकता है। दिलचस्प यह रहा कि इस मुद्दे की शुरुआती बहस में ही कांग्रेस बंटी हुई दिखाई दी। मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा ने ‘एक साथ चुनाव’ का समर्थन किया है। देश के राष्ट्रपति रहे और कांग्रेस का बौद्धिक चेहरा प्रणब मुखर्जी भी ‘एक साथ चुनाव’ के पक्षधर थे। बेशक इस नई व्यवस्था में भी कुछ छिद्र हो सकते हैं। यह अव्यवहारिक भी साबित हो सकती है। इसका क्रियान्वयन सवालिया हो सकता है, लेकिन उन बिंदुओं पर बहस की जानी चाहिए। सरकार ने जो समिति गठित करने की बात कही है, कमोबेश उसके मंच पर अपने संशय पेश किए जाने चाहिए। बहिष्कार तो बंजर होता है, यदि उसके बावजूद कोई मुद्दा लागू हो जाता है, तो फिर क्या करेंगे? इसके अतिरिक्त चुनावी ड्यूटी पर सरकारी अधिकारी अन्य राज्यों में जाते हैं, जिससे वहां का प्रशासनिक कार्य बाधित होता है। सुरक्षा बलों की तैनाती व चुनाव आयोग के खर्च अलग से हैं। सुरक्षा बलों की चुनावी ड्यूटी के चलते उनकी संवेदनशील इलाकों में तैनाती प्रभावित होती है। इसके बावजूद व्यवस्था में बड़े बदलावों की राह इतनी भी आसान नहीं है। मगर समाधान तभी निकलेगा, जब राजनीतिक दल मुद्दे से कतराने के बजाए गंभीर पहल करेंगे।

एक देश एक चुनाव के मुद्दे पर पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों के अध्यक्षों के साथ मीटिंग बुलाई थी। 21 राजनीतिक दलों ने प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित इस विमर्श में प्रतिभाग किया था। एक साथ चुनाव के पक्ष में तर्क है कि यह धन, समय और ऊर्जा की बचत के लिहाज से अच्छा कदम है। कुछ ऐसे दल हैं जो इसके खिलाफ  हैं और उनका कहना है कि यह प्रक्रिया संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। हालांकि करीब ढाई दशक पूर्व भाजपा के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इस विमर्श का सूत्रपात किया था, लेकिन आज यह ज्वलंत मुद्दा बन चुका है, क्योंकि चुनाव बेहद महंगे होते जा रहे हैं। विश्व में स्वीडन, इंडोनेशिया, साउथ अफ्रीका, जर्मनी, स्पेन, हंगरी, पोलैंड, बेल्जियम, स्लोवेनिया और अल्बानिया आदि देशों में ‘एक साथ चुनाव’ की प्रक्रिया ही लागू है। ये पिछड़े और अलोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं है। भारत जैसा संघीय और विविधता वाला देश औसतन चुनावी मुद्रा में ही रहता है। आर्थिक बोझ के अलावा, सुरक्षा बलों की बढ़ती तैनाती और शिक्षक आदि सरकारी कर्मचारियों की चुनाव ड्यूटी उन्हें अपने बुनियादी दायित्वों से दूर रखती है। चुनाव के कारण आचार संहिता लगती है और उससे नीतिगत, प्रशासनिक फैसलों पर गतिरोध लगा रहता है। अंतत: देश का आम नागरिक ही प्रभावित होता है। आम तौर पर भारतीय चुनावों के बारे में एक बात कही जाती है कि चुनाव खर्च बहुत अधिक है। 2014 के लोकसभा चुनावों के आयोजन में कुल 3,426 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। हालांकि, स्पष्ट तौर पर हर खर्चे को जोड़ लिया जाए तो यह आंकड़ा करीब 35,000 करोड़ है।

हालिया लोकसभा चुनाव में 6500 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। यह ज्यादा भी हो सकता है। एक और अध्ययन सामने आया है कि 29 राज्यों और दो संघ शासित क्षेत्रों की 4033 विधानसभा सीटों पर चुनाव के लिए औसतन 40,033 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। एक साथ चुनाव कराने से पैसों की बचत होगी और चुनाव प्रचार और तैयारियों में होने वाले खर्च में भी कमी आएगी। एक तर्क यह भी दिया जाता है कि एक साथ चुनाव का फायदा होगा कि सरकारें विकास कार्यों पर अधिक से अधिक ध्यान लगा सकेगी और बार-बार होने वाले चुनावों पर ध्यान नहीं देना होगा। भारत में लोकसभा के साथ विधानसभाओं के चुनाव पहले कई बार हो चुके हैं। 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में राज्य विधानसभा चुनावों का आयोजन लोकसभा चुनाव के साथ ही हुआ था। दुनिया के कई और देशों में भी एक साथ चुनाव का आयोजन किया जाता है। इसी साल इंडोनेशिया में राष्ट्रपति चुनावों के साथ ही लोकसभा चुनाव का भी आयोजन किया गया। दरअसल हम इस निष्कर्ष पर एकदम नहीं पहुंचना चाहते कि केंद्र और सभी 29 राज्यों, संघ शासित क्षेत्रों में चुनाव एक साथ ही कराए जाएं। मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श का है। उसकी शुरुआत हुई है, तो सभी दलों को अपना विचार रखने के लिए उसमें शिरकत करनी चाहिए। यदि किसी ने ऐसी बैठक का विरोध और बहिष्कार किया है, तो वह इस विमर्श का ‘दुश्मन’ करार दिया जाना चाहिए। वे दल अपने राष्टÑीय दायित्व से भाग रहे हैं। सवाल पूछना चाहिए कि कांग्रेस के राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, बसपा की मायावती, सपा के अखिलेश यादव, तेलुगू देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू, द्रमुक के स्टालिन और ‘आप’ के अरविंद केजरीवाल ने बैठक का बहिष्कार क्यों किया? लोकसभा की 543 सीटों पर चुनाव के लिए औसतन 38,018 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं। 2019 के चुनाव में करीब 20 लाख सुरक्षा बल जवानों को ड्यूटी पर तैनात रहना पड़ा। अनुमान यह भी है कि चुनाव खर्च में 1998 की  तुलना में 6-7 गुना बढ़ोतरी हुई है। यदि ये तमाम जानकारियां विपक्ष ‘श्वेत पत्र’ के जरिए प्राप्त करना चाहता है, तो बैठक में इस पक्ष को रखा जाना चाहिए था।

बहिष्कार विपक्ष की कोई सकारात्मक राजनीति नहीं है। बेशक इतने खर्च को ‘एक साथ चुनाव’ का मानदंड न माना जाए, लेकिन इसे एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन और बड़े चुनाव सुधार के तौर पर ग्रहण किया जा सकता है। अभी से यह कुतर्क नहीं पचता कि ‘एक साथ चुनाव’ से भाजपा को फायदा होगा। संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा और क्षेत्रीय दलों का सूपड़ा साफ हो सकता है, क्योंकि ‘एक साथ चुनाव’ किसी नेता की लहर और राष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित हो सकते हैं। विमर्श के दौरान इन आशंकाओं को भी संबोधित किया जा सकता है। दिलचस्प यह रहा कि इस मुद्दे की शुरुआती बहस में ही कांग्रेस बंटी हुई दिखाई दी। मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा ने ‘एक साथ चुनाव’ का समर्थन किया है।

देश के राष्ट्रपति रहे और कांग्रेस का बौद्धिक चेहरा प्रणब मुखर्जी भी ‘एक साथ चुनाव’ के पक्षधर थे। बेशक इस नई व्यवस्था में भी कुछ छिद्र हो सकते हैं। यह अव्यवहारिक भी साबित हो सकती है। इसका क्रियान्वयन सवालिया हो सकता है, लेकिन उन बिंदुओं पर बहस की जानी चाहिए। सरकार ने जो समिति गठित करने की बात कही है, कमोबेश उसके मंच पर अपने संशय पेश किए जाने चाहिए। बहिष्कार तो बंजर होता है, यदि उसके बावजूद कोई मुद्दा लागू हो जाता है, तो फिर क्या करेंगे? इसके अतिरिक्त चुनावी ड्यूटी पर सरकारी अधिकारी अन्य राज्यों में जाते हैं, जिससे वहां का प्रशासनिक कार्य बाधित होता है। सुरक्षा बलों की तैनाती व चुनाव आयोग के खर्च अलग से हैं।                  

- डॉ. श्रीनाथ सहाय
(ये लेखक के अपने विचार हैं)