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Monday 22nd of April 2019
ओपिनियन

बिना ‘बुलाक’ का बुलाकी!

Monday, April 15, 2019 12:55 PM

आज बिना ‘बुलाक’ धारी बुलाकी की बात करते हैं। जो बीकानेर का वासी है। पिछले कुछ दिनों से राजधानी जयपुर की सड़कों पर उसके सड़कों के किनारे लगे बडे-बड़े पोस्टरों में फोटो साया हुए थे। तो यार दोस्तों ने टोका-‘भाईजी क्या जयपुर से चुनाव लड़ने जा रहे हो। थे तो लेखक ही बण्यां, लिखता ही चौखा लागौ, नेता मत बणजौ’। ये हैं राजस्थानी और हिंदी के ख्याति प्राप्त साहित्यकार-बुलाकी शर्मा। चार दशक से निरंतर सृजन कार्य में लीन। कहानी, व्यंग्य, बाल-साहित्य में पूरी पैठ। ये दुखी इस बात से हैं कि मायड़ भाषा-राजस्थानी में नियमित व्यंग्य नहीं लिख पा रहे, हकीकत बयां की, प्रदेश में कोई राजस्थानी भाषा का दैनिक अखबार नहीं निकलता है।

अंगुली पर गिनी जाने वाली दो-तीन पत्रिकाएं ही हैं। जयपुर आकर बोले-आज मायड़-भाषा की हर विधा में बहुत कुछ अच्छा और खूब लिखा जा रहा है। विषय-वस्तु हो या शिल्प की दृष्टि से, नए-नए विषयों को छुआ जा रहा है, लेकिन आलोचना का काम काफी कम हो पा रहा है। इसके अभाव से, हम कहां खड़े हैं, हमें आगे क्या करना है, इसका सही आंकलन नहीं हो पा रहा। लेखक हो या कलाकार, यदि स्वतंत्र है, तो वह बिना कोई दबाव के अच्छा लेखन या काम कर सकता है। इसलिए इन्होंने अच्छी खासी सरकारी नौकरी से वीआरएस ले लिया।

बताया-अब फुरसत ही फुरसत है, इसके लिए निरंतर लेखन जरूरी है। पुरस्कार पाने के इरादे को सामने रखकर लेखन नहीं होना चाहिए और ना ही पुरस्कृत होने के बाद लेखन धीमा या बंद कर दिया जाए। राजस्थानी भाषा की मान्यता के सवाल पर बोले- इसकी मांग अब तक साहित्यकार ही करते आए हैं, लेकिन जब तक आम जनमानस इसकी मान्यता के लिए आंदोलित नहीं होगा, तब तक यह संभव नहीं है।

यह सही है, चिंता भी है, आज के युवा वर्ग की साहित्य से दूरी बढ़ती जा रही है। इसका मुख्य कारण है, मायड़-भाषा के प्रति राग का कम होना। उसे हिंदी और अंग्रेजी में लिखने से तो आय हो जाती है, लेकिन राजस्थानी में नहीं होती। यह भी स्वीकारा-राजस्थानी भाषा में व्यंग्य कम लिखा जा रहा है। मन की बात बताई जब मैं अपना कॉलम-छद्म नाम से लिखता था, तब तक खूब तारीफ हुई, लेकिन असल नाम से लिखना शुरू किया, तो खिंचाई ज्यादा हुई। राजस्थानी-भाषा के हरिशंकर परसाई से तुलना करने पर बोले-मैं उनका कहां मुकाबला कर सकता हूं।

हां, कुछ अच्छा और बढ़िया लिखने की कोशिश जरूर करता हूं। परसाई बनने के लिए आज कोई भी व्यंग्यकार अपनी टांग-तुड़वाई को तैयार नहीं है। परसाईजी के व्यंग्य पर तो उनकी टांगें तोड़ी गई थीं, लेकिन उन्होंने विचारधारा का विरोध लेखन में जारी रखा। डायरी विधा के लेखन पर बोले-लिखाड़ दो तरह से लिखते हैं-एक ईमानदारी और सच्चाई के साथ खरी-खरी, जिसे वे प्रकाशित नहीं कराते। प्रकाशित कराने की अलग होती है। जो उन्होंने अपनी लिखी पढ़कर बताई। मुझे देखो, मेरा नाम बुलाकी है, कृष्ण की तरह नाक में बुलाक भी नहीं पहनता हूं।

उस पंडित को कोसा जिसने बुलाकी नाम रखा, इस नाम में मादापन की झलक ज्यादा है। कोई मेरे नाम से पहले ‘सुश्री’ और ‘कुमारी’ लिखकर पत्र भेजता है, पीड़ा सदैव इसकी रहती है। नाम मेरा उतना फेमस नहीं हुआ, जितना राजनीतिज्ञ बुलाकी दास कल्ला का हुआ। डायरी और व्यंग्य की खासियत यह है कि इनके माध्यम से ‘बायड़’ जरूर निकल जाती है।

हां, मैं साहित्यिक गोष्ठियों में प्रमुख वक्ताओं के रूप में भाषण और सम्मानित होकर आता हूं लेकिन मेरे लंगोटिए यार अब भी मेरी लंगोटी खींचने में कोई गुरेज नहीं करते। साहित्यकारों पर लिखे व्यंग्य की सजा भी भुगती, पुरस्कारों से वंचित कर दिया गया। बाल-साहित्य लिखने के लिए बालक बनकर लिखना पड़ता है।