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ओपिनियन

चुनाव के केन्द्र में सिर्फ मोदी

Monday, May 13, 2019 10:10 AM

1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की करारी हार हुई। उन्हें उनके प्रतिद्वंदि राजनारायण ने 55 हजार मतों से पराजित किया था। यह हार इंदिरा गांधी की ही नहीं, बल्कि कांग्र्रेस की भी बड़ी हार थी। क्योंकि, आजादी के बाद कांग्र्रेस की यह पहली अविश्वसनीय हार थी। यह वही दौर था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया था और अपना पद तथा प्रतिष्ठा बचाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए थे। यहां तक कि इंदिरा गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान 40000 किलोमीटर घूमकर ताबड़तोड़ रैलियां कीं और 244 चुनावी सभाओं को संबोधित किया। फिर भी जनता पार्टी और कांग्र्रेस फॉर डेमोक्रेसी गठबंधन की जीत हुई।

तब इस गठबंधन को कुल 295 सीटें मिली थीं और कांग्र्रेस 153 सीटों पर सिमट गई थी। उस समय तक देश में इंदिरा गांधी की तरह किसी प्रधानमंत्री को इतनी बेरुखी का सामना नहीं करना पड़ा था। यहां खास बात यह थी कि यह हार तब हुई, जब प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर सिर्फ और सिर्फ इंदिरा ही थीं। यानी यह चुनाव इंदिरा बनाम इंदिरा हो चुका था। हर तरफ यही चर्चा थी कि प्रधानमंत्री तो इंदिरा गांधी ही बेहतर है। उनके अलावा कोई है ही कहां इस पद के लायक... आदि-आदि। लेकिन, इंदिरा गांधी को न केवल अपनी हार का अंदाजा हो गया था, बल्कि उन्हें डर भी सताने लगा था।

...और शायद यही डर कहीं न कहीं तरह-तरह के हथकंडे अपनाने पर उन्हें मजबूर करता रहा होगा। खैर, इसके पीछे की कहानी बहुत लंबी है। फिलहाल हम वर्तमान की बात करते हैं। इन दिनों पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रूप से चर्चा में है। लोग भाजपा सरकार के कार्यों का नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के कार्यों का सही अथवा गलत मायने में आकलन करते दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ताबड़तोड़ रैलियां और सभाएं कर रहे हैं। गठबंधन अपनी ओर से पूरी कोशिश में है कि किसी तरह मोदी को हराया जाए। भाजपा की हार को वे अब मोदी की हार में ही देख रहे हैं।

इधर, भाजपा के पास भी एक ही विकल्प है, एक ही चेहरा है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का। वहीं, पिछली बार की तरह इस बार मोदी के पास भी कोई विजन नहीं है। यही कारण है कि इस बार वे जनता को देश की सुरक्षा की दुहाई दे रहे हैं। खुद की जान को खतरा बता रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक पर सीना फुला रही है और विपक्ष को कोस रहे हैं। यानी उनके पास पिछली बार की तरह कालाधन, गरीबी, विकास जैसे मुद्दे नहीं है। यह इतिहास का दोहराव भी हो सकता है। यह मैंने इसलिए कहा, क्योंकि अगर हम चुनाव के इस परिदृश्य को ध्यान से देखें, तो पाएंगे कि उन प्रवृत्तियों को पकड़ने की कोशिश हो रही है, जो परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं।

वहीं, न केवल भाजपा ने, बल्कि विपक्षी दलों ने भी इस लोकसभा चुनाव को सिर्फ और सिर्फ मोदी-केन्द्रीत बना दिया है। यानी या तो लोग मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर दोबारा देखना चाहते हैं या फिर नहीं। स्थिति यह हो चुकी है कि यह आम चुनाव जीत बनाम हार दोनों ही स्थितियों में मोदी बनाम मोदी हो चुका है। प्रधानमंत्री मोदी अपनी जीत के लिए नए-नए फिल्म और क्रिकेट जगत के सितारों का सहारा भी ले रहे हैं। इस बात से एक घटना अनायास याद आती है। 1975 में राजनारायण की दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली होनी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह अहसास हो गया था कि रैली में विशाल जनसमूह उमड़ने वाला है।

उन्होंने इस जनसमूह को रोकने के लिए उस समय की सुपरहिट फिल्म बॉबी चलवा दी। पर, इसका लोगों पर कोई असर नहीं हुआ। फिर आपातकाल भी लगा। खैर, यह तो इतिहास की बात थी। मगर, यहां हम बात कर रहे हैं मोदी बनाम मोदी चुनाव की। यानी मोदी हां, मोदी न। जनता इस तलाश में भी है कि उसे ऐसा चेहरा चाहिए, जो उसका कल्याण कर सके। वैसे यह तलाश आज की नहीं है, सदियों की है। लेकिन,इस कल्याण की तलाश में वह विकास, रोजगार और सुरक्षा तीन बहुमूल्य गारंटियां चाहती है, जो उसे आज तक वादों में तो मिलीं, पर हकीकत में छलावा ही हुआ। इस सब पर काम आसान थोड़े ही है। पांच साल में क्या होता है? पांच और दो।

इस बात को कहीं न कहीं प्रधानमंत्री और उनके समर्थक जनता को समझाना चाहते हैं। लेकिन, इस बीच न तो प्रधानमंत्री कटु बयानबाजी करने से चूक रहे हैं और न ही उनके उम्मीदवार। इसका असर भी काफी विपरीत पड़ रहा है। गठबंधन इसका फायदा उठाने की कोशिश में है। वहीं, कांग्र्रेस इस सबका फायदा अपनी झोली में देख रही है। दरअसल 2014 की मोदी लहर ने कांग्र्रेस के गढ़ माने जाने वाले संसदीय क्षेत्र यानी अमेठी और रायबरेली तक में कांग्र्रेस का जनाधार काफी कमजोर कर दिया था। यही कारण है कि कांग्र्रेस को इंदिरा गांधी की तरह प्रियंका को आकर्षण का केन्द्र बनाना पड़ा। लेकिन, प्रियंका का राजनीति में इंदिरा की तरह कोई दखल नहीं रहा है

और न ही उतनी दिलचस्पी है। शायद इसीलिए राहुल को अब भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ रही है, जितनी वे अकेले कर सकते थे। इधर, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और अन्य छोटे दलों का गठबंधन से मोदी विरोधी माहौल भी बना, लेकिन यहां भी दो ऐसी स्थितियां बनीं कि इस चुनाव में जीत का रुख स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। पहली स्थिति यह कि किसानों को मोदी सरकार ने चुनाव के दौरान अचानक दो-दो हजार रुपये शुरू कर दिए। यह पैसे कितने किसानों को मिले, किस शर्त पर मिले, कितने दलालों के दांतों से बच निकलकर मिले? यह तो नहीं कहा जा सकता है।

लेकिन,इस योजना से पांच साल के प्यासों के गले में घूंट भर पानी जरूर उतरा लगता है या जिन्हें नहीं मिला, उन्हें आशा है कि उनके सूखते गले को थोड़ी राहत जरूर मिलेगी। दूसरा गठबंधन में अन्तर्विरोध की स्थिति है। यह अन्तर्विरोध कुछ प्रत्याशियों को टिकट से वंचित करने के साझा समझौते के कारण पैदा हुआ है। लेकिन, करते भी क्या?