Dainik Navajyoti Logo
Saturday 17th of August 2019
ओपिनियन

यूपी ही तय करेगा देश का भविष्य

Saturday, May 11, 2019 09:45 AM
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (फाइल फाेटो)

देश की राजनीति में यूपी की महत्ता किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में सबकी निगाह यूपी में आखिरी दो चरणों के चुनाव पर है। यहां भाजपा गठबंधन और कांग्रेस के बीच आखिरी चरण में छिड़ी जुबानी जंग से उत्साहित है। पार्टी का मानना है कि अगर गठबंधन और कांग्रेस के उम्मीदवार एक दूसरे का वोट काटते हैं तो पूर्वांचल में भाजपा की पुरानी ताकत न सिर्फ बनी रहेगी, बल्कि कई सीटों पर उनका मत प्रतिशत बढ़ सकता है। हालांकि जमीनी स्तर पर बन रहे समीकरण उम्मीदवारों की जाति व निजी शख्सियत तस्वीर बदलने में समर्थ है।

नतीजे अप्रत्याशित होने की आशंका सभी दलों को है।  दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। पीएम मोदी एक बार फिर से सरकार बनाने को बेताब दिखाई दे रहे हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी सियासी किस्मत को मजबूत करने और पार्टी की साख बचाने में जुटे हुए हैं। मोदी के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का है तो वहीं राहुल गांधी के लिए ये लोकसभा चुनाव करो या मरो की स्थिति वाला है। जहां तक महागठबंधन का सवाल है सपा-बसपा-आरजेडी-टीएमसी जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए ये अपना अस्तित्व बचाने का चुनाव है।

उत्तर प्रदेश में पांच चरण का चुनाव हो चुका है। छठे चरण में 14 और सातवें में 13 सीटों पर चुनाव होना है। इनमें सुल्तानपुर, श्रावस्ती व अंबेडकरनगर अवध की हैं। बाकी 24 सीटें पूर्वांचल की। पूर्वांचल की आजमगढ़, वाराणसी और गोरखपुर सीटों पर सबकी नजर है। गठबंधन के तहत बसपा इन 27 सीटों में से 16 पर चुनाव लड़ रही है। बाकी 11 पर सपा ने अपने प्रत्याशी उतारे हैं। बसपा की सारी उम्मीदें इन 16 सीटों पर टिकी हैं। वजह, 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने अब तक की सर्वाधिक 21 सीटें जीती थीं।

उस समय इन 27 सीटों में से 11 पर उसने जीत दर्ज की थी। यही नहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव में जब बसपा का खाता भी नहीं खुला, पार्टी के 12 प्रत्याशी नंबर दो पर थे। आखिरी दो चरणों में ज्यादातर उन सीटों पर चुनाव हो रहा है जो भाजपा के खाते में रही हैं।  इसलिए भाजपा की जितनी भी सीटें कम होंगी उसका केंद्र का खाता कमजोर होगा। 80 सीटों में से 53 सीटों पर चुनाव हो चुका है जबकि 27 सीटों पर चुनाव होना है। अभी तक जो भी फीडबैक जमीनी स्तर से राजनीतिक दलों को मिला है उससे कोई भी दल पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है।

बीते 2014 लोकसभा चुनाव में अगर हम उत्तरप्रदेश की बात करे तो जहां भाजपा ने उत्तरप्रदेश में कुल 80 में से 73 सीटें हासिल कर 44 फीसदी वोट से अपनी जीत दर्ज की थी तो वहीं बसपा को 19 फीसदी तथा सपा को 20 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा था। भाजपा ने जाति समीकरण की इस रणनीति में जाठव समूह को छोड़कर अन्य सभी दलित तथा यादव समूह को छोड़कर अन्य सभी पिछड़े वर्गों (ओबीसी) का धुव्रीकरण कर, धर्म के अनुसार वोट करने के लिए समीकरण बिठाया था। जिसका खासा परिणाम मोदी-अमितशाह और भाजपा की कामयाबी से देखा जा सकता है।

यहां यह बात इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है की 2014 में हाशिये पर आ गई बहुजन समाज पार्टी ने अपने दलित वोट बैंक को अब दुबारा जीवित कर लिया है और समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाने के बाद ये गठबंधन ओबीसी एवं दलितों को रिझाने में कामयाब दिख रहा है। जिसके परिणामस्वरूप ही भाजपा के अन्दर से दलित बचाव की आवाज आ रही है। हाल ही में भाजपा के पांच सांसदों जिसमें छोटे लाल, उदितराज, ज्योतिबाई फूले आदि ने दलितों के लिए कुछ करने की प्रधानमंत्री से अपील भी की है। इसका सीधा मतलब है की राजनीति एक बार फिर करवट लेने को आतुर है

जिसके केंद्र इस बार दलित होंगे। यहां यह बात इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है की 2014 में हाशिये पर आ गई बहुजन समाज पार्टी ने अपने दलित वोट बैंक को अब दुबारा जीवित कर लिया है और समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाने के बाद ये गठबंधन ओबीसी एवं दलितों को रिझाने में कामयाब दिख रहा है। जिसके परिणामस्वरूप ही भाजपा के अन्दर से दलित बचाव की आवाज आ रही है। हाल ही में भाजपा के पांच सांसदों जिसमें छोटे लाल, उदितराज, ज्योतिबाई फूले आदि ने दलितों के लिए कुछ करने की प्रधानमंत्री से अपील भी की है।

इसका सीधा मतलब है की राजनीति एक बार फिर करवट लेने को आतुर है जिसके केंद्र इस बार दलित होंगे। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार गठबंधन के वोटों की शेयरिंग अच्छी तरह से हो गई तो सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दुहराना मुश्किल नहीं होगा। यही बात बसपा सुप्रीमो मायावती लगातार कह रही हैं। मगर, गठबंधन की ताकत को कई स्तर पर चुनौती मिल रही है। पहला, पार्टी का टिकट वितरण का मैकेनिज्म चुनौतियां पेश कर रहा है। कई सीटों पर कांग्रेस के दमदार उम्मीदवार बसपा प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ाए हुए हैं। वहीं, कई सीटों पर भाजपा ने प्रत्याशी बदलकर और बसपा-सपा के लोगों को पार्टी के साथ जोड़कर चुनौतियां बढ़ाई हैं। ऐसे में बसपा के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दुहरा पाना आसान नजर नहीं आ रहा।

पूर्वांचल में सबसे अहम और रोचक मुकाबला आजमगढ़ में है। यह जिला मऊ, गोरखपुर, गाजीपुर, जौनपुर, सुल्तानपुर और आंबेडकर जिले की सीमा से लगा हुआ है। यहां कुल मतदाता 17.70 लाख हैं। विधानसभा की गोपालपुर, सगड़ी, मुबारकपुर, आजमगढ, मेंहनगर सीटें आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र में आती हैं। भाजपा के टिकट पर दिनेश लाल यादव (निरहुआ) चुनावी मैदान में हैं, तो दूसरी तरफ  सपा-बसपा गठबंधन के सूत्रधार अखिलेश यादव इस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इस क्षेत्र में 19 फीसदी यादव, 16 दलित और 14 फीसदी मुसलमान हैं।

आजमगढ़ की जनता लहर के विपरीत चलती है-इस सीट का इतिहास रहा है लहर के विपरीत चलने का।  2014 में मोदी लहर में भी यहां की जनता ने मुलायम सिंह यादव को चुना था। 1978 में कांग्रेस विरोधी लहर में यहां कांग्रेस की मोहसिना किदवई को जीत मिली थी। वीपी सिंह की लहर में यहां की जनता ने बसपा को जिताया था। राजनीति के जानकारों के मुताबिक आजमगढ़ का चुनावी समीकरण को समझना हो, तो ऐसे समझिए, यादव, दलित, मुस्लिम में से किसी दो को जो अपने पक्ष में करने में कामयाब रहा, जीत उसकी। 1962 से लगातार इस सीट पर या तो यादव प्रत्याशी विजयी हुआ है या दूसरे नंबर पर रहा है। वैसे इस बार एक यादव की टक्कर दूसरे यादव से है।

-डॉ. श्रीनाथ सहाय