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Monday 22nd of April 2019
ओपिनियन

केरल के वायनाड से राहुल गांधी

Monday, April 08, 2019 13:00 PM
राहुल गांधी (फाइल फोटो)

दक्षिण राज्यों के राजनीतिक हलकों में यह बहस जोरों से चला रही है कि आखिर राहुल गांधी ने दूसरी सीट के रूप में वायनाड को ही क्यों चुना। पार्टी की कर्नाटक इकाई ने उन्हें राज्य की किसी से भी एक सीट से लड़ने का आग्रह किया था। लेकिन लगता है राहुल गांधी यह बहुत पहले से ही तय कर लिया था कि वे दक्षिण के किसी राज्य से दूसरी सीट से चुनाव लड़ेंगे लेकिन कौन से लोकसभा क्षेत्र होगा यह नहीं बताया गया। यह पहला अवसर नहीं है कि आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी का कोई अध्यक्ष दक्षिण भारत से लोकसभा का चुनाव लड़ रहा हो। कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष तथा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अविभाजित आंध्रप्रदेश के मेढक से 1978 लोकसभा का चुनाव लड़कर जीत चुकी है। फिर इसे कर्नाटक के  चिकमंगलूर में दोहराया गया। इसके बाद पार्टी के अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी भी कर्नाटक के बेल्लारी लोकसभा चुनाव क्षेत्र से चुनाव जीत चुकी है। तब उन्होंने वर्तमान विदेश मंत्री शुषमा स्वराज को हराया था। इस बार इस नीति को पार्टी के युवा अध्यक्ष राहुल गांधी दोहरा रहे है। उन्होंने ने अपना  नामांकन केरल के वायनाड से दाखिल किया है। इससे बीजेपी के यह आरोप पहले सिरे से ही खारिज होता हो जाता है कि अपने उत्तर प्रदेश की अपनी अमेठी सीट से अपनी हार की आशंका केडर से उन्होंने एक साथ दो सीटों से चुनाव लड़ने का निर्णय किया है। दक्षिण राज्यों के राजनीतिक हलकों में यह बहस जोरों से चला रही है कि आखिर राहुल गांधी ने दूसरी सीट के रूप में वायनाड को ही क्यों चुना। पार्टी की कर्नाटक इकाई ने उन्हें राज्य की किसी से भी एक सीट से लड़ने का आग्रह किया था। लेकिन लगता है राहुल गांधी यह बहुत पहले से ही तय कर लिया था कि वे दक्षिण के किसी राज्य से दूसरी सीट से चुनाव लड़ेंगे लेकिन कौन से लोकसभा क्षेत्र होगा यह नहीं बताया गया। वायनाड भौगोलिक दृष्टि ऐसी जगह पर स्थित है जहां कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल की सीमाएं मिलती है। लोकसभा सीटों के परिसीमन के बाद 2009 में यह लोकसभा क्षेत्र वजूद में आया था। यह इलाका तब से कांग्रेस पार्टी का गढ़ रहा है। पार्टी ने यह सीट 2009 और 2014 में जीती थी। इस लोकसभा क्षेत्र में मुस्लिम कुल मतदातों का लगभग 30 प्रतिशत और ईसाई 21 प्रतिशत है। यानि इन दोनों को मिलाने के बाद हिन्दू मतदाता यहां अल्पमत में हैं पार्टी को उम्मीद है कि मुस्लिम और ईसाई समुदायों के अधिकांश मत   राहुल गांधी ही मिलेंगे। वे यह रिकॉर्ड मतों से जीतेंगे।

राज्य में मुस्लिम लीग कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले संयुक्त दल लोकतान्त्रिक मोर्चे का अंग है। मुस्लिम लीग का इस इलाके में काफी प्रभाव है जिसका लाभ लोकसभा चुनावों में पार्टी और राहुल गांधी को मिलेगा पिछले गुरुवार को जब राहुल गांधी जब अपना नामांकन पत्र करने के लिए वायनाड आए तो पार्टी एक बड़ा रोडशो कर अपनी शक्ति का पहला प्रदर्शन भी कर दिया। वायनाड एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ है धान के खेत। कभी यह इलाका मद्रास  प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। 1921 यहां जब मोपला मुसलमानों ने विद्रोह तो उसका एक बाद केंद्र वायनाड ही था। बीजेपी से अधिक वामपथी दलों को राहुल गांधी के यहां से चुनाव लड़ने  पर ऐतराज है। उनका कहना है कि एक तरफ  तो कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी सब दलों को मिलाकर महागठबंधन बना बीजेपी को लोकसभा चुनावों में हराने की बात करते है दूसरी तरफ  केरल के वायनाड से चुनाव लड़ने का फैसला कर यह गलत सन्देश दे रहे कि उनकी लड़ाई बीजेपी के साथ-साथ  वामपंथी दलों से भी है। उल्लेखनीय के केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट के नेतृत्व वाली वामपथी सरकार है तथा कांग्रेस पार्टी  के नेतृत्व वाला  लोकतान्त्रिक मोर्चा प्रमुख विपक्षी है। इस भ्रान्ति को दूर करने के लिए राहुल गांधी ने कहा है कि वे यहां अपने चुनाव अभियान में वाम मोर्चे के खिलाफ  एक शब्द भी नहीं बोलेंगे। कांग्रेस पार्टी और उनके नेताओं नजरिया और रणनीति दूसरी है। उनका कहना है कि पार्टी यहां से चुनाव जीत कर सिद्ध करना चाहती है कि राहुल गांधी केवल उत्तर भारत में ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत में भी उतने ही अधिक लोकप्रिय नेता है। उनका मानना है कि बीजेपी की अभी दक्षिण में उतनी पैठ नहीं है जितनी कि उत्तर भारत में बीजेपी का अभी कर्नाटक के आगे विस्तार होना है। इससे पहले कि ऐसा हो कांग्रेस पार्टी अपनी जड़ें मजबूत करना चाहती है। दक्षिण राज्यों में लोकसभा की कुल 130 सीटें है जिसमें से पार्टी ने 2014 में कांग्रेस ने कर्नाटक और केरल से 8-8 सीटें जीती थीं। उधर बीजेपी  ने कर्नाटक से 18, तमिलनाडु से 1 तथा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से क्रमश   2 और 1 सीट जीत थी। राज्य के सत्तारूढ़ वाम मोर्चे के नेताओं की सबसे बड़ी चिंता यह है कि राहुल गांधी के केरल से चुनाव लड़ने का सीधा अर्थ यह होगा कि कांग्रेस पार्टी यहां से अधिक से अधिक सीटें जीतने का जोर लगाएगी। अभी तक वाम मोर्चे के नेताओं को राज्य में बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता सत्ता रही थी वहीं अब राहुल गांधी के यहां से चुनाव लड़ने से उन्हें अब एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा। राज्य के मार्क्सवादी नेता अपने केंद्रीय नेतृत्व पर लगातार दवाब बना रहा कि पार्टी को अब किसी भी राज्य में कांग्रेस के साथ नहीं जाना चाहिए। तमिलनाडु में कांगेस पार्टी का द्रमुक के साथ चुनावी समझौता है।

हालांकि इस समझौते में कांग्रेस पार्टी के हिस्से में 39 में से केवल 5 सीटें ही आई है। राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने से राज्य पार्टी नेताओं को विश्वास है कि अब पार्टी ये सभी पंचों सीटें आसानी से जीत सकेगी। इसी तरह कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी के नेताओं को पूरा भरोसा है के जनता दल-स के साथ समझौते के बाद राज्य की 28 में से उसके हिस्से में आई सभी 20 सीटें जितने में कामयाब होगी। यह लगभग तय माना जा रहा है के तेलंगाना की कुल 17 सीटों में कांग्रेस पार्टी शायद ही कोई सीट जीत सके क्योंकि दिसम्बर में हुए राज्य विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति ने कुल 119 सिटों में से 93 सीटें जीती थी। इससे भी अधिक बड़ा धक्का कांग्रेस पार्टी को तब लगा जब  हॉल ही में इसके 9 विधायक तेलंगाना राष्ट्र समिति में शामिल हो गए। उधर आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस पार्टी अच्छी स्थिति में नहीं हैं। उसका  वहां के सत्तारूढ़ तेलगुदेशम पार्टी से किसी प्रकार का चुनावी समझौता नहीं  हो सका। इस राज्य में लोकसभा चुनावों के साथ-साथ राज्य विधानसभा के भी चुनाव हो रहे है। अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इस मत के है कि तेलगुदेशम पार्टी का फिर सत्ता में आना लगभग असंभव सा है राज्य में जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाई एस आर कांग्रेस के सत्ता में आने की संभावनाएं अधिक है। राज्य के कुल 25 लोकसभा सीटों पर भी उसी का दबदबा रहेगा। तेलंगाना राष्ट्र समिति के सुप्रीमो के सी राव और जगन मोहन रेड्डी आम तौर पर कांग्रेस से अधिक बीजेपी के अधिक नजदीक माने जाते है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)