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Tuesday 16th of July 2019
खास खबरें

#WorldPopulationDay: बढ़ती गई आबादी तो बस रहेगा संघर्ष ही संघर्ष

Thursday, July 11, 2019 12:45 PM

 -वर्तमान में भारत की जनसंख्या करीब 1.36 अरब और चीन की 1.42 अरब है।

-वर्ष 2050 तक भारत की आबादी 1.64 बिलियन (164 करोड़) हो जाएगी।
-वर्ष 2019 से 2050 तक भारत की जनसंख्या में 27.3 करोड़ की वृद्धि हो सकती है।
 
कोटा। दुनिया में सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में पहला स्थान चीन का है। अगले आठ वर्षों में यानि वर्ष 2027 में भारत चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा और चीन दूसरे नंबर पर आ जाएगा। चीन ने बढ़ती जनसंख्या पर लगाम लगाने के लिए कई तरह की योजनाएं शुरू कर रखी है, लेकिन इस मामले में भारत पीछे रहा। अभी तक भारत में कोई सख्त कदम नहीं उठाए गए। इससे देश में तेजी से बढ़ रही जनसंख्या चिंता का विषय बनती जा रही है। अनियंत्रित गति से बढ़ रही आबादी देश के विकास को तो बाधित करेगी ही साथ ही आम जनजीवन भी इससे प्रभावित हुए बगैर नहीं रहेगा।  विकास की कोई भी योजना हो वह वर्तमान आबादी को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। लेकिन जिस रफ्तार से आबादी में इजाफा हो रहा है। उससे विकास की योजनाओं का जमीनी हकीकत पर साकार होना मुश्किल हो जाता है। देश की आबादी जैसे-जैसे बढ़ेगी, वैसे-वैसे गरीबी भी विकराल होती जाएगी। इसका सीधा असर मूलभूत सुविधाओं पर पड़ेगा। रोटी, कपड़ा, मकान, बेरोजगारी, प्रदूषण, पानी, शिक्षा, इकोलॉजी सिस्टम, यातायात, परिवहन बुरी तरह प्रभावित होगा। जीवन के अस्तित्व के लिए संघर्ष होना प्रारंभ हो जाएगा।
 
 
जल संकट ने लिया विकराल रूप
 देश के कई शहरों में तो जल संकट ने विकराल रूप धारण कर लिया है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक पानी खत्म होने के कागार पर आ जाएगा। वर्ष 2020 से ही पानी की परेशानी शुरू हो जाएगी। कुछ समय बाद ही 10 करोड़ लोग पानी के कारण परेशानी उठाएंगे। हाल के हालातों को देखे चेन्नई भीषण जल संकट से गुजर रहा है। तो चेन्नई में पानी भरने के लिए लंबी कतारें लगा रही है। कतारों में लगे लोगों के बीच लड़ाई की स्थिति भी आ जाती है। होटल में लोगों को पानी के इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दी जा रही है। शहर के छोटे रेस्टोरेंट्स को बंद किया जा रहा है। जबकि कुछ आॅफिसों में वर्क फ्री होम का नियम लागू किया गया है। चेन्नई की करीब  चालीस लाख से ज्यादा आबादी अब सिर्फ सरकारी पानी टैंकर पर निर्भर है। अभी से यह हाल है तो जब देश आबादी के मामले में नंबर वन बन जाएगा तो पानी की डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। कहां से पानी लाएंगे। भारत में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है। पानी प्राकृतिक संसाधन है इसे पैदा नहीं किया जा सकता है। देश में इन हालातों को देखकर अभी से ही जनसंख्या की चुनौतियां दिखाई दे रही है वहीं आठ साल बाद की कल्पना करें तो स्थितियां अत्यंत गंभीर हो जाएगी।

क्रांकीट के बढ़ रहे जंगल
आबादी की रफ्तार के साथ वाहनों की संख्या भी बढ़ रही है। आए दिन लगने वाले ट्रैफिक जाम से लोग परेशान है। सड़कों पर वाहनों का इतना दबाव रहता है कि वाहन रेंग कर चलने की स्थिति में पहुंच गए है। सड़क पार करना मुश्किल हो जाता है। ट्रेनों, मेट्रो ट्रेनों, बसों में लोगों की भीड़ दिखाई देती है। यह बढ़ती जनसंख्या का ही प्रभाव है। जलवायु परिर्वतन होने लगा है। गर्मियों में तापमान 50-51 डिग्री तक पहुंच रहा है। जंगल खत्म हो रहे है। हर तरफ कांक्रीट के जंगलों का जाल बिछ रहा है। इकोलॉजी सिस्टम प्रभावित हो रहा है। कई पशु-पक्षियों की प्रजातियां लुप्त हो चुकी है जो बची है वह भी खत्म होने के कगार पर है। 

प्रकृति में आ रहा बदलाव
बढ़ती आबादी और संसाधनों के बीच बड़ा अंतर पैदा हो रहा है। इस अंतर को खत्म करने के लिए प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है। कही सूखा, तो कही बाढ़ के हालात पैदा हो रहे है। सुनामी, चक्रवात इसकी मिसालें है। आबादी बढ़ाकर हम आने वाले कल को खतरे में डाल रहे है। अशिक्षा की समस्या और ज्यादा बढ़ जाएंगी। स्कूलों की डिमांड बढेÞगी। लेकिन आबादी के अनुरूप शिक्षण संस्थान नहीं होंगे तो बेरोजगारी तेजी से बढ़ती जाएंगी। अभी लोगों को रोजगार उपलब्ध नहीं हो रहा है। आने वाले समय में क्या स्थिति होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। प्राकृतिक संसाधन सीमित है। धीरे-धीरे जो संसाधन है वह भी कम हो जाएंगे। खेत सिकुड़ जाएंगे। लोगों को रहने के लिए जमीन उपलब्ध नहीं होगी। खाद्यन्न संकट पैदा हो जाएगा । कहां से अन्न पैदा होगा। केमिकल्स के इतने प्रयोग से जमीन उपजाऊ नहीं रहेगी । कितना खाद्यान्न इम्पोर्ट करेगें। हर चीज विकराल रूप लेती दिखाई देगी। बढ़ती जनसंख्या को रोकना जरूरी ही नहीं अब तो आवश्यक हो गया है। जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण की बात आज तक किसी भी राजनीतिक दलों ने नहीं की। चुनावी मुददें में कमी इस महत्वपूर्ण मसलें को शामिल नहीं किया । घोषना पत्रों में कमी तरजीह नहीं दी। इतनी सरकारें बनी और चली गई किंतु इस विषय पर गहराई से चिंतन कर प्लानिंग नहीं की गई। चीन ने भी बढ़ती जनसंख्या को कंट्रोल करने के लिए योजनाएं बनाई तो हम क्यों नहीं कर सकते। सबसे ज्यादा आबादी के बावजूत चीन  विकास की रफ्तार में भी सबसे आगे है। चीन ने पिछले कुछ समय में ऐसा आर्थिक तंत्र विकसित किया, जिसमें उसने अधिक आबादी को अपनी कामयाबी का आधार बनाया । सरकार को जल्द ही सख्त कानून बनाना चाहिए । समय रहते यदि बढ़ती आबादी पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सर्वाइव करना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा। रहने, खाने, पानी, रोजगार के लिए हाहाकार मचेगा। हिंसा, लूटपाट आम बात हो जाएगी। अस्तित्व के लिए लड़ाई-झगड़े होने शुरू हो जाएंगे। स्थितियां बेकाबू हो जाएंगी। आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन एक मुश्किल चुनौती साबित होगा। यदि लोग ये सोच रहे है कि बढ़ती आबादी के कारण दूसरे देशों में चले जाएंगे तो वह भी संभव नहीं है। विश्व की आबादी भी तेज दर के साथ बढ़ रही है। और प्रत्येक साल 8 करोड़ लोगों की वृद्धि हो रही है। इसका दबाव प्राकृतिक संसाघनों पर स्पष्ट रूप से पड़ रहा है। ऐसे में भारतीयों को कोई भी देश नहीं चाहेगा। कि वह उनके यहां पनाह लें। यदि जनसंख्या पर नियत्रंण नहीं किया गया तो हालात खतरनाक हो सकते है।
 
 
आठ साल बाद भारत सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा ।  सरकार को वक्तरहते आबादी नियंत्रण के लिए क्या सख्त कानून बनाना चाहिए।  तेजी से बढ़ती जनसंख्या को लेकर क्या ऐसा नहीं लगता  कि आने  वाले सालो में  मानव को जीवन अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ेगा ? इस बारे में प्रबुद्ध जनों से दैनिक नवज्योति ने राय जानी।
 
 जिला कलक्टर मुक्तानंद अग्र्रवाल का कहना है जनसंख्या वृद्घि बहुत बड़ी चुनौती है। आबादी पर नियंत्रण के लिए सरकार की योजनाएं चल रही है। इन योजनाओं को ग्र्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में पहुंचाया जाए  जहां यह नहीं पहुंची है। सीमित परिवार रखने के लिए लोगों को मोटिवेट और जागरूक किया जाए तो इन्हीं से काफी हद तक जनसंख्या पर नियंत्रण हो सकेगा। आज भी संघर्षपूर्ण स्थिति है। आने वाले वर्षों में जनसंख्या वृद्घि का संसाधनों पर दबाव बिल्कुल पड़ेगा।
 
परिवार कल्याण कोटा के डिप्टी सीएमएचओ डॉ. गिरधर गुप्ता का कहना है सरकार अपने स्तर पर प्रयास कर रही है। कानून बनाना सरकार का विषय है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए मापदंड निर्धारित होना चाहिए। शिक्षा के कारण जिन लोगों का सामाजिक स्तर उच्च हो गया है वह तो परिवार सीमित करने की स्थिति में आ गए। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या कम है। ज्यादातर ऐसी संख्या है,  जिनका सामाजिक, आर्थिक एवं शिक्षा का स्तर कम है। उन लोगों तक विभाग व सरकार सफल नहीं हो पाई। प्रयास तो हो रहे है। पिछले सालों के मुकाबले अब सरकार शिक्षा का स्तर बढ़ा रही है। आर्थिक सामाजिक स्तर भी बढ़ा रही है। जब यह स्तर बढ़ेगा तो साठ प्रतिशत वह लोग जिनका सामाजिक, आर्थिक और शिक्षा का स्तर कम है, वह भी इस स्तर पर आ जाएंगे, तब जाकर जनसंख्या कंट्रोल हो सकेगी। यह एक अनुमान है। जनसंख्या पर नियंत्रण करना ही सारी चीजों का समाधान है। सीमित परिवार में जो व्यक्ति रहेगा वह उन्नति भी करेगा और ग्र्रोथ भी करेगा। आज से बीस साल बाद जिस स्थिति में रहेंंगे पानी तक नहीं मिलेगा। जनसंख्या विस्फोट के दुष्परिणाम से संघर्ष करना पड़ेगा।

सुधा हॉस्पिटल में कॉर्डियोलॉजिस्ट डॉ. पुरुषोत्तम मित्तल  का कहना है  देश में पॉपुलेशन पॉलिसी बननी चाहिए। हमें कितने साल में कितनी आबादी कंट्रोल या ग्र्रोथ रेट कम करना है। पॉपुलेशन कंट्रोल बड़ा विषय है और आवश्यक है। डिक्टेटरशिप वाला कानून बनाकर लागू कर दें उससे पहले अवेयरनैस जनरेट करें। उसके बाद सभी राजनीतिक पार्टियों व सभी धर्म के लोगों को बुलाकर बात करनी चाहिए। पहले भी कानून बनाए गए उनका नेगेटिव इम्पैक्ट रहा। कानून से पहले जनता मे जागरण पैदा करेंं। जनसंख्या वृद्घि के अलावा लिंगानुपात भी बड़ा सवाल है। इसके अलावा संसाधनों का डिस्ट्रीब्यूशन भी बराबर हो। गरीबी रेखा से ऊपर उठा दिया चाहे उस परिवार में दस लोग है। लेकिन क्या उस परिवार में रिसोर्स का डिस्ट्रीब्यूशन बराबर हो रहा है।  गरीबी माइक्रो लेवल पर कंट्रोल होनी चाहिए। पॉपुलेशन कंट्रोल किए बिना तो सर्वाइवल बहुत मुश्किल है।
 
एसएन ग्रुप के डायरेक्टर भगवती शर्मा  का कहना है कानून बिल्कुल बनना चाहिए। जब तक आबादी कंट्रोल करने का वास्तविक आंकड़ा नहीं होगा तब तक कितने भी प्रयास कर लें कारगर नहीं होंगे। पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा कोई मायने नहीं रखती जब तक आबादी कंट्रोल नहीं होगी। आबादी बढ़ने के कारण प्रकृति, पशु-पक्षी, जानवर सभी सफर कर रहे हैं उनके बारे में सोच भी नहीं सकते। आने वाले वर्षों में मानव को जीवन अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। आज जनसंख्या वृद्धि के कारण हर चीज गौण हो रही है। पर्यावरण असंतुलन, जल संकट यह सब बढ़ती आबादी के कारण है। आने वाले समय में जो व्यक्ति केपेबल होगा वही व्यवस्था कर पाएगा। गरीब के लिए जीवन यापन बहुत मुश्किल हो जाएगा।
 
कोटा विश्वविद्यालय की साइंस विभाग की डीन प्रो. आशुरानी का कहना है जनसंख्या को कंट्रोल करने के लिए पहले से ही कानून मौजूद है। लेकिन इस तरीके का सर्वे नहीं है कि पर्टिकुलर सेगमेन्ट में पॉपुलेशन ग्र्रोथ ज्यादा हो रही है तो उसे कैसे कंट्रोल करें। इस तरह के प्रोजेक्ट व सर्वे नहीं किए जाते कि एक्चुअल कंट्रोल आबादी को कहां करना पड़ेगा। जिस तरह चुनाव में सर्वे होता है वैसे ही फैमिली सर्वे का डाटा हो तो उससे पता चल सकता है कि कहां पॉपुलेशन ग्र्रोथ बढ़ रही है। आबादी कंट्रोल करने में शिक्षा ही अहम् भूमिका निभाएगी। आने वाले वर्षों में वास्तव में संघर्ष करना पड़ेगा। जनसंख्या वृद्घि से देश का सम्पूर्ण विकास प्रभावित होगा। चीन की और भारत की जनसंख्या वृद्घि में अंतर है। चाइना अपनी इकोनॉमी को ग्र्रो करने में सक्षम है। लेकिन भारत में पॉपुलेशन, इकोनॉमी और डवलपमेंट में सामंजस्य नहीं आ पा रहा है। जनसंख्या वृद्घि आर्थिक स्ट्रेंथ को बढ़ा रही हो तब तो स्थितियां संभालने में सक्षम हो सकते है ,लेकिन अगर जनसंख्या वृद्घि आर्थिक गति को बढ़ा नहीं पा रही है तो संघर्ष होगा। भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हो, तकनीक का उन्नत विकास हो तो जनसंख्या वृद्घि को संभाल सकते है। यदि जनसंख्या आर्थिक विकास पर प्रकार कर रही है तो कंट्रोल करना चाहिए।
 
 रोटरी क्लब कोटा के अध्यक्ष सुनील बाफना का कहना है कानून बनाने से फायदा नहीं है। अवेयरनैस क्रिएट करना होगा। देश में निरक्षरता की दर ज्यादा है। कितने कानून लगा दो, लेकिन उन लोगों को जब तक जानकारी नहीं होगी तो वह क्या पालना करेंगे। बहुत सारे इलाके जैसे ट्राइबल एरिया है, जहां आबादी नियंत्रण के उपायों को वह एवॉइड करते है उनकी काउंसलिंग व उनको अवेयरनैस करना चाहिए। एज्यूकेशन सिस्टम भी ऐसा डवलप करें कि बच्चों को बचपन से ही सीमित परिवार के बारे में बताए। जिससे उनमें बचपन से यह फीड हो जाएगा कि यह हमारे लिए सही है। आने वाले वर्षों में संघर्ष बिल्कुल करना पड़ेगा इसके लिए अभी से सोचना पड़ेगा। हम भी चेन्नई की हालत में जा रहे है। कोटा में भी ग्र्राउंड वाटर खत्म हो रहा है। शहर में कितने नाले है गंदे पड़े रहते है। बजट  में आया साॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट गांवों में करने वाले है। पहले शहरों का सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट तो करिए? अनट्रीटेड पानी चंबल में जा रहा है आगे तो सिचुएशन बहुत भयानक है। हम पर्यावरण और पानी को नहीं बचा पा रहे है। पर्यावरण पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है।
 
डीएवी पब्लिक स्कूल की प्रिंसीपल सरिता रंजन का कहना है सख्त कदम उठाना बहुत जरूरी है। वर्तमान में भी रिसोर्स कम हो रहे है। पानी जो आराम से मिलना चाहिए, उसकी किल्लत हो रही है। आबादी बढ़ेगी तो जमीन तो उतनी ही रहने वाली है जो उपलब्ध है। बल्कि भूमि और प्राकृतिक रिसोर्स कम ही होते जाएंगे। अगर आज नहीं जागेंगे तो बहुत परेशानी में पड़ जाएंगे। चीन ने अपनी आबादी को कम किया। वह अब अपने कपल्स को परिवार बढ़ाने को कह रहे है। हमने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। अगर बीस साल पहले हम भी जाग गए होते तो यह स्थितियां नहीं बनती। यह ऐसा मुद्दा है जिस पर ठोस कदम उठाने की जरुरत है। इसमें स्ट्रॉग्ली इंसानी सोच को बदलने की जरूरत है। पूरा सरकार पर भी नहीं डाल सकते है। कुछ चीजें जरूर करनी पड़ेगी। गरीबी इतनी है कि शिक्षा नहीं हैं। आज इतनी जनसंख्या है कोई भी बीमारी होती है वह महामारी बन जाती है। अगर आबादी कंट्रोल नहीं करेंगे तो बीमारियों द्वारा मृत्युदर भी बढ़ जाएंगी। कहीं ना कहीं कंट्रोल तो करना पड़ेगा नहीं तो नेचर कंट्रोल करेगी वह दर्दनाक होगा। पहले ही इसे कंट्रोल करने की कोशिश करें और इस बात को समझें।
 
सीए कुमार विकास जैन का कहना है कानून तो बनना चाहिए कितना भी समझा दें लोगों को जब तक कानून का डर नहीं होगा कोई बात समझ नहीं आती है। आजादी के बाद हम स्वछंद हो गए है। देश के अस्तित्व की बात करें तो संसाधन सीमित है। सीमित संसाधनों में सख्त कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि लागू करवाने में सख्ती करनी होगी। किसी व्यक्ति के तीसरी संतान होने पर सरकार को चाहिए टैक्स के रूप में दस हजार रुपए प्रति वर्ष उससे ले। बढ़ती आबादी आने वाले वर्षों में मानव के जीवन अस्तित्व के लिए खतरा बनेगी। कृषि की विकास दर बहुत गिर गई है। तकनीक में कितने  भी आगे आ जाए पर खाद्यान्न जरुरी है। वेनेजुएला की स्थिति देखें। वहां के लोगों ने काम करना बंद कर दिया कि हमारे यहां तो तेल के कुएं है तो खेती क्यों करें। आज वह देश भुखमरी का शिकार हो गया। यही स्थिति भारत की रही तो आने वाले वर्षों में पानी की एक बॉटल, एक-एक रोट ी के लिए लड़ते नजर आ सकते हैं।